- ‘एक कहानी यह भी’ प्रसिद्ध कथाकार मन्नू भंडारी की आत्मकथा ‘एक कहानी यह भी’ का एक अंश है — यह कोई सिलसिलेवार आत्मकथा नहीं, बल्कि उन व्यक्तियों और घटनाओं का स्मरण है जिन्होंने लेखिका के लेखकीय व्यक्तित्व को गढ़ा।
- अंश के केंद्र में हैं — लेखिका के पिता (स्नेही पर अहंवादी, असुरक्षा से भरे) और कॉलेज की प्राध्यापिका शीला अग्रवाल, जिन्होंने साहित्य व आज़ादी के आंदोलन से उनका परिचय कराया।
- सन् 1946–47 की आज़ादी की आँधी ने अजमेर की इस युवा होती लड़की को भी छू लिया; वह जुलूस, हड़ताल और भाषण में बढ़-चढ़कर भाग लेने लगी।
- पाठ स्त्री-स्वतंत्रता, पीढ़ियों के टकराव और एक ‘साधारण लड़की’ के ‘असाधारण’ बनने की यात्रा को बहुत सहजता से उभारता है।
- बोर्ड में महत्त्व: लगभग 4 अंक प्रतिवर्ष — गद्य खंड में 1 दीर्घ-उत्तरीय (पिता का चरित्र / आंदोलन की भूमिका) और 1–2 लघु-उत्तरीय प्रश्न प्रायः पूछे जाते हैं।
1. लेखिका परिचय (मन्नू भंडारी)
जन्म: सन् 1931, गाँव भानपुरा, ज़िला मंदसौर (मध्य प्रदेश)। निधन: सन् 2021। इंटर तक की शिक्षा-दीक्षा राजस्थान के अजमेर शहर में हुई। बाद में उन्होंने हिंदी में एम.ए. किया और दिल्ली के मिरांडा हाउस कॉलेज में अध्यापन-कार्य किया।
स्वातंत्र्योत्तर हिंदी कथा-साहित्य की प्रमुख हस्ताक्षर मन्नू भंडारी की प्रमुख रचनाएँ हैं —
- कहानी-संग्रह: एक प्लेट सैलाब, मैं हार गई, यही सच है, त्रिशंकु।
- उपन्यास: आपका बंटी, महाभोज।
- आत्मकथा: एक कहानी यह भी (इसी के अंश से यह पाठ लिया गया है)।
उन्होंने फ़िल्म एवं टेलीविज़न धारावाहिकों के लिए पटकथाएँ भी लिखीं (जैसे ‘रजनी’ धारावाहिक)। उनकी रचनाओं में भाषा और शिल्प की सादगी, प्रामाणिक अनुभूति तथा स्त्री-मन से जुड़ी संवेदनाओं की अभिव्यक्ति विशेष रूप से दिखाई देती है। हिंदी अकादमी का ‘शिखर सम्मान’ सहित अनेक पुरस्कार उन्हें प्राप्त हुए।
2. पाठ का विस्तृत सार
लेखिका स्पष्ट करती हैं कि यह कोई परिभाषिक अर्थ में लिखी गई सिलसिलेवार आत्मकथा नहीं है। इसमें उन्होंने केवल उन व्यक्तियों और घटनाओं को चुना है जो उनके लेखकीय जीवन से जुड़े रहे और जिन्होंने एक साधारण लड़की को असाधारण बनाया।
घर और पिता: लेखिका का बचपन अजमेर के एक दो-मंज़िले मकान में बीता। पिता कभी राजस्थान के सुप्रसिद्ध, सुखी-संपन्न और रसूख़ वाले व्यक्ति रहे थे, पर इंदौर छोड़कर अजमेर आने पर आर्थिक स्थिति बिगड़ गई। बार-बार के धोखों, असफलताओं और कर्ज़ ने उन्हें क्रोधी, शक्की और अहंवादी बना दिया था। फिर भी पढ़ाई-लिखाई और सामाजिक प्रतिष्ठा को लेकर वे बहुत सचेत थे।
रंग और हीन-भावना: लेखिका साँवली थीं, जबकि उनकी बड़ी बहन सुशीला गोरी और सुंदर थीं। पिता बार-बार सुशीला से तुलना करते, जिससे बचपन में मन्नू के मन में हीन-भावना घर कर गई। यही ‘हीनता की ग्रंथि’ बाद में आत्म-विश्वास के संघर्ष में बदली।
देश-दुनिया से परिचय: घर में ‘भीतर’ का काम (रसोई, जिसे पिता ‘भटियारखाना’ कहते) माँ और बड़ी बहन के ज़िम्मे रहता, जबकि पिता मन्नू को घर की राजनीतिक चर्चाओं और देश-दुनिया की बातों में शामिल रखते। यहीं से उनमें सामाजिक चेतना और तर्क-वितर्क की आदत पड़ी।
शीला अग्रवाल का आगमन: कॉलेज में हिंदी की प्राध्यापिका शीला अग्रवाल ने मन्नू को अच्छे साहित्य से जोड़ा। उन्होंने जैनेंद्र, अज्ञेय, यशपाल जैसे लेखकों की पुस्तकें थमाईं और भीतर की चेतना को झकझोरा। शीला जी ने ही उन्हें कक्षा की चारदीवारी से निकालकर आज़ादी के आंदोलन की सक्रिय भागीदारी की ओर प्रेरित किया।
आंदोलन और भाषण: सन् 1946–47 का दौर था। मन्नू हड़तालों, जुलूसों और सभाओं में आगे रहने लगीं। एक दिन वे भाषण देते हुए लोगों को आंदोलित कर रही थीं, तभी एक पड़ोसी ने पिता से शिकायत की। पिता क्रुद्ध हुए, पर उसी समय एक प्रोफ़ेसर साहब घर आकर मन्नू के भाषण की प्रशंसा कर गए — इस पर पिता को भीतर ही भीतर गर्व भी हुआ और बेटी की बढ़ती स्वतंत्रता पर असुरक्षा भी।
पिता से वैचारिक टकराव: पिता एक ओर बेटियों को आगे बढ़ते देखना चाहते थे, दूसरी ओर लड़की की ‘सीमा’ का प्रश्न उन्हें परेशान करता। प्राचार्य की चेतावनी के बावजूद जब मन्नू ने आंदोलन में भागीदारी नहीं छोड़ी, तो पिता का अहं और बेटी का स्वाभिमान आमने-सामने आ गए। यही वैचारिक टकराव पाठ का मार्मिक केंद्र है।
इस प्रकार अंश एक ‘साधारण लड़की’ के आत्म-विश्वासी, सजग और लेखकीय व्यक्तित्व में ढलने के आरंभिक पड़ावों को बहुत खूबसूरती से प्रकट करता है।
3. लेखिका व पिता का चरित्र व संबंध
लेखिका (मन्नू) का चरित्र:
- संवेदनशील एवं आत्म-सजग: बचपन की हीन-भावना से उबरकर अपने व्यक्तित्व को पहचानने की निरंतर यात्रा करती हैं।
- निर्भीक और जुझारू: आंदोलन में पिता के विरोध के बावजूद भागीदारी से पीछे नहीं हटतीं।
- विचारशील एवं तर्कशील: साहित्य और राजनीति में गहरी रुचि; नैतिक-अनैतिक, सही-गलत की बनी-बनाई धारणाओं पर प्रश्नचिह्न लगाने का साहस।
- आत्म-विश्वासी: ‘साधारण लड़की’ से ‘असाधारण’ बनने का मार्ग स्वयं चुनती हैं।
पिता का चरित्र:
- स्नेही पर अहंवादी: संतान से प्रेम करते हैं, पर अपने अहं को चोट पहुँचने पर असहिष्णु हो उठते हैं।
- महत्त्वाकांक्षी एवं यश-लोलुप: समाज में प्रतिष्ठा और ‘नाम’ की उन्हें गहरी चिंता रहती है।
- शक्की और असुरक्षित: आर्थिक पतन और बार-बार के धोखों ने उन्हें संदेहशील बना दिया।
- पुरुष-प्रधान सोच के बीच प्रगतिशील झुकाव: बेटियों को पढ़ाना-बढ़ाना चाहते हैं, पर ‘लड़की की सीमा’ का पारंपरिक भय उन्हें रोकता है।
संबंध: पिता-पुत्री का संबंध प्रेम और टकराव का अनोखा मिश्रण है। पिता ने ही मन्नू को सामाजिक चेतना दी और घर की चर्चाओं में शामिल किया, पर जब बेटी ने अपनी स्वतंत्र सोच और निर्णय-शक्ति विकसित कर ली, तो वही स्वतंत्रता पिता के अहं से टकरा गई। यह टकराव किसी एक पक्ष का दोष नहीं, बल्कि बदलते समय और दो पीढ़ियों के दृष्टिकोण का स्वाभाविक संघर्ष है।
4. स्वतंत्रता आंदोलन का प्रभाव
सन् 1946–47 का समय भारत के स्वतंत्रता संग्राम का चरम था और इसी ‘आज़ादी की आँधी’ ने मन्नू भंडारी को भी अछूता नहीं छोड़ा। शीला अग्रवाल की प्रेरणा से लेखिका ने आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की।
- सक्रियता: कॉलेज की लड़कियों को संगठित कर हड़ताल, जुलूस और सभाओं का नेतृत्व करना।
- भाषण-कला: ओजस्वी भाषणों से जनता को आंदोलित करना — जहाँ उनका उत्साह, ओज और विरोध करने का तरीका देखते ही बनता था।
- संगठन-क्षमता: छोटे शहर की एक युवा होती लड़की ने जिस तरह आंदोलन में भागीदारी की, वह उसकी असाधारण नेतृत्व-शक्ति का परिचय देती है।
आंदोलन ने मन्नू में आत्म-विश्वास, सामाजिक उत्तरदायित्व-बोध और निर्भीकता भरी। यही अनुभव आगे चलकर उनके स्त्री-केंद्रित और सामाजिक सरोकार वाले लेखन की भूमि बना। पाठ यह भी रेखांकित करता है कि स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी रही, जिसे प्रायः इतिहास में कम स्थान मिला।
जब मन्नू भाषण देकर लौटतीं, तो कोई पड़ोसी पिता से कहता — “उस मन्नू की तो मत मारी गई है, पर भंडारी जी आपको क्या हुआ?” इसी बीच एक प्रोफ़ेसर साहब आकर पिता को बधाई देते — “आई एम रियली प्राउड ऑफ़ यू…”। पिता एक साथ गर्व और असुरक्षा दोनों से भर जाते — यही द्वंद्व पाठ की मार्मिकता है।
5. भाषा-शैली
- आत्मकथात्मक एवं संस्मरणात्मक शैली: लेखिका अपने अतीत को स्मृति के सहारे प्रथम-पुरुष में प्रस्तुत करती हैं।
- सहज, सरल एवं प्रवाहमयी भाषा: तत्सम, तद्भव, उर्दू व अंग्रेज़ी (आई एम प्राउड, यू हैव मिस्ड…) शब्दों का स्वाभाविक मेल।
- मुहावरों का सजीव प्रयोग: ‘लू उतारना’, ‘आग-बबूला होना’, ‘भभकते रहना’, ‘थू-थू करना’ जैसे मुहावरे रचना को रोचक और सजीव बनाते हैं।
- आत्म-विश्लेषणात्मक एवं विचारप्रधान: घटनाओं के साथ-साथ उनके पीछे की मनोवृत्ति और सामाजिक स्थिति का विश्लेषण।
- संवादात्मकता: पात्रों के संवाद (विशेषकर अंग्रेज़ी टुकड़ों के साथ) चरित्र को जीवंत करते हैं।
6. कठिन शब्दार्थ
- अहंवादी — घमंडी, अहं से भरा।
- भग्नावशेष — खंडहर, टूटे-फूटे हिस्से।
- विस्फारित — और अधिक फैलना/फैलाना।
- आक्रांत — कष्टग्रस्त, दबा हुआ।
- निषिद्ध — जिस पर रोक लगाई गई हो।
- वर्चस्व — दबदबा, प्रभुत्व।
- भटियारखाना — (पिता द्वारा) रसोई के लिए प्रयुक्त तिरस्कारसूचक शब्द।
- हीनता की ग्रंथि — हीन-भावना, स्वयं को कमतर मानने की मनोग्रंथि।
- राजेंद्र — यहाँ हिंदी के कथाकार एवं ‘हंस’ पत्रिका के संपादक राजेंद्र यादव की ओर संकेत।
- महाभोज — मन्नू भंडारी का चर्चित उपन्यास (दा साहब प्रमुख पात्र)।
7. मुख्य भाव
पाठ का केंद्रीय भाव है — एक साधारण लड़की का असाधारण बनने का संघर्ष। यह दिखाता है कि व्यक्तित्व जन्मजात नहीं, बल्कि परिवेश, व्यक्तियों (पिता, शीला अग्रवाल) और परिस्थितियों (आज़ादी का आंदोलन) के प्रभाव से गढ़ा जाता है। साथ ही पाठ स्त्री-स्वतंत्रता, पीढ़ियों के वैचारिक टकराव, और रूढ़ धारणाओं को चुनौती देने के साहस को उभारता है। पिता-पुत्री के प्रेम और संघर्ष के माध्यम से लेखिका यह संदेश देती हैं कि सच्ची शिक्षा वही है जो व्यक्ति को स्वतंत्र रूप से सोचने और निर्णय लेने योग्य बनाए।
8. NCERT प्रश्न-अभ्यास (सभी उत्तर)
प्र.1 — लेखिका के व्यक्तित्व पर किन-किन व्यक्तियों का किस रूप में प्रभाव पड़ा?
उत्तर: (i) पिता — उन्होंने मन्नू को घर की राजनीतिक चर्चाओं में शामिल कर सामाजिक चेतना और तर्क-शक्ति दी, परंतु उनके अहंवादी स्वभाव और साँवले रंग को लेकर तुलना ने बचपन में हीन-भावना भी भरी। (ii) माँ — सहनशीलता, त्याग और धैर्य का संस्कार दिया। (iii) शीला अग्रवाल — कॉलेज की प्राध्यापिका, जिन्होंने अच्छे साहित्य से परिचय कराया और आज़ादी के आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित किया — इन्होंने लेखकीय व्यक्तित्व के निर्माण में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
प्र.2 — इस आत्मकथ्य में लेखिका के पिता ने रसोई को ‘भटियारखाना’ कहकर क्यों संबोधित किया है?
उत्तर: पिता मानते थे कि रसोई में सारा समय बिताने से लड़कियों का बौद्धिक विकास रुक जाता है और उनकी प्रतिभा घर की चारदीवारी तक सिमट जाती है। वे चाहते थे कि उनकी बेटियाँ केवल चूल्हे-चौके तक सीमित न रहें, बल्कि देश-दुनिया की बातों में रुचि लें। इसी कारण उन्होंने रसोई के प्रति अपनी अरुचि व व्यंग्य प्रकट करते हुए उसे ‘भटियारखाना’ कहा।
प्र.3 — वह कौन-सी घटना थी जिसके बारे में सुनकर लेखिका को न अपनी आँखों पर विश्वास हो पाया और न अपने कानों पर?
उत्तर: जब लेखिका एक भाषण में जनता को आंदोलित कर रही थीं, तो एक प्रोफ़ेसर साहब ने स्वयं घर आकर पिता को बधाई दी और मन्नू के भाषण की प्रशंसा करते हुए कहा — “आई एम रियली प्राउड ऑफ़ यू…”। सदा डाँटने-रोकने वाले पिता के सामने अपनी इस प्रशंसा और पिता के मन में उपजे गर्व को देखकर लेखिका को न अपनी आँखों पर और न अपने कानों पर विश्वास हुआ।
प्र.4 — लेखिका की अपने पिता से वैचारिक टकराहट को अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर: पिता एक ओर बेटियों को पढ़ा-लिखाकर आगे बढ़ाना चाहते थे, पर दूसरी ओर ‘लड़की की मर्यादा और सीमा’ की पारंपरिक धारणा उन्हें परेशान करती थी। वे चाहते थे कि बेटी आगे बढ़े, पर उनके बताए ढंग और सीमा के भीतर। जब शीला अग्रवाल की प्रेरणा से मन्नू ने आंदोलन में भागीदारी की और स्वतंत्र निर्णय लेने लगीं, तो उनका यह स्वाभिमान पिता के अहं से टकरा गया। प्राचार्य की चेतावनी के बावजूद आंदोलन न छोड़ने पर यह टकराव और गहरा हो गया — यही दो पीढ़ियों और बदलते मूल्यों का स्वाभाविक संघर्ष था।
प्र.5 — इस आत्मकथ्य के आधार पर स्वाधीनता आंदोलन के परिदृश्य का चित्रण करते हुए उसमें मन्नू जी की भूमिका को रेखांकित कीजिए।
उत्तर: सन् 1946–47 का दौर आज़ादी के संघर्ष का चरम था। चारों ओर हड़तालें, जुलूस और सभाएँ चल रही थीं; छोटे शहरों के युवा भी इसमें बढ़-चढ़कर भाग ले रहे थे। इसी ‘आज़ादी की आँधी’ में मन्नू जी ने कॉलेज की लड़कियों को संगठित कर हड़ताल-जुलूसों का नेतृत्व किया, ओजस्वी भाषणों से जनता को आंदोलित किया। उनका उत्साह, ओज, संगठन-क्षमता और विरोध करने का तरीका देखते ही बनता था। इस प्रकार एक युवा होती लड़की ने आंदोलन में सक्रिय व नेतृत्वकारी भूमिका निभाई।
प्र.6 (रचना और अभिव्यक्ति) — लेखिका ने बचपन में भाइयों के साथ गिल्ली-डंडा व पतंग जैसे खेल भी खेले, किंतु लड़की होने के कारण उनका दायरा घर की चारदीवारी तक सीमित था। क्या आज भी लड़कियों के लिए स्थितियाँ ऐसी ही हैं या बदल गई हैं — अपने परिवेश के आधार पर लिखिए।
उत्तर: आज स्थितियाँ काफी बदली हैं। लड़कियाँ शिक्षा, खेल, सेना, विज्ञान, राजनीति हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं और घर की चारदीवारी अब उनकी सीमा नहीं रही। फिर भी पूर्ण समानता अभी नहीं आई — कुछ क्षेत्रों व परिवारों में आज भी लड़कियों की स्वतंत्रता पर रोक-टोक और सुरक्षा की चिंता रहती है। अतः बदलाव हुआ है, पर अभी और जागरूकता की आवश्यकता है। (विद्यार्थी अपने परिवेश के अनुसार उदाहरण दें।)
प्र.7 — मनुष्य के जीवन में आस-पड़ोस का बहुत महत्त्व होता है, परंतु महानगरों में रहने वाले लोग प्रायः ‘पड़ोस कल्चर’ से वंचित रह जाते हैं — इस पर अपने विचार लिखिए।
उत्तर: पड़ोस सुख-दुख का सच्चा साथी होता है — आपातकाल में सबसे पहले पड़ोसी ही काम आता है। पहले मोहल्लों में मेलजोल, त्योहारों की साझेदारी और अपनापन था। आज महानगरों में व्यस्त जीवनशैली, फ़्लैट-संस्कृति और एकाकीपन के कारण लोग पड़ोसियों को जानते तक नहीं। इससे संकट के समय सहायता और सामाजिक जुड़ाव दोनों कम हो गए हैं। हमें इस आत्मीयता को पुनर्जीवित करना चाहिए। (विद्यार्थी अपने अनुभव जोड़ें।)
प्र.8 — लेखिका द्वारा पढ़े गए उपन्यासों की सूची बनाइए और उन उपन्यासों को अपने पुस्तकालय में खोजिए।
उत्तर: लेखिका ने शीला अग्रवाल की प्रेरणा से जैनेंद्र, अज्ञेय, यशपाल आदि के साहित्य का अध्ययन किया। प्रमुख कृतियाँ — जैनेंद्र की ‘सुनीता’, ‘त्यागपत्र’; अज्ञेय की ‘शेखर: एक जीवनी’, ‘नदी के द्वीप’; यशपाल की ‘दिव्या’ आदि। (विद्यार्थी इन पुस्तकों को अपने विद्यालय/स्थानीय पुस्तकालय में खोजें और पढ़ें।)
प्र.9 — आप भी अपने दैनिक अनुभवों को डायरी में लिखिए।
उत्तर: यह क्रियात्मक/स्वयं-करने वाला प्रश्न है। विद्यार्थी प्रतिदिन तिथि लिखकर दिनभर की महत्त्वपूर्ण घटनाओं, अनुभवों और भावनाओं को सरल भाषा में डायरी में दर्ज करें — इससे लेखन-कौशल और आत्म-विश्लेषण की क्षमता विकसित होती है।
प्र.10 (भाषा-अध्ययन) — इस आत्मकथ्य में मुहावरों का प्रयोग करके लेखिका ने रचना को रोचक बनाया है। रेखांकित मुहावरों को ध्यान में रखकर कुछ और वाक्य बनाइए।
- लू उतारना (कड़ी फटकार लगाना) — अध्यापक ने देर से आने पर छात्र की अच्छी तरह लू उतारी।
- भभकते रहना (देर तक क्रोध में जलना) — बात-बात पर वे सारा दिन भभकते रहते हैं।
- थू-थू करना (निंदा/धिक्कार करना) — बेईमानी पकड़े जाने पर मोहल्ले भर ने उसकी थू-थू कर दी।
- आग-बबूला होना (अत्यधिक क्रोधित होना) — झूठ पकड़े जाने पर पिता जी आग-बबूला हो उठे।
9. ध्यान देने योग्य बातें एवं त्वरित पुनरावृत्ति
ध्यान देने योग्य बातें:
- यह ‘आत्मकथा’ का अंश है, सिलसिलेवार पूरी आत्मकथा नहीं — उत्तर में इसे ‘आत्मकथ्य/अंश’ ही लिखें।
- लेखकीय व्यक्तित्व गढ़ने वाले तीन स्तंभ याद रखें — पिता, माँ, शीला अग्रवाल।
- आंदोलन का काल 1946–47 और स्थान अजमेर भ्रम से बचने के लिए स्पष्ट याद रखें।
- पिता का चरित्र एकपक्षीय नहीं — उसमें स्नेह और अहं, प्रगतिशीलता और रूढ़ि दोनों हैं; संतुलित उत्तर लिखें।
त्वरित पुनरावृत्ति:
- विधा: आत्मकथ्य (आत्मकथा अंश)। लेखिका: मन्नू भंडारी।
- मुख्य पात्र: मन्नू, पिता, माँ, बड़ी बहन सुशीला, शीला अग्रवाल।
- केंद्रीय भाव: साधारण लड़की का असाधारण बनना; स्त्री-स्वतंत्रता; पीढ़ी-संघर्ष।
- प्रमुख मुहावरे: लू उतारना, आग-बबूला होना, भभकते रहना, थू-थू करना।
- महादेवी वर्मा
- मन्नू भंडारी
- सुभद्रा कुमारी चौहान
- मृदुला गर्ग
- कहानी
- संस्मरण-निबंध
- आत्मकथ्य (आत्मकथा अंश)
- रेखाचित्र
- इंदौर
- दिल्ली
- अजमेर
- कोलकाता
- शीला अग्रवाल
- माँ
- बड़ी बहन सुशीला
- राजेंद्र यादव
- पाकशाला
- भटियारखाना
- भंडारगृह
- चौका-घर
- पढ़ाई में कमज़ोरी
- साँवले रंग को लेकर बहन से तुलना
- आर्थिक तंगी
- भाई न होना
- 1919–20
- 1930–31
- 1942
- 1946–47
- “आई एम रियली प्राउड ऑफ़ यू…”
- “बेटी को रोकिए”
- “यह उचित नहीं”
- “घर बैठिए”
- आपका बंटी
- महाभोज
- गोदान
- यही सच है
- प्रसन्न होना
- अत्यधिक क्रोधित होना
- डर जाना
- थक जाना
- शांत और उदासीन
- स्नेही पर अहंवादी एवं शक्की
- पूर्णतः कठोर
- लापरवाह
- प्रकृति-वर्णन
- साधारण लड़की का असाधारण बनना एवं स्त्री-स्वतंत्रता
- ग्रामीण जीवन
- देशाटन
- हिंदू कॉलेज
- मिरांडा हाउस
- लेडी श्रीराम
- रामजस कॉलेज
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