- यह पाठ प्रसिद्ध शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ पर लिखा गया एक रोचक व्यक्तिचित्र है, जिसके लेखक हैं यतीन्द्र मिश्र।
- लेखक ने बिस्मिल्ला खाँ का परिचय ही नहीं दिया, बल्कि उनकी रुचियों, अंतर्मन की बुनावट, संगीत-साधना और लगन को संवेदनशील भाषा में व्यक्त किया है।
- खाँ साहब के लिए संगीत एक इबादत (उपासना) है — वे अस्सी बरस की उम्र में भी सच्चे सुर की तलाश में नमाज़ के बाद सज़दे में गिड़गिड़ाते रहे।
- पाठ का केंद्रीय भाव है काशी की गंगा-जमुनी संस्कृति और धार्मिक सौहार्द — एक मुसलमान कलाकार का बालाजी मंदिर व विश्वनाथ से अटूट लगाव।
- परीक्षा में महत्त्व: लगभग ~4 अंक प्रतिवर्ष — सामान्यतः एक लघु उत्तरीय प्रश्न (खाँ साहब का व्यक्तित्व/मुहर्रम/काशी) और कुछ बहुविकल्पीय प्रश्न।
1. लेखक परिचय — यतीन्द्र मिश्र
यतीन्द्र मिश्र का जन्म सन् 1977 में अयोध्या (उत्तर प्रदेश) में हुआ। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ से हिंदी में एम.ए. किया। वे स्वतंत्र लेखन के साथ-साथ अर्द्धवार्षिक साहित्यिक पत्रिका 'सहित' का संपादन करते हैं। सन् 1999 में साहित्य और कलाओं के संवर्द्धन एवं अनुशीलन के लिए उन्होंने एक सांस्कृतिक न्यास 'विमला देवी फ़ाउंडेशन' की स्थापना की।
उनके तीन काव्य-संग्रह प्रकाशित हुए हैं — 'यदा-कदा', 'अयोध्या तथा अन्य कविताएँ' और 'ड्योढ़ी पर आलाप'। इसके अतिरिक्त शास्त्रीय गायिका गिरिजा देवी के जीवन और संगीत-साधना पर उन्होंने 'गिरिजा' नामक पुस्तक लिखी। उन्हें भारत भूषण अग्रवाल कविता सम्मान, हेमंत स्मृति कविता पुरस्कार तथा ऋतुराज सम्मान आदि अनेक पुरस्कार मिले हैं। कविता, संगीत व अन्य ललित कलाओं के साथ समाज और संस्कृति में भी उनकी गहरी रुचि है — यही रुचि इस व्यक्तिचित्र में झलकती है।
2. पाठ का विस्तृत सार
पाठ का आरंभ सन् 1916 से 1922 के आसपास की काशी से होता है। पंचगंगा घाट स्थित बालाजी मंदिर की ड्योढ़ी पर एक नौबतखाना है, जहाँ से मंगलध्वनि निकलती है। उस समय बिस्मिल्ला खाँ का बचपन का नाम अमीरुद्दीन था; वह सिर्फ़ छह साल का था और बड़ा भाई शम्सुद्दीन नौ साल का। अमीरुद्दीन को तब यह भी पता नहीं था कि राग किस चिड़िया का नाम है — मामा लोग बात-बात पर 'भीमपलासी' और 'मुलतानी' कहते रहते थे।
अमीरुद्दीन का जन्म डुमराँव (बिहार) के एक संगीत-प्रेमी परिवार में हुआ। पाँच-छह वर्ष की उम्र में वह नाना के घर, ननिहाल काशी आ गया। उसके नाना सादिक हुसैन तथा परनाना सलार हुसैन खाँ प्रसिद्ध शहनाई वादक थे। डुमराँव का इतिहास भले बड़ा न हो, पर शहनाई और डुमराँव एक-दूसरे के लिए उपयोगी हैं — क्योंकि शहनाई बजाने के लिए जिस रीड का प्रयोग होता है, वह नरकट (एक प्रकार की घास) से बनती है, जो डुमराँव में सोन नदी के किनारों पर पाई जाती है।
चौदह वर्ष की उम्र में अमीरुद्दीन को बालाजी मंदिर में रियाज़ के लिए जाना पड़ता था। उस रास्ते में प्रसिद्ध गायिकाएँ रसूलनबाई और बतूलनबाई रहती थीं। उनकी ठुमरी, टप्पा, दादरा आदि सुनकर अमीरुद्दीन को संगीत के प्रति आसक्ति जगी। बिस्मिल्ला खाँ ने अनेक साक्षात्कारों में स्वीकार किया कि अनुभव की स्लेट पर संगीत-प्रेरणा की वर्णमाला इन्हीं गायिका बहनों ने उकेरी।
लेखक बताता है कि वैदिक इतिहास में शहनाई का उल्लेख नहीं मिलता; इसे 'सुषिर-वाद्यों' में गिना जाता है। फूँककर बजाए जाने वाले इस वाद्य को शहनाई की मधुरता के कारण 'सुषिर वाद्यों में शाह' की उपाधि दी गई। मंगल का परिवेश प्रतिष्ठित करने वाला यह वाद्य विवाह आदि मांगलिक अवसरों पर बजाया जाता है — दक्षिण भारत के 'नागस्वरम्' की तरह।
इसी मंगलध्वनि के नायक बिस्मिल्ला खाँ अस्सी बरस से सच्चे सुर की माँग कर रहे हैं। पाँचों वक़्त की नमाज़ इसी सुर को पाने की प्रार्थना में खर्च हो जाती है। वे नमाज़ के बाद सज़दे में गिड़गिड़ाते हैं — 'मेरे मालिक, एक सुर बख़्श दे।' मुहर्रम के दस दिनों के दौरान खाँ साहब का खानदान न शहनाई बजाता है, न किसी संगीत कार्यक्रम में शिरकत करता है। आठवीं तारीख़ को खाँ साहब आठ किलोमीटर तक रोते हुए पैदल चलते हुए नौहा बजाते हैं; उस दिन कोई राग नहीं बजता।
खाँ साहब अपनी जवानी के दिनों को याद करते हैं — अपने जुनून को, कुलसुम हलवाइन की कचौड़ी वाली दुकान को, और अभिनेत्रियों सुलोचना व गीताबाली को। बचपन में वे फ़िल्मों के दीवाने थे; सुलोचना उनकी पसंदीदा हीरोइन थीं। पक्का महाल की देशी घी वाली कचौड़ी छन से उठती तो उन्हें उसमें भी संगीत के आरोह-अवरोह सुनाई देते।
सन् 2000 में जब पक्का महाल से मलाई-बरफ़ और देशी घी की कचौड़ी की परंपराएँ लुप्त होने लगीं, तब खाँ साहब को इसकी बहुत कमी खली। एक शिष्या ने जब उन्हें फटी तहमद न पहनने की सलाह दी (क्योंकि उन्हें भारतरत्न मिल चुका था), तो उन्होंने कहा — "भारतरत्न हमको शहनइया पे मिला है, लुंगिया पे नाहीं।" वे केवल यही दुआ माँगते रहे — "फटा सुर न बख़्शें।"
नब्बे वर्ष की भरी-पूरी आयु में 21 अगस्त 2006 को बिस्मिल्ला खाँ इस दुनिया से विदा हुए। लेखक के अनुसार उनकी सबसे बड़ी देन यह है कि पूरे अस्सी बरस उन्होंने संगीत को संपूर्णता व एकाधिकार से सीखने की जिजीविषा को अपने भीतर ज़िंदा रखा।
3. बिस्मिल्ला खाँ का व्यक्तित्व व शहनाई से लगाव
बिस्मिल्ला खाँ का व्यक्तित्व अनेक प्रेरक गुणों से सजा था —
- सच्चे सुर के साधक: अस्सी बरस की साधना के बाद भी वे संतुष्ट नहीं थे; ईश्वर से और सच्चे सुर की भीख माँगते रहे। यही असंतोष एक महान कलाकार की पहचान है।
- विनम्र व सरल: भारतरत्न जैसे सर्वोच्च सम्मान के बाद भी उनमें घमंड नहीं आया। वे फटी तहमद में मिलते, क्योंकि उनके लिए दिखावे से अधिक भीतर की आस्था महत्त्वपूर्ण थी।
- धार्मिक व आस्थावान: सच्चे मुसलमान होने के साथ-साथ वे काशी विश्वनाथ व बालाजी के प्रति भी अपार श्रद्धा रखते थे। बाहर रहने पर भी विश्वनाथ की दिशा में मुँह करके शहनाई बजाते।
- संगीत को इबादत मानने वाले: उनके लिए शहनाई बजाना उपासना थी। पाँचों वक़्त की नमाज़ में वे सुर की दुआ माँगते।
- लगनशील व समर्पित: घंटों रियाज़ करते; मामू अलीबख़्श खाँ ने सम पर आने की तमीज़ बचपन में ही दे दी थी।
शहनाई से लगाव: शहनाई खाँ साहब की आत्मा का विस्तार थी। उनका मानना था कि शहनाई के सात सुर के साथ ही परवरदिगार, गंगा मइया और उस्ताद की नसीहत उतर पड़ते हैं। 'बिस्मिल्ला खाँ' का अर्थ ही था — बिस्मिल्ला खाँ की शहनाई, और 'शहनाई' का तात्पर्य था — बिस्मिल्ला खाँ का हाथ।
4. गंगा-जमुनी संस्कृति / धार्मिक सौहार्द
पाठ का सबसे महत्त्वपूर्ण संदेश हिंदू-मुस्लिम एकता और साझा संस्कृति का है। काशी में संगीत को भक्ति से, भक्ति को किसी भी धर्म के कलाकार से, कजरी को चैती से और विश्वनाथ को विशालाक्षी से अलग करके नहीं देखा जा सकता। बिस्मिल्ला खाँ को गंगाद्वार (बालाजी मंदिर/काशी) से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
एक मुसलमान कलाकार का काशी विश्वनाथ व बालाजी मंदिर के प्रति अपार श्रद्धा रखना गंगा-जमुनी तहज़ीब का सुंदर उदाहरण है। जिस तरह मुहर्रम-ताज़िया और होली-अबीर, गुलाल एक-दूसरे के पूरक हैं, उसी तरह बाबा विश्वनाथ और बिस्मिल्ला खाँ भी एक-दूसरे के पूरक रहे। लेखक खाँ साहब को "दो कौमों को एक होने व आपस में भाईचारे के साथ रहने की प्रेरणा" देने वाला नायाब हीरा कहता है। यही पाठ का जीवंत व प्रेरक संदेश है।
जब किसी ने खाँ साहब से काशी छोड़ने की बात की, तो उन्होंने कहा — "क्या करें मियाँ, ई काशी छोड़कर कहाँ जाएँ, गंगा मइया यहाँ, बाबा विश्वनाथ यहाँ, बालाजी का मंदिर यहाँ... शहनाई और काशी से बढ़कर कोई जन्नत नहीं इस धरती पर।" यह प्रसंग खाँ साहब की काशी व साझा संस्कृति से गहरी जुड़ाव को दर्शाता है।
5. भाषा-शैली
इस व्यक्तिचित्र की भाषा-शैली की प्रमुख विशेषताएँ —
- सहज व प्रवाहमयी: भाषा सरल, स्वाभाविक और बहती हुई है, जो पाठ को बार-बार पढ़ने के लिए आमंत्रित करती है।
- उर्दू-हिंदी का मिला-जुला रूप: 'इबादत', 'अदब', 'तहज़ीब', 'नौबतखाना', 'सज़दा', 'रियाज़', 'नौहा' जैसे उर्दू-फ़ारसी शब्दों का सहज प्रयोग — जो विषय के अनुरूप है।
- संवादात्मकता: खाँ साहब के अपने शब्दों ("भारतरत्न हमको शहनइया पे मिला है...") के सीधे उद्धरण से पाठ जीवंत बन गया है।
- संगीत की पारिभाषिक शब्दावली: 'सुषिर वाद्य', 'रीड', 'सम', 'श्रुति', 'राग', 'ठुमरी', 'टप्पा' आदि शब्द लेखक की शास्त्रीय संगीत की गहरी जानकारी प्रकट करते हैं।
- प्रसंगों व संदर्भों से भरी: रसूलनबाई, कुलसुम की कचौड़ी, सुलोचना, मुहर्रम आदि अनेक प्रसंग पाठ को रोचक व आत्मीय बनाते हैं।
- भावुक व संवेदनशील स्वर: काशी की लुप्त होती परंपराओं पर लेखक की पीड़ा भाषा में झलकती है।
6. कठिन शब्दार्थ
- ड्योढ़ी — दहलीज़, प्रवेश-द्वार।
- नौबतखाना — प्रवेश द्वार के ऊपर मंगल ध्वनि बजाने का स्थान।
- रियाज़ — अभ्यास।
- मार्फ़त — द्वारा, के माध्यम से।
- शृंगी — सींग का बना वाद्ययंत्र।
- मुरछंग — एक प्रकार का लोक वाद्ययंत्र।
- नेमत — ईश्वर की देन; सुख, धन-दौलत।
- सज़दा — माथा टेकना।
- इबादत — उपासना, आराधना।
- तासीर — गुण, प्रभाव, असर।
- श्रुति — शब्दध्वनि; एक स्वर से दूसरे स्वर पर जाते समय का अत्यंत सूक्ष्म स्वरांश।
- ऊहापोह — उलझन, अनिश्चितता।
- तिलिस्म — जादू।
- गमक — खुशबू, सुगंध।
- अज़ादारी — मातम करना, दुख मनाना।
- बदस्तूर — कायदे से, तरीके से।
- नैसर्गिक — स्वाभाविक, प्राकृतिक।
- दाद — शाबासी।
- तालीम — शिक्षा।
- अदब — कायदा, साहित्य।
- अलहमदुलिल्लाह — तमाम तारीफ़ें ईश्वर के लिए।
- जिजीविषा — जीने की इच्छा।
- शिरकत — शामिल होना।
- सुषिर वाद्य — फूँककर बजाए जाने वाले वाद्य (बाँसुरी, शहनाई आदि)।
- नौहा — मातम के समय गाया जाने वाला शोकगीत।
7. मुख्य भाव
पाठ का केंद्रीय भाव यह है कि सच्ची कला किसी धर्म, जाति या संप्रदाय की सीमाओं में बँधी नहीं होती — वह तो समर्पण, साधना और आस्था की उपज है। बिस्मिल्ला खाँ के लिए शहनाई बजाना केवल पेशा नहीं, बल्कि इबादत था। मुसलमान होते हुए भी उनका काशी, गंगा और विश्वनाथ से अटूट लगाव गंगा-जमुनी संस्कृति व धार्मिक सौहार्द का जीवंत प्रतीक है।
पाठ यह भी सिखाता है कि एक सच्चा कलाकार जीवनभर अपनी कला को और बेहतर बनाने की जिजीविषा रखता है, कभी संतुष्ट नहीं होता, और सादगी व विनम्रता उसका आभूषण होती है। साथ ही लेखक काशी की लुप्त होती सांस्कृतिक परंपराओं के प्रति चिंता व्यक्त करते हुए हमें अपनी विरासत सहेजने का संदेश देता है।
8. NCERT प्रश्न-अभ्यास के उत्तर
प्रश्न 1. शहनाई की दुनिया में डुमराँव को क्यों याद किया जाता है?
उत्तर: शहनाई की दुनिया में डुमराँव को दो कारणों से याद किया जाता है — (क) शहनाई बजाने के लिए जिस रीड का प्रयोग होता है, वह नरकट नामक घास से बनती है, जो मुख्यतः डुमराँव में सोन नदी के किनारों पर पाई जाती है। (ख) प्रसिद्ध शहनाई वादक बिस्मिल्ला खाँ का जन्म-स्थान भी डुमराँव ही है, और उनके पुरखे भी डुमराँव के निवासी थे।
प्रश्न 2. बिस्मिल्ला खाँ को शहनाई की मंगलध्वनि का नायक क्यों कहा गया है?
उत्तर: शहनाई एक मंगल वाद्य है, जो विवाह आदि शुभ व मांगलिक अवसरों पर बजाया जाता है तथा मंगल का परिवेश प्रतिष्ठित करता है। बिस्मिल्ला खाँ ने इसी मंगल वाद्य शहनाई को अपनी अद्भुत साधना से इतनी ऊँचाई दी कि शहनाई व बिस्मिल्ला खाँ एक-दूसरे के पर्याय बन गए। इसी कारण उन्हें शहनाई की मंगलध्वनि का नायक कहा गया है।
प्रश्न 3. सुषिर-वाद्यों से क्या अभिप्राय है? शहनाई को 'सुषिर वाद्यों में शाह' की उपाधि क्यों दी गई होगी?
उत्तर: सुषिर-वाद्य वे वाद्य होते हैं जिन्हें फूँककर बजाया जाता है, जैसे — बाँसुरी, शहनाई, नागस्वरम्, बीन आदि। शहनाई की ध्वनि अत्यंत मधुर, मांगलिक व सुरीली होती है और यह मन को आनंदित कर देती है। अपनी इसी मधुरता व श्रेष्ठता के कारण शहनाई को 'सुषिर वाद्यों में शाह' अर्थात् फूँककर बजाए जाने वाले वाद्यों में सर्वश्रेष्ठ की उपाधि दी गई होगी।
प्रश्न 4. आशय स्पष्ट कीजिए—
(क) 'फटा सुर न बख़्शें। लुंगिया का क्या है, आज फटी है, तो कल सी जाएगी।'
उत्तर: इसका आशय है कि खाँ साहब के लिए सांसारिक वस्तुओं (फटी लुंगी आदि) का कोई महत्त्व नहीं था। उन्हें केवल अपनी कला की चिंता थी। फटी लुंगी तो आज फटी है, कल सिल जाएगी, परंतु यदि सुर बिगड़ गया (फटा सुर मिल गया) तो उसे सुधारना संभव नहीं। वे ईश्वर से बस यही दुआ माँगते हैं कि उनका सुर कभी न बिगड़े।
(ख) 'मेरे मालिक सुर बख़्श दे। सुर में वह तासीर पैदा कर कि आँखों से सच्चे मोती की तरह अनगढ़ आँसू निकल आएँ।'
उत्तर: इसका आशय है कि खाँ साहब ईश्वर से ऐसा सच्चा व प्रभावशाली सुर माँगते हैं, जिसमें इतनी शक्ति (तासीर) हो कि उसे सुनकर श्रोताओं की आँखों से स्वयं ही सच्चे मोती जैसे आँसू (भावविभोर करने वाले आँसू) निकल आएँ। वे चाहते हैं कि उनका संगीत लोगों के हृदय को गहराई तक छू ले।
प्रश्न 5. काशी में हो रहे कौन-से परिवर्तन बिस्मिल्ला खाँ को व्यथित करते थे?
उत्तर: काशी में हो रहे निम्नलिखित परिवर्तन खाँ साहब को व्यथित करते थे — (क) पक्का महाल से मलाई-बरफ़ बेचने वालों का चले जाना; (ख) देशी घी की कचौड़ी-जलेबी की परंपरा का लुप्त होना; (ग) संगीत, साहित्य व अदब की अनेक प्राचीन परंपराओं का समाप्त होना; (घ) गायकों के मन में संगतियों के प्रति आदर का न रहना तथा रियाज़ की उपेक्षा; (ङ) कजली, चैती व अदब के माहौल का लुप्त होना।
प्रश्न 6. पाठ में आए किन प्रसंगों के आधार पर आप कह सकते हैं कि—
(क) बिस्मिल्ला खाँ मिली-जुली संस्कृति के प्रतीक थे।
उत्तर: मुसलमान होते हुए भी खाँ साहब काशी विश्वनाथ व बालाजी मंदिर के प्रति अपार श्रद्धा रखते थे, बाहर रहने पर भी विश्वनाथ की दिशा में मुँह करके शहनाई बजाते थे, तथा गंगा मइया व काशी को जन्नत मानते थे। मुहर्रम के साथ-साथ वे काशी की समस्त सांस्कृतिक परंपराओं का सम्मान करते थे। इन प्रसंगों से सिद्ध होता है कि वे हिंदू-मुस्लिम मिली-जुली (गंगा-जमुनी) संस्कृति के सच्चे प्रतीक थे।
(ख) वे वास्तविक अर्थों में एक सच्चे इनसान थे।
उत्तर: भारतरत्न जैसे सर्वोच्च सम्मान के बाद भी उनमें घमंड नहीं आया; वे फटी तहमद में सादगी से रहते थे। वे केवल सच्चे सुर की दुआ माँगते थे, सांसारिक दिखावे से दूर रहते थे और अपनी कला के प्रति पूर्ण समर्पित थे। मुहर्रम पर वे रोते हुए नौहा बजाते थे। इन प्रसंगों से प्रकट होता है कि वे विनम्र, सरल, संवेदनशील व सच्चे इनसान थे।
प्रश्न 7. बिस्मिल्ला खाँ के जीवन से जुड़ी उन घटनाओं और व्यक्तियों का उल्लेख करें जिन्होंने उनकी संगीत-साधना को समृद्ध किया?
उत्तर: (क) उनके नाना सादिक हुसैन व मामा अलीबख़्श खाँ शहनाई वादक थे, जिनसे उन्होंने तालीम पाई — मामा ने ही 'सम' पर आने की तमीज़ सिखाई। (ख) गायिका बहनें रसूलनबाई व बतूलनबाई की ठुमरी-टप्पा सुनकर उनके भीतर संगीत के प्रति आसक्ति जगी — खाँ साहब इन्हें ही अपनी संगीत-प्रेरणा की वर्णमाला उकेरने वाली मानते थे। (ग) बालाजी मंदिर की ड्योढ़ी व काशी का सांस्कृतिक वातावरण, संकटमोचन मंदिर के संगीत आयोजन तथा फ़िल्मों व कुलसुम की कचौड़ी जैसे प्रसंगों ने भी उनकी कला को समृद्ध किया।
प्रश्न 8 (रचना और अभिव्यक्ति). बिस्मिल्ला खाँ के व्यक्तित्व की कौन-कौन सी विशेषताओं ने आपको प्रभावित किया?
उत्तर: खाँ साहब की निम्नलिखित विशेषताओं ने प्रभावित किया — कला के प्रति अटूट समर्पण व लगन, सच्चे सुर की अनवरत साधना, विनम्रता व सादगी (भारतरत्न के बाद भी फटी तहमद पहनना), धार्मिक सहिष्णुता व सौहार्द, और जीवनभर सीखते रहने की जिजीविषा। ये सभी गुण उन्हें एक महान कलाकार व सच्चा इनसान बनाते हैं।
प्रश्न 9. मुहर्रम से बिस्मिल्ला खाँ का जुड़ाव अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर: मुहर्रम खाँ साहब के परिवार से जुड़ा सबसे महत्त्वपूर्ण मुस्लिम पर्व था। इन पूरे दस दिनों के शोक में उनका खानदान न शहनाई बजाता, न किसी संगीत कार्यक्रम में शिरकत करता। आठवीं तारीख़ खाँ साहब के लिए विशेष महत्त्व रखती थी — इस दिन वे खड़े होकर फातमान के पास लगभग आठ किलोमीटर तक रोते हुए पैदल चलते हुए नौहा बजाते थे। इस दिन कोई राग नहीं बजता; राग-रागिनियों की अदायगी का निषेध रहता है। यह उनकी हज़रत इमाम हुसैन के प्रति गहरी आस्था व शोक को दर्शाता है।
प्रश्न 10. बिस्मिल्ला खाँ कला के अनन्य उपासक थे, तर्क सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर: हाँ, खाँ साहब कला के अनन्य उपासक थे — (क) अस्सी बरस तक लगातार साधना करने पर भी वे संतुष्ट नहीं हुए और ईश्वर से सच्चा सुर माँगते रहे। (ख) पाँचों वक़्त की नमाज़ वे सुर पाने की प्रार्थना में लगाते थे। (ग) उन्होंने संगीत को इबादत माना और सांसारिक सुख-सुविधाओं की उपेक्षा की। (घ) भारतरत्न मिलने पर भी वे सादगी में रहे और कहा कि सम्मान शहनाई पर मिला है, लुंगी पर नहीं। ये सभी तर्क सिद्ध करते हैं कि वे कला के अनन्य व सच्चे उपासक थे।
9. ध्यान देने योग्य बातें
- बिस्मिल्ला खाँ का बचपन का नाम अमीरुद्दीन था; बड़े भाई का नाम शम्सुद्दीन।
- जन्म-स्थान डुमराँव (बिहार); ननिहाल काशी; नाना सादिक हुसैन।
- शहनाई की रीड नरकट घास से बनती है, जो सोन नदी के किनारे (डुमराँव) मिलती है।
- शहनाई सुषिर वाद्य है; इसे 'सुषिर वाद्यों में शाह' कहा गया। दक्षिण भारत का समकक्ष वाद्य नागस्वरम् है।
- संगीत-प्रेरणा देने वाली गायिकाएँ — रसूलनबाई व बतूलनबाई।
- खाँ साहब को भारतरत्न मिला; निधन 21 अगस्त 2006 को हुआ।
- 'सम' सिखाने वाले — मामा अलीबख़्श खाँ।
- प्रसिद्ध कथन — "भारतरत्न हमको शहनइया पे मिला है, लुंगिया पे नाहीं।"
10. त्वरित पुनरावृत्ति
- विधा: व्यक्तिचित्र (रेखाचित्र); लेखक: यतीन्द्र मिश्र।
- नायक: उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ — शहनाई वादक।
- केंद्रीय भाव: संगीत इबादत है; काशी की गंगा-जमुनी संस्कृति व धार्मिक सौहार्द।
- प्रमुख प्रसंग: बालाजी मंदिर का नौबतखाना, मुहर्रम का नौहा, कुलसुम की कचौड़ी, भारतरत्न व फटी तहमद, सच्चे सुर की दुआ।
- संदेश: सच्ची कला धर्म-जाति से परे है; समर्पण, विनम्रता व निरंतर साधना ही महानता की कुंजी है।
- यतीन्द्र मिश्र
- निदा फ़ाज़ली
- मन्नू भंडारी
- रामवृक्ष बेनीपुरी
- शम्सुद्दीन
- अमीरुद्दीन
- सादिक हुसैन
- अलीबख़्श
- काशी
- अयोध्या
- डुमराँव (बिहार)
- लखनऊ
- दूब
- कुश
- नरकट
- सरकंडा
- तत वाद्य
- सुषिर वाद्य
- घन वाद्य
- अवनद्ध वाद्य
- वाद्यों की रानी
- सुषिर वाद्यों में शाह
- मंगल वाद्य सम्राट
- नागस्वरम् का राजा
- गिरिजा देवी व सिद्धेश्वरी
- रसूलनबाई व बतूलनबाई
- केसरबाई व मोगुबाई
- गौहर जान व जद्दनबाई
- नाना सादिक हुसैन
- मामा अलीबख़्श खाँ
- भाई शम्सुद्दीन
- उस्ताद सलार हुसैन
- ईद
- बकरीद
- मुहर्रम
- शब-ए-बरात
- संगीत
- शहनइया
- इज़्ज़त
- नमाज़
- गीताबाली
- सुलोचना
- नरगिस
- मधुबाला
- 21 अगस्त 2006
- 15 अगस्त 2005
- 21 मार्च 2006
- 26 जनवरी 2007
- शिक्षा
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