- यह अज्ञेय का एक आत्मपरक निबंध है, जिसमें वे टटोलते हैं कि वे आख़िर क्यों लिखते हैं।
- लेखक के अनुसार लिखने का सच्चा कारण उसकी आंतरिक विवशता है — लिखकर ही वह अपने भीतर के दबाव को पहचानता है और उससे मुक्त होता है।
- बाहरी दबाव (संपादक का आग्रह, प्रकाशक का तकाज़ा, आर्थिक ज़रूरत) भी लेखन कराता है, पर सच्चा रचनाकार दोनों में भेद बनाए रखता है।
- हिरोशिमा के अनुभव का उदाहरण देकर वे बताते हैं कि घटना का अनुभव काफ़ी नहीं — जब वह अनुभूति बन जाता है, तभी सच्ची रचना जन्म लेती है।
- बोर्ड महत्त्व: ~4 अंक/वर्ष — प्रायः एक दीर्घ-उत्तर (आंतरिक विवशता / हिरोशिमा-प्रसंग) तथा एक लघु-उत्तर पूछा जाता है।
1. लेखक परिचय (अज्ञेय)
इस पाठ के लेखक सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' हैं — हिंदी साहित्य के प्रयोगवाद तथा नई कविता के प्रवर्तक माने जाते हैं।
- जन्म: सन् 1911, कसया (देवरिया, उत्तर प्रदेश) के पास एक पुरातत्त्व-खुदाई शिविर में। निधन: सन् 1987।
- शिक्षा व रुचि: वे विज्ञान के विद्यार्थी रहे; उनकी नियमित शिक्षा विज्ञान विषय में हुई — यही बात इस निबंध में हिरोशिमा-प्रसंग को गहराई देती है।
- प्रमुख कृतियाँ: काव्य-संग्रह हरी घास पर क्षण भर, आँगन के पार द्वार, अरी ओ करुणा प्रभामय; उपन्यास शेखर: एक जीवनी, नदी के द्वीप; तथा प्रसिद्ध काव्य-संकलन तार सप्तक का संपादन।
- सम्मान: 'कितनी नावों में कितनी बार' पर साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा 'आँगन के पार द्वार' पर ज्ञानपीठ पुरस्कार।
- शैली विशेषता: बौद्धिकता, आत्मचिंतन, सूक्ष्म संवेदना और प्रयोगधर्मिता — ये उनकी रचनाओं की पहचान हैं।
2. निबंध का विस्तृत सार
निबंध का आरंभ एक सरल-से दिखने वाले प्रश्न से होता है — "मैं क्यों लिखता हूँ?" लेखक स्वीकार करते हैं कि यह प्रश्न देखने में सरल पर वास्तव में बहुत कठिन है, क्योंकि इसका सच्चा उत्तर लेखक के आंतरिक जीवन की गहराइयों से जुड़ा है, जिसे कुछ वाक्यों में बाँधना आसान नहीं।
लेखक बताते हैं कि वे इसलिए लिखते हैं क्योंकि वे स्वयं जानना चाहते हैं कि वे क्यों लिखते हैं — और लिखे बिना इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिलता। लिखकर ही लेखक उस भीतरी विवशता को पहचानता है जिसके कारण उसने लिखा, और लिखकर ही वह उससे मुक्त हो जाता है। यही उनके लिए लिखने का सबसे सच्चा कारण है।
आगे वे बाहरी दबाव की बात करते हैं — ख्याति मिलने के बाद संपादक के आग्रह, प्रकाशक के तकाज़े या आर्थिक आवश्यकता के कारण भी लेखन होता है। पर सच्चा रचनाकार ईमानदारी से यह भेद बनाए रखता है कि कौन-सी रचना भीतरी प्रेरणा का फल है और कौन-सी बाहरी दबाव का। कई बार बाहरी दबाव भी भीतरी उन्मेष (प्रेरणा) का निमित्त बन जाता है।
लेखक स्वयं को बाहरी दबाव की ज़रूरत नहीं पड़ती; घड़ी के अलार्म की तरह वह दबाव एक सहायक यंत्र भर है — वे प्रायः अपने आप ही जाग जाते हैं, पर अलार्म बज जाए तो हानि भी नहीं मानते।
फिर वे हिरोशिमा का प्रसंग रखते हैं। विज्ञान का विद्यार्थी होने के कारण वे अणु और रेडियम-धर्मिता के प्रभावों का सैद्धांतिक ज्ञान रखते थे। जब हिरोशिमा पर अणु-बम गिरने का समाचार और चित्र उन्होंने देखे, तब बुद्धि के स्तर पर विज्ञान के इस दुरुपयोग के प्रति उनका विद्रोह स्वाभाविक था और उन्होंने लेख भी लिखे — पर कविता नहीं लिखी, क्योंकि वह अभी केवल बौद्धिक पकड़ थी, अनुभूति नहीं बनी थी।
जापान जाने पर वे हिरोशिमा गए, वह अस्पताल भी देखा जहाँ रेडियम-पदार्थ से आहत लोग वर्षों से कष्ट पा रहे थे। यह प्रत्यक्ष अनुभव था, फिर भी कविता न आई। एक दिन सड़क पर घूमते हुए उन्होंने एक जले हुए पत्थर पर एक मनुष्य की लंबी उजली छाया देखी — विस्फोट के समय वहाँ खड़ा कोई व्यक्ति किरणों से भाप बनकर उड़ गया होगा और उसकी छाया पत्थर पर अंकित रह गई। उस छाया को देखकर लेखक को थप्पड़-सा लगा; भीतर सहसा एक जलता सूर्य उग आया और डूब गया। उस क्षण अणु-विस्फोट उनके अनुभूति-प्रत्यक्ष में आ गया — एक अर्थ में वे स्वयं हिरोशिमा के भोक्ता बन गए। इसी विवशता से, बाद में भारत लौटकर रेलगाड़ी में बैठे-बैठे, उन्होंने हिरोशिमा कविता लिखी।
अंत में वे कहते हैं — यह कविता अच्छी है या बुरी, इससे उन्हें मतलब नहीं; उनके निकट तो वह सच है, क्योंकि वह अनुभूति-प्रसूत है — यही महत्त्व की बात है।
3. लेखक के लिखने के कारण (आंतरिक व बाहरी विवशता)
लेखक लिखने के दो स्तर के कारण गिनाते हैं —
- आंतरिक विवशता (भीतरी दबाव): यही सच्चा और प्रमुख कारण है। भीतर एक बेचैनी, एक उन्मेष उठता है जिसे लेखक स्वयं भी ठीक से नहीं समझता; लिखकर ही वह उसे पहचानता है और उससे मुक्त होता है। यह आत्म-ज्ञान की प्रक्रिया है।
- बाहरी विवशता (बाहरी दबाव): संपादक का आग्रह, प्रकाशक का तकाज़ा, आर्थिक आवश्यकता या ख्याति का लोभ। यह दबाव बाहर से आता है, भीतर की प्रेरणा से नहीं।
मुख्य बात: सच्चा रचनाकार दोनों में स्पष्ट भेद बनाए रखता है — वह जानता है कि कौन-सी रचना भीतर से उपजी और कौन-सी बाहरी दबाव से लिखी गई। कुछ आलसी प्रकृति के लेखक बाहरी दबाव के बिना लिख ही नहीं पाते; उनके लिए यह दबाव अलार्म की तरह सहायक यंत्र है। पर अज्ञेय जैसे लेखक को इसकी ज़रूरत नहीं पड़ती।
"लिखकर ही लेखक उस आभ्यंतर विवशता को पहचानता है जिसके कारण उसने लिखा — और लिखकर ही वह उससे मुक्त हो जाता है।"
4. हिरोशिमा का प्रसंग व अनुभव की प्रामाणिकता
यह पाठ का सबसे मार्मिक और परीक्षा-दृष्टि से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भाग है। इसमें लेखक अनुभव और अनुभूति का सूक्ष्म अंतर समझाते हैं —
- अनुभव (अनुभव घटित का होता है): जो हमारी आँखों के सामने वास्तव में घटता है — जैसे लेखक का हिरोशिमा शहर देखना, अस्पताल में पीड़ितों को देखना।
- अनुभूति: संवेदना और कल्पना के सहारे उस सत्य को भीतर तक आत्मसात् कर लेना, जो हमारे साथ प्रत्यक्ष घटित न भी हुआ हो। यह अनुभव से कहीं गहरी चीज़ है — और रचना के लिए यही ज़रूरी है।
लेखक ने हिरोशिमा का समाचार पढ़ा, चित्र देखे, यहाँ तक कि स्वयं हिरोशिमा गए और अस्पताल देखा — फिर भी कविता नहीं लिखी, क्योंकि अनुभूति-प्रत्यक्ष की कसर थी। पर जब उन्होंने सड़क पर जले हुए पत्थर पर एक मनुष्य की उजली छाया देखी — जो विस्फोट में भाप बनकर उड़ गए किसी व्यक्ति की निशानी थी — तब वह घटना उनके भीतर उतर गई। उस क्षण उन्हें लगा मानो वे स्वयं हिरोशिमा-विस्फोट के भोक्ता बन गए हों। तभी, भीतर की विवशता जागी और कविता जन्मी।
निष्कर्ष: सच्ची व प्रामाणिक रचना केवल बौद्धिक जानकारी या प्रत्यक्ष देखने से नहीं, बल्कि भीतर तक उतरी हुई अनुभूति से जन्म लेती है।
"अनुभव तो घटित का होता है, पर अनुभूति संवेदना और कल्पना के सहारे उस सत्य को आत्मसात् कर लेती है जो वास्तव में कृतिकार के साथ घटित नहीं हुआ।"
5. हिरोशिमा कविता (संदर्भ)
निबंध के अंत में अज्ञेय की वह कविता दी गई है जो सन् 1959 में प्रकाशित काव्य-संग्रह 'अरी ओ करुणा प्रभामय' में संकलित है। कविता का केंद्रीय बिंब यही है कि हिरोशिमा में मनुष्य का रचा हुआ सूरज (अणु-बम) क्षितिज पर नहीं, बल्कि नगर के बीचों-बीच फटी मिट्टी से उगा, जिसने मनुष्य को ही भाप बनाकर सोख लिया। पत्थरों पर अंकित जली हुई छाया ही अब मनुष्य की एकमात्र साखी (गवाह) रह गई है।
- केंद्रीय भाव: विज्ञान के दुरुपयोग से उपजी विनाशलीला और मानवता का करुण अंत।
- बिंब: "मानव का रचा हुआ सूरज" = अणु-बम; "जली हुई छाया" = विनाश का प्रमाण।
6. भाषा-शैली
- विधा: यह एक आत्मपरक/विचारात्मक निबंध है, जिसमें लेखक स्वयं से संवाद करते हुए आत्म-विश्लेषण करते हैं।
- भाषा: साहित्यिक, परिष्कृत खड़ी बोली; तत्सम शब्दों की प्रधानता (विवशता, आभ्यंतर, उन्मेष, अनुभूति, आत्मसात्)।
- शैली: बौद्धिक और चिंतनप्रधान — विचारों को तर्कपूर्वक क्रम में रखा गया है; साथ ही गहरी संवेदनशीलता भी है।
- विशेषता: आत्मकथात्मक स्वर, सूक्ष्म भावों का सटीक चित्रण; उदाहरण (अलार्म-घड़ी, जले पत्थर की छाया) से कठिन विचार को सरल बनाना।
- बिंब-योजना: "जलता हुआ सूर्य", "थप्पड़-सा लगना", "जली हुई छाया" जैसे प्रभावशाली बिंब।
7. कठिन शब्दार्थ
- आभ्यंतर / आंतरिक — भीतर का, अंदरूनी।
- विवशता — मजबूरी, बेबसी।
- उन्मेष — प्रकाश, दीप्ति; भीतर से उठने वाली प्रेरणा।
- निमित्त — कारण, माध्यम।
- तटस्थ — अलग रहकर, निरपेक्ष भाव से।
- तकाज़ा — माँग, बार-बार किया गया आग्रह।
- आत्मानुशासन — स्वयं पर नियंत्रण।
- रेडियम-धर्मिता — रेडियोधर्मिता (किरणें छोड़ने का गुण)।
- अनुभूति — गहरा अंतरंग अनुभव, हृदय से महसूस करना।
- आत्मसात् — पूरी तरह अपने भीतर समा लेना।
- रुद्ध — बंद हो गई, फँस गई।
- अनुभूति-प्रसूत — अनुभूति से उपजी हुई।
- अवाक् — मौन, चुप, स्तब्ध।
- साखी — गवाह, साक्षी।
8. मुख्य भाव (केंद्रीय संदेश)
इस निबंध का केंद्रीय भाव यह है कि सच्चा लेखन भीतरी विवशता और गहरी अनुभूति से जन्म लेता है, बाहरी दबाव या केवल बौद्धिक जानकारी से नहीं। लेखक लिखकर ही अपने भीतर के दबाव को पहचानता और उससे मुक्त होता है। हिरोशिमा-प्रसंग के माध्यम से अज्ञेय अनुभव और अनुभूति का अंतर स्पष्ट करते हुए यह संदेश देते हैं कि रचना तभी प्रामाणिक होती है जब घटना भीतर तक उतर जाए। साथ ही यह पाठ विज्ञान के दुरुपयोग के विरुद्ध एक गहरी मानवीय चेतावनी भी देता है।
9. NCERT प्रश्न-अभ्यास (सभी उत्तर)
प्र.1 लेखक के अनुसार प्रत्यक्ष अनुभव की अपेक्षा अनुभूति उनके लेखन में कहीं अधिक मदद करती है, क्यों?
उत्तर: अनुभव केवल घटना का बाहरी रूप देखना है, जबकि अनुभूति उस घटना को संवेदना और कल्पना के सहारे भीतर तक आत्मसात् कर लेना है। प्रत्यक्ष अनुभव तक तो लेखक हिरोशिमा देखकर पहुँच गया था, फिर भी कविता न लिख सका; पर जब घटना उसकी अनुभूति बनी, तभी सच्ची रचना जन्मी। इसलिए लेखन के लिए अनुभूति अधिक सहायक है — वह रचना को प्रामाणिकता और गहराई देती है।
प्र.2 लेखक ने अपने आपको हिरोशिमा के विस्फोट का भोक्ता कब और किस तरह महसूस किया?
उत्तर: जब लेखक जापान में हिरोशिमा की सड़क पर घूमते हुए एक जले हुए पत्थर पर एक मनुष्य की लंबी उजली छाया देखी, तब उन्हें थप्पड़-सा लगा। उन्हें लगा कि विस्फोट के समय वहाँ खड़ा कोई व्यक्ति किरणों से भाप बनकर उड़ गया होगा और उसकी छाया पत्थर पर अंकित रह गई। उस क्षण भीतर एक जलता सूर्य उग आया; अणु-विस्फोट उनकी अनुभूति-प्रत्यक्ष में आ गया और वे स्वयं को हिरोशिमा-विस्फोट का भोक्ता महसूस करने लगे।
प्र.3 'मैं क्यों लिखता हूँ' के आधार पर बताइए कि—
(क) लेखक को कौन-सी बातें लिखने के लिए प्रेरित करती हैं?
उत्तर: लेखक को मुख्यतः आंतरिक विवशता (भीतरी दबाव) लिखने के लिए प्रेरित करती है — स्वयं को जानने और भीतर के दबाव से मुक्त होने की इच्छा। इसके अतिरिक्त कभी-कभी बाहरी दबाव — संपादक का आग्रह, प्रकाशक का तकाज़ा और आर्थिक आवश्यकता — भी लेखन का कारण बनते हैं, पर वह गौण होते हैं।
(ख) किसी रचनाकार के प्रेरणा स्रोत किसी दूसरे को कुछ भी रचने के लिए किस तरह उत्साहित कर सकते हैं?
उत्तर: एक रचनाकार की रचना या उसका अनुभव दूसरे व्यक्ति के भीतर भी संवेदना जगा सकता है। जैसे हिरोशिमा की घटना ने अज्ञेय को कविता लिखने को प्रेरित किया, वैसे ही किसी की रचना पढ़कर या किसी घटना से प्रभावित होकर दूसरा व्यक्ति भी अपनी भीतरी अनुभूति के अनुसार कविता, कहानी, चित्र या संगीत रच सकता है। एक की प्रेरणा दूसरे के लिए निमित्त बन जाती है।
प्र.4 कुछ रचनाकारों के लिए आत्मानुभूति/स्वयं के अनुभव के साथ-साथ बाह्य दबाव भी महत्त्वपूर्ण होता है। ये बाह्य दबाव कौन-कौन से हो सकते हैं?
उत्तर: बाह्य दबाव ये हो सकते हैं — संपादक का आग्रह, प्रकाशक का तकाज़ा, आर्थिक आवश्यकता, समय-सीमा का बंधन, ख्याति या पुरस्कार का लोभ, तथा पाठकों या समाज की माँग। कुछ आलसी प्रकृति के लेखक इन्हीं दबावों के सहारे लिख पाते हैं।
प्र.5 क्या बाह्य दबाव केवल लेखन से जुड़े रचनाकारों को ही प्रभावित करते हैं या अन्य क्षेत्रों से जुड़े कलाकारों को भी प्रभावित करते हैं, कैसे?
उत्तर: बाह्य दबाव केवल लेखकों को ही नहीं, बल्कि सभी क्षेत्रों के कलाकारों को प्रभावित करते हैं। चित्रकार को प्रदर्शनी या ग्राहक की माँग, गायक-संगीतकार को मंच या रिकॉर्डिंग कंपनी का दबाव, अभिनेता को निर्माता-निर्देशक का दबाव, फ़िल्मकार को आर्थिक व व्यावसायिक दबाव झेलने पड़ते हैं। इन दबावों के कारण कलाकार को निर्धारित समय व माँग के अनुसार कार्य करना पड़ता है।
प्र.6 हिरोशिमा पर लिखी कविता लेखक के अंतः व बाह्य दोनों दबाव का परिणाम है—यह आप कैसे कह सकते हैं?
उत्तर: बाह्य दबाव: हिरोशिमा पर बम गिरने का समाचार, चित्र, स्वयं वहाँ जाकर अस्पताल व पीड़ितों को देखना — ये बाहरी घटनाएँ थीं जिन्होंने लेखक को विषय दिया। अंतः दबाव: जले पत्थर पर छाया देखकर जब घटना उनकी अनुभूति बनी और भीतर विवशता जागी, तभी कविता लिखी गई। इस प्रकार बाहरी घटना ने विषय दिया और भीतरी अनुभूति ने रचना को जन्म दिया — अतः यह दोनों दबावों का परिणाम है।
प्र.7 हिरोशिमा की घटना विज्ञान का भयानकतम दुरुपयोग है। आपकी दृष्टि में विज्ञान का दुरुपयोग कहाँ-कहाँ और किस तरह से हो रहा है?
उत्तर: विज्ञान का दुरुपयोग अनेक रूपों में हो रहा है — परमाणु व जैविक हथियारों का निर्माण, युद्ध में विनाशकारी अस्त्रों का प्रयोग, कारखानों व वाहनों से फैलता प्रदूषण, मिलावट व नकली दवाएँ, साइबर अपराध व इंटरनेट का दुरुपयोग, तथा पर्यावरण व प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन। ये मानवता और प्रकृति दोनों के लिए घातक हैं।
प्र.8 एक संवेदनशील युवा नागरिक की हैसियत से विज्ञान का दुरुपयोग रोकने में आपकी क्या भूमिका है?
उत्तर: एक संवेदनशील युवा नागरिक के रूप में मैं विज्ञान का उपयोग केवल मानव-कल्याण के लिए करूँगा और दूसरों को भी जागरूक करूँगा। प्रदूषण कम करने, संसाधनों का संयमित प्रयोग करने, हथियारों की होड़ का विरोध करने तथा शांति व मानवता के पक्ष में आवाज़ उठाने का प्रयास करूँगा। साथ ही नैतिक मूल्यों के साथ विज्ञान को जोड़कर उसके रचनात्मक उपयोग को बढ़ावा दूँगा।
10. ध्यान देने योग्य बातें
- यह पाठ कृतिका भाग-2 का गद्य (निबंध) है, कविता नहीं — विधा पूछे जाने पर 'आत्मपरक निबंध' लिखें।
- 'अनुभव' और 'अनुभूति' का अंतर बहुत महत्त्वपूर्ण है — अनुभव = घटित का देखना, अनुभूति = भीतर तक आत्मसात् करना।
- लिखने का सच्चा कारण = आंतरिक विवशता; बाहरी दबाव गौण है।
- हिरोशिमा कविता 'अरी ओ करुणा प्रभामय' (1959) संग्रह में संकलित है।
- लेखक विज्ञान के विद्यार्थी थे — इसी कारण अणु-विस्फोट का प्रभाव वे बौद्धिक स्तर पर समझ सके।
11. त्वरित पुनरावृत्ति
- लेखक: अज्ञेय (सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन)।
- केंद्रीय प्रश्न: मैं क्यों लिखता हूँ? — उत्तर: भीतरी विवशता से मुक्ति पाने के लिए।
- दो दबाव: आंतरिक (सच्चा) व बाहरी (गौण)।
- मूल विचार: अनुभूति > अनुभव; सच्ची रचना अनुभूति-प्रसूत होती है।
- उदाहरण: हिरोशिमा — जले पत्थर पर मनुष्य की उजली छाया।
- संदेश: विज्ञान का दुरुपयोग मानवता के लिए विनाशकारी है।
- महादेवी वर्मा
- अज्ञेय
- रामवृक्ष बेनीपुरी
- यतीन्द्र मिश्र
- आर्थिक आवश्यकता
- ख्याति
- आंतरिक विवशता
- संपादक का आग्रह
- विज्ञान
- इतिहास
- हिंदी साहित्य
- दर्शन
- जापान में हिरोशिमा देखते ही
- समाचार पढ़ते ही
- भारत लौटकर रेलगाड़ी में
- अस्पताल देखकर
- एक चित्र
- एक मनुष्य की लंबी उजली छाया
- रेडियम का टुकड़ा
- कुछ अक्षर
- प्रत्यक्ष अनुभव
- अनुभूति
- बाहरी दबाव
- बौद्धिक जानकारी
- हरी घास पर क्षण भर
- आँगन के पार द्वार
- अरी ओ करुणा प्रभामय
- तार सप्तक
- संपादक का आग्रह
- प्रकाशक का तकाज़ा
- आर्थिक आवश्यकता
- भीतरी प्रेरणा
- घड़ी के अलार्म से
- तूफ़ान से
- सूर्य से
- नदी से
- अनुभव से उपजी
- अनुभूति से उपजी
- कल्पना से रहित
- बाहरी दबाव से लिखी
- तुरंत कविता लिखी
- लेख आदि लिखे, कविता नहीं
- कुछ नहीं लिखा
- जापान चले गए
- क्षितिज
- स्पर्श
- कृतिका
- संचयन
- हँसी आई
- थप्पड़-सा लगा
- कुछ नहीं लगा
- नींद आई
- सूर्योदय का
- अणु-बम का
- दीपक का
- आशा का
Book a free demo class