माता का आँचल

www.akankshaclasses.com
CLASS X Hindi ~4 marks/year Ch 13 of 15
माता का आँचल

Class 10 · Hindi · NCERT chapter notes · Akanksha Classes

सार एक नज़र में
  • यह संस्मरणात्मक पाठ शिवपूजन सहाय के उपन्यास 'देहाती दुनिया' का एक अंश है, जिसमें भोलानाथ नामक बालक का बचपन सजीव रूप में चित्रित हुआ है।
  • पूरे पाठ में बालक का अपने पिता (बाबू जी) से गहरा लगाव दिखता है — खेलना, कुश्ती लड़ना, पूजा में साथ बैठना, गंगा-तट जाना।
  • पाठ का केंद्रीय भाव यह है कि विपत्ति आने पर बालक पिता को छोड़कर माँ के आँचल में ही शरण पाता है — माँ की ममता सबसे बड़ा सुरक्षा-कवच है।
  • पाठ में तीस के दशक के ग्रामीण जीवन, बाल-क्रीड़ाओं, मेले-त्योहारों और तुकबंदियों का जीवंत चित्र मिलता है।
  • भाषा: ठेठ देहाती बोली, लोक-गीत व तुकबंदी से भरी, अत्यंत सजीव व चित्रात्मक।
  • बोर्ड में महत्त्व: कृतिका से प्रायः ~4 अंक — एक लघु/दीर्घ उत्तरीय प्रश्न तथा कभी-कभी बहुविकल्पीय/अभिकथन-कारण।
विस्तृत नोट्स

1. लेखक परिचय — शिवपूजन सहाय

शिवपूजन सहाय हिंदी के प्रसिद्ध कथाकार, संपादक एवं गद्य-शिल्पी थे। उनका जन्म सन् 1893 में बिहार के भोजपुर ज़िले के उनवाँस गाँव में हुआ और निधन सन् 1963 में हुआ। वे आरंभ में अध्यापन से जुड़े, फिर पत्रकारिता और संपादन के क्षेत्र में आए। उन्होंने मतवाला, माधुरी, हिमालय, जागरण जैसी अनेक प्रतिष्ठित पत्रिकाओं का संपादन किया और भाषा को निखारने में आजीवन लगे रहे। उनकी भाषा-सेवा के कारण उन्हें 'भाषा का शोधक' भी कहा जाता है।

उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं — उपन्यास 'देहाती दुनिया' (हिंदी का पहला आंचलिक उपन्यास माना जाता है), कहानी-संग्रह, संस्मरण व निबंध। उनकी भाषा में ग्रामीण जीवन की सजीवता, लोक-संस्कृति की महक और देहाती बोली का रस भरपूर मिलता है। प्रस्तुत पाठ 'माता का अँचल' इसी उपन्यास 'देहाती दुनिया' का एक अंश है, जिसमें ग्रामीण बाल-जीवन और माता-पिता के वात्सल्य का अत्यंत मार्मिक चित्रण है।

2. पाठ का विस्तृत सार

पाठ का नायक एक छोटा बालक है जिसे उसके पिता प्यार से 'भोलानाथ' कहकर पुकारते हैं, माता उसे 'तारकेश्वरनाथ' नाम से बुलाती हैं। बालक पिता को 'बाबू जी' और माता को 'मइयाँ' कहता है।

दिनचर्या व पिता से लगाव: बाबू जी तड़के उठकर निवृत्त होकर पूजा करने बैठ जाते थे। बालक बचपन से ही उनके अंग लगा रहता था; माता से तो केवल दूध पीने तक का नाता था। पिता उसे साथ ही उठाते, नहला-धुलाकर पूजा पर बिठा लेते। बालक भभूत का तिलक लगवाने का हठ करता तो पिता उसके चौड़े ललाट पर त्रिपुंड बना देते और बालक 'बम-भोला' बन जाता। बाबू जी जब रामायण का पाठ करते तब बालक बगल में बैठकर आईने में अपना मुँह निहारता रहता।

गंगा-तट व कुश्ती: पूजा के बाद पिता राम-नाम लिखी आटे की गोलियाँ लेकर गंगा जी की ओर चल पड़ते; बालक उनके कंधे पर सवार रहता। पिता मछलियों को गोलियाँ खिलाते और लौटते समय पेड़ की डाल पर बालक को झूला झुलाते। कभी-कभी बाबू जी बालक से कुश्ती भी लड़ते — जान-बूझकर ढीले पड़ जाते और बालक का बल बढ़ाते, फिर हार जाते। बालक उनकी मूँछें नोचता तो वे हँसते-हँसते उसे चूम लेते। खट्टा-मीठा चुम्मा माँगने पर वे दोनों गालों पर बारी-बारी से दाढ़ी-मूँछ गड़ा देते और बालक बनावटी रोना रोने लगता।

भोजन व माँ की ममता: घर लौटकर पिता अपने हाथ से फूल के कटोरे में गोरस-भात सानकर बालक को खिलाते। बालक भरपेट खा चुकता फिर भी मइयाँ और खिलाने का हठ करती और तोता, मैना, कबूतर, हंस, मोर आदि के बनावटी नाम ले-लेकर भोजन खिलातीं — कहतीं कि अभी ये उड़ जाएँगे, जल्दी खा लो। बालक मचलता तब मइयाँ कड़वा तेल सिर में डालकर, काजल की बिंदी लगाकर, चोटी गूँथकर 'कन्हैया' बना देतीं।

बाल-क्रीड़ाएँ व नाटक: बाहर बालकों का झुंड साथी बन जाता और वे तरह-तरह के नाटक रचते — चबूतरे पर मिठाई की दुकान सजाते (ठीकरे पैसे, मिट्टी की जलेबियाँ), घरौंदा बनाते, ज्योनार/भोज रचाते, बारात का जुलूस निकालते, समधी बनकर बकरे पर चढ़ते, और खेती का खेल खेलते — हल-जुआठा, बीज, फसल काटना सब अभिनय करते। हर खेल के साथ वे मज़ेदार तुकबंदियाँ गाते।

आँधी-वर्षा व भागना: एक दिन ज़ोर की आँधी आई, मेघ गरजने लगे, मूसलाधार वर्षा हुई। वर्षा बंद होते ही बाग में बहुत-से बिच्छू निकल आए। बालक घबराकर भागे; रास्ते में मूसन तिवारी मिले तो उन्हें चिढ़ाने लगे, जिससे तिवारी जी ने डंडा लेकर खदेड़ा और गुरु जी से शिकायत कर दी। गुरु जी के सिपाहियों ने बालकों को पकड़ लिया।

मार्मिक क्लाइमेक्स — माँ का आँचल: बालक पाठशाला से छूटकर साथियों के साथ चूहों के बिल में पानी डाल रहा था कि अचानक एक साँप निकल आया। सब बच्चे चीखते-भागे — कोई गिरा, किसी का सिर फूटा, किसी के दाँत टूटे, बालक की देह लहूलुहान हो गई, पैरों के तलवे काँटों से छलनी हो गए। वह दौड़ता हुआ सीधे घर पहुँचा। उस समय बाबू जी बैठक में हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे और उन्होंने बहुत पुकारा, पर बालक उनकी अनसुनी करके सीधे मइयाँ के पास गया और उसी के आँचल में छिप गया। मइयाँ उसे काँपते देख रो पड़ीं, हल्दी पीसकर घावों पर लगाने लगीं और लाड़ से सीने से लगा लिया। तभी बाबू जी भी दौड़े आए और बालक को मइयाँ की गोद से अपनी गोद में लेने लगे — पर बालक ने माँ के आँचल की छाया न छोड़ी। यही पाठ का चरम भाव है — संकट में माँ का आँचल ही सबसे बड़ी शरण है।

3. भोलानाथ व उसके पिता का संबंध

पाठ के अधिकांश भाग में बालक का पिता से अद्भुत लगाव दिखाया गया है, जो प्रायः माँ-बेटे के पारंपरिक चित्रण से भिन्न है—

  • बालक बचपन से ही पिता के अंग लगा रहता था; पिता के साथ ही बाहर बैठक में सोता था।
  • पिता उसे नहला-धुलाकर पूजा पर बिठाते, तिलक लगाते, रामायण-पाठ के समय साथ रखते।
  • गंगा-तट तक वह पिता के कंधे पर सवार रहता; पिता उसे झूला झुलाते।
  • पिता उससे कुश्ती लड़ते, जान-बूझकर हारते, चुम्मा देते — मित्र की तरह घुल-मिल जाते।
  • पिता ही उसे अपने हाथ से भोजन कराते।

पिता का यह वात्सल्य सख्ती से नहीं बल्कि सखा-भाव और स्नेह से भरा है। फिर भी — और यही पाठ की विशेषता है — विपत्ति के क्षण में बालक पिता की पुकार अनसुनी करके माँ की शरण में जाता है। इससे सिद्ध होता है कि आनंद और खेल के लिए पिता का साथ भले प्रिय हो, पर भय और पीड़ा में माँ की ममता ही सबसे बड़ा सहारा बनती है।

4. बाल-मनोविज्ञान व माँ का आँचल

लेखक ने बाल-मनोविज्ञान का सूक्ष्म चित्रण किया है—

  • अनुकरण-प्रवृत्ति: बच्चे बड़ों के सारे काम — पूजा, भोज, बारात, खेती, मिठाई की दुकान — नाटक के रूप में दोहराते हैं। यही बाल-स्वभाव का सहज गुण है।
  • कल्पनाशीलता: मिट्टी की जलेबियाँ, ठीकरों के पैसे, धूल का घी — बच्चे साधारण वस्तुओं में पूरी दुनिया रच लेते हैं।
  • हठ व मचलना: बालक का तिलक के लिए हठ करना, बनावटी रोना — सब बाल-सुलभ चेष्टाएँ हैं।
  • संगति का प्रभाव: साथियों को देखते ही बालक का सिसकना भूल जाना दिखाता है कि बच्चों के लिए खेल और संगति कितने प्रबल हैं।

पाठ का शीर्षक 'माता का अँचल' इसी मर्म को उजागर करता है — आँचल केवल कपड़े का टुकड़ा नहीं, बल्कि माँ की ममता, सुरक्षा और प्रेम का प्रतीक है। संकट में बच्चा वहीं छिपता है जहाँ उसे सबसे अधिक सुरक्षा व निश्छल प्रेम मिलता है — और वह स्थान है माँ का आँचल।

5. भाषा-शैली

  • देहाती/आंचलिक भाषा: 'मइयाँ', 'बाबू जी', 'भभूत', 'गोरस', 'ज्योनार', 'चँदोबा', 'बटखरे' जैसे ठेठ ग्रामीण शब्द भाषा को सजीव बनाते हैं।
  • चित्रात्मकता: हर दृश्य आँखों के सामने सजीव हो उठता है — कुश्ती, गंगा-तट, आँधी-वर्षा, साँप का निकलना।
  • लोक-गीत व तुकबंदी: "जब खाएगा बड़े-बड़े कौर, तब पाएगा दुनिया में ठौर", "ऊँच नीच में बई कियारी, जो उपजी सो भई हमारी" जैसी तुकबंदियाँ लोक-रंग भरती हैं।
  • संस्मरणात्मक शैली: उत्तम पुरुष ('हम') में लिखा गया, बीते बचपन की स्मृति का मधुर एवं मार्मिक चित्रण।
  • संवादात्मकता व सजीवता: मइयाँ-बाबू जी के संवाद कथा को जीवंत बनाते हैं।

6. कठिन शब्दार्थ

  • तड़के — प्रभात, सवेरे।
  • लिलार / ललाट — माथा।
  • त्रिपुंड — ललाट पर तीन आड़ी रेखाओं वाला तिलक।
  • भभूत — पवित्र राख, विभूति।
  • उतान — पीठ के बल लेटना।
  • गोरस — दूध, दही आदि।
  • अफर जाना — भरपेट से अधिक खा लेना।
  • महतारी — माता।
  • ठौर — स्थान, ठिकाना।
  • चँदोबा — छोटा शामियाना।
  • ज्योनार — भोज, दावत।
  • जीमना — भोजन करना।
  • अमोला — आम का उगता हुआ पौधा।
  • ओहार — परदे के लिए डाला हुआ कपड़ा।
  • कसोरा — मिट्टी का बना छिछला कटोरा।
  • रहरी — अरहर।
  • अँठई — कुत्ते के शरीर में चिपके रहने वाले छोटे कीड़े।
  • चिरौरी — दीनतापूर्वक की जाने वाली प्रार्थना, विनती।
  • ओसारा / बरामदा — दालान।
  • अमनिया — साफ़, शुद्ध।

7. मुख्य भाव / संदेश

इस पाठ का मूल भाव है — माँ की ममता और वात्सल्य की अतुलनीय शक्ति। चाहे बालक का लगाव पिता से कितना ही गहरा क्यों न हो, संकट और पीड़ा के क्षण में उसे सच्ची शांति और सुरक्षा माँ के आँचल में ही मिलती है। साथ ही पाठ तीस के दशक के ग्रामीण भारत के सरल, सहज और स्नेहपूर्ण जीवन, बाल-क्रीड़ाओं तथा लोक-संस्कृति का मनोहारी चित्र प्रस्तुत करता है। यह बचपन की मासूमियत, कल्पनाशीलता और माता-पिता के निश्छल प्रेम का अमर दस्तावेज़ है।

प्रसंग — कुश्ती व चुम्मा

बाबू जी बालक से कुश्ती लड़ते समय जान-बूझकर शिथिल पड़ जाते ताकि बालक का आत्मविश्वास बढ़े। बालक उनकी मूँछें नोचता तो वे हँसते-हँसते उसे चूम लेते; खट्टा-मीठा चुम्मा माँगने पर दोनों गालों पर दाढ़ी-मूँछ गड़ा देते। यह प्रसंग पिता के निश्छल वात्सल्य व सखा-भाव को दर्शाता है।

प्रसंग — साँप का निकलना और माँ की शरण

चूहों के बिल में पानी डालते समय साँप निकल आया; सब बच्चे लहूलुहान होकर भागे। बालक सीधे घर आकर पिता की पुकार अनसुनी कर मइयाँ के आँचल में छिप गया और बाबू जी के गोद में लेने पर भी आँचल न छोड़ा। यह पाठ का सर्वाधिक मार्मिक प्रसंग है, जो माँ की ममता की सर्वोच्चता सिद्ध करता है।

8. NCERT प्रश्न-अभ्यास — संपूर्ण उत्तर

प्रश्न 1. प्रस्तुत पाठ के आधार पर यह कहा जा सकता है कि बच्चे का अपने पिता से अधिक जुड़ाव था, फिर भी विपत्ति के समय वह पिता के पास न जाकर माँ की शरण लेता है। इसकी क्या वजह हो सकती है?

उत्तर: बच्चे का पिता से जुड़ाव खेल, आनंद और दिनचर्या के स्तर पर था — पिता उसे घुमाते, कुश्ती लड़ते, खिलाते। परंतु माँ की ममता में जो निश्छल प्रेम, कोमलता और सुरक्षा का भाव होता है, वह सबसे गहरा है। संकट और पीड़ा के क्षण में बच्चे को सहज रूप से वही स्थान सबसे सुरक्षित लगता है जहाँ उसे पूर्ण ममता मिले। माँ का आँचल उसी सुरक्षा व ममता का प्रतीक है, इसलिए विपत्ति में बालक माँ की शरण में ही गया।

प्रश्न 2. आपके विचार से भोलानाथ अपने साथियों को देखकर सिसकना क्यों भूल जाता है?

उत्तर: बच्चों के लिए खेल और संगति सबसे बड़ा आकर्षण होते हैं। भोलानाथ साथियों को देखते ही समझ जाता है कि अब खूब खेल होगा और आनंद आएगा। बाल-मन क्षणभंगुर होता है — दुख जल्दी भूल जाता है। इसलिए साथियों का झुंड देखते ही उसका रोना-सिसकना भूल जाता है और वह उत्साह से उनके साथ खेलने में लग जाता है।

प्रश्न 3. आपने देखा होगा कि भोलानाथ और उसके साथी जब-तब खेलते-खाते समय किसी न किसी प्रकार की तुकबंदी करते हैं। आपको यदि अपने खेलों आदि से जुड़ी तुकबंदी याद हो तो लिखिए।

उत्तर: (विद्यार्थी अपने अनुभव से लिखें।) पाठ में आई कुछ तुकबंदियाँ — "जब खाएगा बड़े-बड़े कौर, तब पाएगा दुनिया में ठौर", "ऊँच नीच में बई कियारी, जो उपजी सो भई हमारी", "राम जी की चिरई, राम जी का खेत, खा लो चिरई, भर-भर पेट"। ऐसी ही लोकप्रिय तुकबंदियाँ — "अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बो", "चंदा मामा दूर के", "आलू कचालू बेटा कहाँ गए थे" आदि।

प्रश्न 4. भोलानाथ और उसके साथियों के खेल और खेलने की सामग्री आपके खेल और खेलने की सामग्री से किस प्रकार भिन्न है?

उत्तर: भोलानाथ और उसके साथी प्राकृतिक व घरेलू वस्तुओं — मिट्टी, धूल, ठीकरे, तिनके, टूटे बरतन — से खेल बनाते थे। उनके खेल बड़ों के जीवन का अनुकरण थे — मिठाई की दुकान, भोज, बारात, खेती। आज के बच्चों के पास तैयार व इलेक्ट्रॉनिक खिलौने (मोबाइल, वीडियो गेम, रिमोट कारें) होते हैं, जो प्रायः घर के भीतर अकेले खेले जाते हैं। पुराने खेल सामूहिक, कल्पनाशील व प्रकृति-संग थे, जबकि आज के खेल अधिक व्यक्तिगत व यांत्रिक हैं।

प्रश्न 5. पाठ में आए ऐसे प्रसंगों का वर्णन कीजिए जो आपके दिल को छू गए हों।

उत्तर: (विद्यार्थी अपनी पसंद से।) दिल को छू लेने वाले प्रसंग — (1) बाबू जी का बालक से कुश्ती लड़ना और जान-बूझकर हार जाना; (2) मइयाँ का तोता-मैना के बनावटी नाम लेकर भोजन खिलाना; (3) सबसे मार्मिक — साँप के भय से लहूलुहान बालक का माँ के आँचल में छिपना और बाबू जी के गोद में लेने पर भी आँचल न छोड़ना।

प्रश्न 6. इस उपन्यास अंश में तीस के दशक की ग्राम्य संस्कृति का चित्रण है। आज की ग्रामीण संस्कृति में आपको किस तरह के परिवर्तन दिखाई देते हैं?

उत्तर: आज की ग्रामीण संस्कृति में अनेक परिवर्तन आए हैं — शिक्षा, बिजली, मोबाइल व इंटरनेट की पहुँच बढ़ी है; पारंपरिक सामूहिक खेल घटे हैं; संयुक्त परिवार टूट रहे हैं; खेती में मशीनों का प्रयोग बढ़ा है। पहले की सहजता, सामूहिकता और प्रकृति से जुड़ाव अब कम होता जा रहा है, जबकि सुविधाएँ और आधुनिकता बढ़ी है। फिर भी अनेक लोक-परंपराएँ व त्योहार आज भी जीवित हैं।

प्रश्न 7. पाठ पढ़ते-पढ़ते आपको भी अपने माता-पिता का लाड़-प्यार याद आ रहा होगा। अपनी इन भावनाओं को डायरी में अंकित कीजिए।

उत्तर: (विद्यार्थी स्वयं डायरी-शैली में लिखें — माता-पिता के स्नेह, उनके त्याग, बचपन की किसी मधुर स्मृति तथा कृतज्ञता के भाव को सरल व भावपूर्ण भाषा में व्यक्त करें।)

प्रश्न 8. यहाँ माता-पिता का बच्चे के प्रति जो वात्सल्य व्यक्त हुआ है उसे अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर: पिता का वात्सल्य खेल व सखा-भाव में प्रकट होता है — कुश्ती, झूला, चुम्मा, अपने हाथ से भोजन कराना, तिलक लगाना। माता का वात्सल्य कोमलता व देखभाल में दिखता है — बनावटी नामों से प्यार से खिलाना, सजाना-सँवारना, और संकट में रो-रोकर घावों पर हल्दी लगाना तथा आँचल में छिपा लेना। दोनों का प्रेम निश्छल व गहरा है, पर माँ का आँचल सुरक्षा का परम प्रतीक बनकर उभरता है।

प्रश्न 9. 'माता का अँचल' शीर्षक की उपयुक्तता बताते हुए कोई अन्य शीर्षक सुझाइए।

उत्तर: यद्यपि पाठ के अधिकांश भाग में पिता से जुड़ाव है, पर पाठ का चरम और मूल संदेश यही है कि संकट में बालक माँ के आँचल में शरण पाता है। आँचल ममता व सुरक्षा का प्रतीक है, अतः शीर्षक पूर्णतः उपयुक्त है। अन्य संभावित शीर्षक — 'बचपन के दिन', 'मइयाँ की ममता', 'भोलानाथ', 'देहाती बचपन', 'ममता की छाँव'

प्रश्न 10. बच्चे माता-पिता के प्रति अपने प्रेम को कैसे अभिव्यक्त करते हैं?

उत्तर: बच्चे अपने प्रेम को शब्दों से कम, व्यवहार और स्पर्श से अधिक व्यक्त करते हैं — पिता के अंग लगे रहना, कंधे पर चढ़ना, हठ करना, उनके साथ खेलना, और संकट में माँ की गोद में छिप जाना। भोलानाथ का पिता की मूँछें नोचना और माँ का आँचल न छोड़ना — दोनों ही बाल-सुलभ प्रेम की सहज अभिव्यक्तियाँ हैं।

प्रश्न 11. इस पाठ में बच्चों की जो दुनिया रची गई है वह आपके बचपन की दुनिया से किस तरह भिन्न है?

उत्तर: पाठ की दुनिया प्रकृति, सामूहिकता और कल्पना से भरी है — बच्चे खुले मैदानों, बागों व खेतों में मिल-जुलकर खेलते थे। आज की दुनिया अधिक घर-केंद्रित, तकनीकी व प्रतिस्पर्धी है — पढ़ाई का दबाव, मोबाइल-स्क्रीन व सीमित खुली जगह। पहले के बच्चों के पास सादगी व स्वतंत्रता अधिक थी, आज सुविधाएँ अधिक पर सहज मुक्त खेल कम। (विद्यार्थी अपने अनुभव जोड़ें।)

प्रश्न 12. फणीश्वरनाथ रेणु और नागार्जुन की आंचलिक रचनाओं को पढ़िए।

उत्तर: (परियोजना-कार्य।) फणीश्वरनाथ रेणु का 'मैला आँचल' तथा कहानी 'तीसरी कसम', एवं नागार्जुन के उपन्यास 'बलचनमा', 'रतिनाथ की चाची' आदि आंचलिक रचनाएँ पढ़कर ग्रामीण जीवन, लोक-भाषा व आंचलिकता के सौंदर्य का अनुभव कीजिए।

9. ध्यान देने योग्य बातें व त्वरित पुनरावृत्ति

ध्यान देने योग्य बातें:

  • लेखक का नाम शिवपूजन सहाय है — परीक्षा में प्रायः पूछा जाता है। यह अंश उपन्यास 'देहाती दुनिया' से लिया गया है।
  • बालक के दो नाम — पिता द्वारा 'भोलानाथ', माता द्वारा 'तारकेश्वरनाथ'। यह तथ्य भ्रमित न करे।
  • पाठ का अधिकांश भाग पिता-लगाव का है, पर केंद्रीय संदेश माँ की ममता है — उत्तर लिखते समय यही संतुलन रखें।
  • तीस के दशक के ग्रामीण जीवन व लोक-संस्कृति का उल्लेख अंक बढ़ाता है।
  • तुकबंदियाँ व देहाती शब्द उद्धृत करने से उत्तर सजीव बनता है।

त्वरित पुनरावृत्ति:

  • लेखक — शिवपूजन सहाय; स्रोत — 'देहाती दुनिया' उपन्यास।
  • नायक — भोलानाथ; पिता — बाबू जी; माता — मइयाँ।
  • पिता से लगाव — पूजा, कुश्ती, गंगा-तट, भोजन, झूला।
  • चरम घटना — साँप का भय → माँ के आँचल में शरण।
  • केंद्रीय भाव — संकट में माँ की ममता ही सर्वोच्च शरण।
  • भाषा — आंचलिक, चित्रात्मक, लोक-गीत व तुकबंदी से युक्त।
अभ्यास — बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)
1. 'माता का अँचल' पाठ के लेखक कौन हैं?
  1. फणीश्वरनाथ रेणु
  2. शिवपूजन सहाय
  3. नागार्जुन
  4. प्रेमचंद
उत्तर: (B) शिवपूजन सहाय।
2. यह पाठ किस उपन्यास का अंश है?
  1. मैला आँचल
  2. गोदान
  3. देहाती दुनिया
  4. बलचनमा
उत्तर: (C) 'देहाती दुनिया'।
3. बालक को उसके पिता किस नाम से पुकारते थे?
  1. तारकेश्वरनाथ
  2. कन्हैया
  3. भोलानाथ
  4. बाबू जी
उत्तर: (C) भोलानाथ।
4. माता बालक को किस नाम से बुलाती थीं?
  1. भोलानाथ
  2. तारकेश्वरनाथ
  3. बम-भोला
  4. मइयाँ
उत्तर: (B) तारकेश्वरनाथ।
5. विपत्ति के समय बालक किसकी शरण में जाता है?
  1. पिता के
  2. गुरु जी के
  3. माँ के आँचल में
  4. साथियों के
उत्तर: (C) माँ के आँचल में।
6. बालक के माँ के आँचल में छिपने का कारण क्या था?
  1. भूख
  2. साँप का भय व चोट
  3. पढ़ाई से डर
  4. आँधी
उत्तर: (B) चूहों के बिल से साँप निकल आने के भय और चोट से।
7. पिता पूजा से पहले बालक के माथे पर क्या लगाते थे?
  1. काजल
  2. भभूत का त्रिपुंड तिलक
  3. चंदन
  4. रोली
उत्तर: (B) भभूत का त्रिपुंड तिलक।
8. 'गोरस' शब्द का अर्थ है—
  1. दूध-दही
  2. भोज
  3. राख
  4. माथा
उत्तर: (A) दूध-दही आदि।
9. 'ज्योनार' का अर्थ है—
  1. झूला
  2. भोज, दावत
  3. तिलक
  4. शामियाना
उत्तर: (B) भोज, दावत।
10. बालक पिता को क्या कहकर पुकारता था?
  1. मइयाँ
  2. बाबू जी
  3. गुरु जी
  4. भोलानाथ
उत्तर: (B) बाबू जी।
11. बच्चे चबूतरे पर किन-किन का अभिनय/खेल रचते थे?
  1. मिठाई की दुकान, भोज, बारात, खेती
  2. केवल पढ़ाई
  3. केवल कुश्ती
  4. केवल पूजा
उत्तर: (A) मिठाई की दुकान, भोज, बारात, खेती आदि का।
12. पाठ में किस दशक की ग्राम्य संस्कृति का चित्रण है?
  1. बीस के दशक
  2. तीस के दशक
  3. चालीस के दशक
  4. पचास के दशक
उत्तर: (B) तीस के दशक की।
13. बारात के खेल में बालक क्या बनकर बकरे पर चढ़ते थे?
  1. दूल्हा
  2. समधी
  3. दुलहिन
  4. बाराती
उत्तर: (B) समधी।
14. 'कसोरा' किसे कहते हैं?
  1. आम का पौधा
  2. मिट्टी का छिछला कटोरा
  3. परदे का कपड़ा
  4. हल
उत्तर: (B) मिट्टी का बना छिछला कटोरा।
अभिकथन–कारण
अभिकथन (A): विपत्ति के समय बालक पिता को छोड़कर माँ की शरण में जाता है।   कारण (R): माँ की ममता व आँचल बालक को सर्वाधिक सुरक्षा का अनुभव कराते हैं।
उत्तर: A और R दोनों सही हैं, तथा R, A की सही व्याख्या करता है। संकट में बालक वहीं शरण पाता है जहाँ उसे सबसे अधिक सुरक्षा व ममता मिले — माँ का आँचल।
अभिकथन (A): बालक का अधिकांश समय पिता के साथ बीतता था।   कारण (R): बालक का माँ से कोई संबंध नहीं था।
उत्तर: A सही है, परंतु R ग़लत है। बालक का पिता से दैनिक जुड़ाव अधिक था, पर माँ से उसका गहरा ममतामय संबंध था — संकट में वह माँ के ही आँचल में छिपा।
विगत वर्ष के प्रश्न
प्र.1 'माता का अँचल' पाठ के आधार पर बच्चे के पिता के प्रति लगाव का वर्णन कीजिए। (CBSE, 4 अंक)
संकेत: बालक पिता के अंग लगा रहता था, साथ सोता-पूजा करता, कंधे पर गंगा-तट जाता, कुश्ती लड़ता, झूला झूलता, और पिता ही उसे अपने हाथ से भोजन कराते — यह सखा-भाव व वात्सल्य से भरा गहरा संबंध था।
प्र.2 विपत्ति के समय भोलानाथ पिता के पास न जाकर माँ की शरण में क्यों जाता है? (CBSE, 3 अंक)
संकेत: पिता से जुड़ाव खेल-आनंद का था, पर माँ की ममता में निश्छल प्रेम व सुरक्षा का परम भाव है। भय-पीड़ा में बालक को सबसे सुरक्षित स्थान माँ का आँचल लगता है, इसलिए वह वहीं शरण लेता है।
प्र.3 'माता का अँचल' शीर्षक की सार्थकता सिद्ध कीजिए। (CBSE, 3 अंक)
संकेत: भले पाठ में पिता-लगाव अधिक हो, पर पाठ का चरम व मूल संदेश यही है कि संकट में बालक माँ के आँचल में शरण पाता है। आँचल ममता व सुरक्षा का प्रतीक है, अतः शीर्षक पूर्णतः सार्थक है।
प्र.4 पाठ में चित्रित तीस के दशक के ग्रामीण बाल-जीवन की विशेषताएँ लिखिए। (CBSE, 4 अंक)
संकेत: सामूहिक व कल्पनाशील खेल (मिठाई की दुकान, भोज, बारात, खेती), प्राकृतिक वस्तुओं से खिलौने, लोक-गीत व तुकबंदियाँ, खुले बाग-खेतों में स्वच्छंद जीवन, तथा माता-पिता का निश्छल वात्सल्य — यही उस ग्राम्य बाल-जीवन की विशेषताएँ हैं।
Want personal coaching in Dwarka?
Book a free demo class
More Class 10 Hindi chapters