लखनवी अंदाज़

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CLASS X Hindi ~3 marks/year Ch 9 of 15
लखनवी अंदाज़

Class 10 · Hindi · NCERT chapter notes · Akanksha Classes

सार एक नज़र में
  • लखनवी अंदाज़ यशपाल द्वारा रचित एक व्यंग्यात्मक रेखाचित्र/निबंधनुमा कहानी है, जिसका मूल उद्देश्य यह दिखाना था कि बिना कथानक (कथ्य) के भी कहानी लिखी जा सकती है।
  • रेल के सेकंड क्लास डिब्बे में लेखक की भेंट एक नवाब साहब से होती है, जो दो खीरे बड़ी नफ़ासत से काटते-छीलते हैं, उन पर नमक-मिर्च बुरकते हैं, पर एक फाँक भी खाए बिना सब कुछ खिड़की से बाहर फेंक देते हैं।
  • लेखक इसी प्रसंग के माध्यम से पतनशील सामंती वर्ग के झूठे आत्मसम्मान, बनावटी जीवन-शैली और दिखावे की परजीवी संस्कृति पर तीखा कटाक्ष करते हैं।
  • यह रचना "नई कहानी" आंदोलन पर भी व्यंग्य है — जैसे खीरे की केवल गंध और कल्पना से डकार आ सकती है, वैसे ही बिना घटना और पात्रों के कोरी कल्पना से कहानी नहीं बनती।
  • बोर्ड महत्त्व: क्षितिज (गद्य खंड) से प्रायः ~3 अंक/वर्ष — लघु उत्तरीय प्रश्न (नवाब का चरित्र/व्यंग्य) तथा बहुविकल्पीय/अभिकथन-कारण प्रश्न।
विस्तृत नोट्स

1. लेखक परिचय — यशपाल

यशपाल का जन्म सन् 1903 में पंजाब के फ़ीरोज़पुर छावनी में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा काँगड़ा में ग्रहण करने के बाद उन्होंने लाहौर के नेशनल कॉलेज से बी.ए. किया। वहीं उनका परिचय भगत सिंह और सुखदेव से हुआ। स्वाधीनता संग्राम की क्रांतिकारी धारा से जुड़ाव के कारण वे जेल भी गए। उनकी मृत्यु सन् 1976 में हुई।

यशपाल की रचनाओं में आम आदमी के सरोकारों की उपस्थिति है। वे यथार्थवादी शैली के विशिष्ट रचनाकार हैं। सामाजिक विषमता, राजनीतिक पाखंड और रूढ़ियों के खिलाफ़ उनकी रचनाएँ मुखर हैं।

  • कहानी संग्रह: ज्ञानदान, तर्क का तूफ़ान, पिंजरे की उड़ान, वो दुनिया, फूलो का कुर्ता।
  • उपन्यास: झूठा सच (भारत-विभाजन की त्रासदी का मार्मिक दस्तावेज़), अमिता, दिव्या, पार्टी कामरेड, दादा कामरेड, मेरी तेरी उसकी बात।
  • रचनागत विशेषता: भाषा की स्वाभाविकता और सजीवता

2. पाठ का विस्तृत सार

लेखक मुफ़स्सिल (नगर के इर्द-गिर्द के क्षेत्र) की पैसेंजर ट्रेन में सफ़र करते हैं। उन्हें दूर नहीं जाना था, फिर भी भीड़ से बचकर, एकांत में "नई कहानी" के विषय में सोचने और खिड़की से प्राकृतिक दृश्य देखने के लिए वे सेकंड क्लास का टिकट खरीद लेते हैं।

गाड़ी छूट रही थी। एक छोटे डिब्बे को खाली समझकर लेखक दौड़कर उसमें चढ़ जाते हैं, परंतु अनुमान के विपरीत वह डिब्बा निर्जन नहीं था — वहाँ लखनऊ की नवाबी नस्ल के एक सफ़ेदपोश (भद्र) सज्जन बैठे थे। उनके सामने दो ताज़े-चिकने खीरे तौलिए पर रखे थे। लेखक के सहसा कूद आने से नवाब साहब की आँखों में एकांत-चिंतन में विघ्न का असंतोष दिखाई दिया।

नवाब साहब ने संगति (बातचीत) के लिए कोई उत्साह नहीं दिखाया। लेखक ने भी आत्मसम्मान में आँखें चुरा लीं। ठाली बैठे लेखक कल्पना करने लगे — संभवतः नवाब साहब ने किफ़ायत के विचार से अकेले सफ़र के अनुमान में सेकंड क्लास का टिकट खरीदा था, और अब उन्हें यह गवारा न था कि कोई सफ़ेदपोश उन्हें मँझले दर्जे में सफ़र करता देखे। शायद वक्त काटने के लिए ही उन्होंने खीरे खरीदे होंगे, और अब किसी सफ़ेदपोश के सामने खीरा कैसे खाएँ?

प्रसंग — संबोधन और इनकार

नवाब साहब सहसा बोले, "ओह, आदाब-अर्ज़, जनाब, खीरे का शौक फ़रमाएँगे?" लेखक को यह सहसा भाव-परिवर्तन अच्छा नहीं लगा। उन्होंने भाँप लिया कि यह शराफ़त का गुमान बनाए रखने के लिए ही औपचारिकता निभाई जा रही है। लेखक ने उत्तर दिया — "शुक्रिया, किबला शौक फ़रमाएँ।" अर्थात् स्वयं इनकार कर दिया।

नवाब साहब ने खिड़की से बाहर देखकर खीरों को धोया, तौलिए से पोंछा, चाकू से सिरे काटे और गोदकर झाग निकाला। फिर बहुत एहतियात (सावधानी) से खीरों को छीलकर फाँकों में सजाया। उन्होंने फाँकों पर जीरा-मिला नमक और लाल मिर्च की सुर्खी बुरक दी। उनकी प्रत्येक भाव-भंगिमा से स्पष्ट था कि उनका मुख खीरे के रसास्वादन की कल्पना से प्लावित (पानी से भरा) हो रहा था।

लेखक कनखियों से देखते रहे — मियाँ रईस बनते हैं, पर लोगों की नज़रों से बच सकने पर अपनी असलियत पर उतर आते हैं। नवाब साहब ने फिर लेखक से कहा, "वल्लाह, शौक कीजिए, लखनऊ का बालम खीरा है!" खीरे की पनियाती फाँकें देखकर लेखक के मुँह में पानी ज़रूर आ रहा था, पर इनकार कर चुके थे। आत्मसम्मान निभाने के लिए उन्होंने कहा — "शुक्रिया, इस वक्त तलब महसूस नहीं हो रही, मेदा (आमाशय) भी ज़रा कमज़ोर है, किबला शौक फ़रमाएँ।"

प्रसंग — खीरा "खाने" का अनूठा तरीका

नवाब साहब ने सतृष्ण आँखों से चमकती खीरे की फाँक उठाकर होंठों तक ले गए, फाँक को सूँघा, स्वाद के आनंद में पलकें मूँद लीं, और मुँह में भर आए पानी का घूँट गले से उतार लिया। फिर उस फाँक को खिड़की से बाहर फेंक दिया। इसी प्रकार उन्होंने सारी फाँकें केवल सूँघकर, बिना खाए, खिड़की के बाहर फेंक दीं। अंत में तौलिए से हाथ-होंठ पोंछकर गर्व से लेखक की ओर देखा, मानो कह रहे हों — "यह है खानदानी रईसों का तरीका!"

नवाब साहब इस "तैयारी और इस्तेमाल" से ही थककर लेट गए। थोड़ी देर बाद उनकी ओर से डकार का शब्द सुनाई दिया और उन्होंने कहा — "खीरा लज़ीज़ होता है, लेकिन होता है सकील (न पचने वाला), नामुराद मेदे पर बोझ डाल देता है।" यह सुनते ही लेखक के ज्ञान-चक्षु खुल गए — उन्होंने पहचान लिया, "ये हैं नई कहानी के लेखक!" यदि खीरे की केवल गंध और स्वाद की कल्पना से ही पेट भरने का डकार आ सकता है, तो बिना घटना और पात्रों के, लेखक की इच्छा मात्र से 'नई कहानी' क्यों नहीं बन सकती?

3. नवाब साहब का चरित्र व व्यंग्य

नवाब साहब इस रचना के केंद्रीय पात्र हैं और उन्हीं के माध्यम से यशपाल पूरे पतनशील सामंती वर्ग पर व्यंग्य करते हैं। उनके चरित्र की मुख्य विशेषताएँ —

  • झूठा आत्मसम्मान और दिखावा: नवाब साहब वास्तविकता से बेखबर एक बनावटी जीवन-शैली के आदी हैं। किसी सफ़ेदपोश के सामने खीरा खाना वे अपनी शान के खिलाफ़ समझते हैं।
  • नफ़ासत और नज़ाकत का ढोंग: खीरा खाने जैसी साधारण क्रिया को भी वे "खानदानी तहज़ीब" बनाकर पेश करते हैं — धोना, पोंछना, छीलना, सजाना, नमक-मिर्च बुरकना।
  • किफ़ायत और दिखावे का अंतर्द्वंद्व: मितव्ययिता के कारण सेकंड क्लास में सफ़र करते हैं, पर रईसी का गुमान भी बनाए रखना चाहते हैं — यही उनके भीतर का खोखलापन है।
  • परजीवी संस्कृति का प्रतीक: जो वर्ग केवल कल्पना और दिखावे के सहारे जीता है, उत्पादन या परिश्रम से नहीं — खीरा सूँघकर फेंकना इसी निरर्थक, परजीवी जीवन का प्रतीक है।

व्यंग्य का मर्म: लेखक कहते हैं कि "कहना न होगा कि आज के समय में भी ऐसी परजीवी संस्कृति को देखा जा सकता है।" अर्थात् यह व्यंग्य केवल नवाबों पर नहीं, हर उस वर्ग पर है जो खोखले दिखावे और झूठी शान में जीता है।

4. कथानक के बिना कहानी (नई कहानी आंदोलन)

स्वतंत्रता के बाद हिंदी साहित्य में "नई कहानी" आंदोलन चला, जिसमें कुछ रचनाकार मानते थे कि कहानी के लिए कथानक (कथ्य/प्लॉट), घटना और पात्र ज़रूरी नहीं — केवल अनुभूति, मनोदशा या कल्पना से भी कहानी रची जा सकती है।

यशपाल इस अति-प्रयोग पर सूक्ष्म व्यंग्य करते हैं। उन्होंने भूमिका में स्पष्ट लिखा था कि यह रचना यह साबित करने के लिए लिखी गई थी कि बिना कथ्य के कहानी नहीं लिखी जा सकती; परंतु एक स्वतंत्र रचना के रूप में भी इसे पढ़ा जा सकता है।

प्रसंग — खीरे और "नई कहानी" का रूपक

जैसे नवाब साहब ने खीरा खाया नहीं, केवल उसकी गंध और स्वाद की कल्पना की और उन्हें "डकार" तक आ गई — वैसे ही जो लेखक बिना घटना और पात्रों के, केवल इच्छा और कल्पना के सहारे कहानी रचने का दावा करते हैं, वे भी वस्तुतः खोखली, "बिना खाए डकार" जैसी रचना ही बनाते हैं। खीरा = कथ्य/घटना; उसे न खाना = कथ्यहीनता; डकार = कथ्य के अभाव में बनी कोरी कहानी।

5. भाषा-शैली

  • व्यंग्यप्रधान शैली: पूरी रचना में सूक्ष्म, मारक व्यंग्य है — आक्रोश के स्थान पर हास्य-व्यंग्य से प्रहार किया गया है।
  • उर्दू-फ़ारसी मिश्रित लखनवी भाषा: आदाब-अर्ज़, किबला, सफ़ेदपोश, किफ़ायत, एहतियात, तसलीम, तहज़ीब, नफ़ासत, नज़ाकत — पात्र के अनुरूप भाषा।
  • चित्रात्मकता: खीरा काटने-छीलने-फेंकने की पूरी प्रक्रिया आँखों के सामने सजीव चित्र-सी उभरती है।
  • मुहावरेदार व सजीव अभिव्यक्ति: "ज्ञान-चक्षु खुल गए", "आँखें चुरा लीं", "कनखियों से देखना", "सिर खम कर लेना" — भाषा को सजीवता देती हैं।
  • रेखाचित्र-शैली: कहानी, निबंध और रेखाचित्र की सीमाओं को मिलाती हुई एक प्रयोगधर्मी गद्य रचना।

6. कठिन शब्दार्थ (शब्द-संपदा)

  • मुफ़स्सिल — केंद्रस्थ नगर के इर्द-गिर्द का स्थान
  • सफ़ेदपोश — भद्र व्यक्ति
  • किफ़ायत — मितव्यता, समझदारी से उपयोग करना
  • आदाब-अर्ज़ — अभिवादन का एक ढंग
  • गुमान — भ्रम
  • एहतियात — सावधानी
  • बुरक देना — छिड़क देना
  • स्फुरण — फड़कना, हिलना
  • प्लावित — पानी भर जाना
  • पनियाती — रसीली
  • मेदा — आमाशय
  • तसलीम — सम्मान में
  • सिर खम करना — सिर झुकाना
  • तहज़ीब — शिष्टता
  • नफ़ासत — स्वच्छता
  • नज़ाकत — कोमलता
  • नफ़ीस — बढ़िया
  • एब्स्ट्रैक्ट — सूक्ष्म, जिसका भौतिक अस्तित्व न हो, अमूर्त
  • सकील — आसानी से न पचने वाला

7. मुख्य भाव

"लखनवी अंदाज़" का मूल भाव यह है कि दिखावा और बनावटीपन जीवन को खोखला बना देते हैं। नवाब साहब खीरा खाए बिना केवल उसकी कल्पना से तृप्त होने का स्वांग रचते हैं — यह उस पतनशील सामंती वर्ग की प्रतीक है जो वास्तविकता से कटकर झूठी शान और परजीवी संस्कृति में जीता है।

साथ ही, साहित्य के स्तर पर यह व्यंग्य है कि कोरी कल्पना या इच्छा मात्र से सार्थक कहानी नहीं बनती — उसके लिए कथ्य, घटना और पात्र आवश्यक हैं। संदेश दोहरा है — जीवन में दिखावे का त्याग, और साहित्य में कथ्य की अनिवार्यता।

8. सभी NCERT प्रश्न-अभ्यास के उत्तर

प्रश्न-अभ्यास

प्र.1 — लेखक को नवाब साहब के किन हाव-भावों से महसूस हुआ कि वे उनसे बातचीत करने के लिए तनिक भी उत्सुक नहीं हैं?

उत्तर: लेखक के डिब्बे में चढ़ते ही नवाब साहब की आँखों में एकांत-चिंतन में विघ्न पड़ने का असंतोष दिखाई दिया। उन्होंने संगति (बातचीत) के लिए कोई उत्साह नहीं दिखाया, मुँह फेरकर खिड़की से बाहर देखने लगे और लेखक की ओर ध्यान नहीं दिया। इन्हीं भाव-भंगिमाओं से लेखक ने भाँप लिया कि नवाब साहब बातचीत के इच्छुक नहीं हैं।

प्र.2 — नवाब साहब ने बहुत यत्न से खीरा काटा, नमक-मिर्च बुरका, अंतत: सूँघकर ही खिड़की के बाहर फेंक दिया। उन्होंने ऐसा क्यों किया होगा? उनका ऐसा करना उनके कैसे स्वभाव को इंगित करता है?

उत्तर: नवाब साहब किसी सफ़ेदपोश (लेखक) के सामने खीरा खाना अपनी खानदानी शान और रईसी के विरुद्ध समझते थे। दिखावे और झूठे आत्मसम्मान के कारण उन्होंने खीरा बड़े यत्न से तैयार तो किया, पर खाने के बजाय केवल सूँघकर बाहर फेंक दिया, ताकि लेखक के सामने यह सिद्ध कर सकें कि वे खानदानी रईस हैं और खीरा-जैसी मामूली चीज़ खाना उनकी तहज़ीब के खिलाफ़ है। यह उनके दिखावटी, बनावटी, झूठे आत्मसम्मान वाले और पतनशील सामंती स्वभाव को इंगित करता है।

प्र.3 — बिना विचार, घटना और पात्रों के भी क्या कहानी लिखी जा सकती है? यशपाल के इस विचार से आप कहाँ तक सहमत हैं?

उत्तर: यशपाल का मानना है कि बिना कथ्य (विचार), घटना और पात्रों के सार्थक कहानी नहीं लिखी जा सकती। मैं उनके इस विचार से सहमत हूँ। जैसे केवल खीरे की गंध सूँघने से पेट नहीं भरता (भले ही डकार आ जाए), वैसे ही केवल कल्पना या इच्छा मात्र से कहानी नहीं बनती। कहानी में कोई-न-कोई कथ्य, अनुभूति, घटना या पात्र आवश्यक है, अन्यथा वह कोरी, निरर्थक रचना बनकर रह जाएगी।

प्र.4 — आप इस निबंध को और क्या नाम देना चाहेंगे?

उत्तर: इस रचना को इन नामों में से कोई भी दिया जा सकता है — "नवाबी अंदाज़", "खानदानी रईसी", "दिखावे की संस्कृति", "खीरे का स्वाद", "बिना खाए डकार", या "परजीवी संस्कृति"। (विद्यार्थी अपने तर्क सहित कोई एक उपयुक्त नाम लिख सकते हैं।)

रचना और अभिव्यक्ति

प्र.5(क) — नवाब साहब द्वारा खीरा खाने की तैयारी की पूरी प्रक्रिया अपने शब्दों में।

उत्तर: नवाब साहब ने पहले खिड़की से बाहर देखकर निश्चय किया, फिर खीरों के नीचे रखा तौलिया झाड़कर बिछाया। सीट के नीचे से लोटा उठाकर दोनों खीरों को खिड़की से बाहर धोया और तौलिए से पोंछा। जेब से चाकू निकालकर खीरों के सिरे काटे और गोदकर झाग निकाला। फिर बहुत सावधानी से खीरों को छीलकर फाँकों में सजाया और उन फाँकों पर जीरा-मिला नमक तथा पिसी लाल मिर्च बुरक दी।

प्र.5(ख) — किन-किन चीज़ों का रसास्वादन करने के लिए आप किस प्रकार की तैयारी करते हैं?

उत्तर: आम खाने के लिए उसे धोकर, छीलकर, फाँकों में काटना; चाट खाने के लिए उस पर मसाले, नींबू और चटनी डालना; गन्ने का रस पीने के लिए उसे साफ़ करवाकर रस निकलवाना आदि। (विद्यार्थी अपने अनुभव अनुसार लिख सकते हैं।)

प्र.6 — खीरे के संबंध में नवाब साहब के व्यवहार को उनकी सनक कहा जा सकता है। किसी एक सनक के बारे में लिखिए।

उत्तर: कुछ नवाबों को कबूतरबाज़ी, पतंगबाज़ी और बटेर लड़ाने की सनक होती थी; कुछ को बहुमूल्य वस्त्र-आभूषण या इत्र जमा करने का शौक था। ऐसी ही एक सनक यह थी कि कुछ रईस मेहमानों के सामने दिखावे के लिए अत्यधिक धन व्यय करते थे, जबकि व्यक्तिगत जीवन में मितव्ययी रहते थे। (विद्यार्थी किसी एक का विस्तार लिख सकते हैं।)

प्र.7 — क्या सनक का कोई सकारात्मक रूप हो सकता है? यदि हाँ तो ऐसी सनकों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर: हाँ, सनक का सकारात्मक रूप भी हो सकता है — जैसे स्वच्छता की सनक, पढ़ने या ज्ञानार्जन की सनक, समय की पाबंदी की सनक, वृक्षारोपण या पर्यावरण-संरक्षण की सनक, समाज-सेवा या किसी रचनात्मक कला (संगीत, चित्रकला, लेखन) के प्रति समर्पण की सनक। ऐसी सनकें व्यक्ति और समाज दोनों के लिए लाभकारी होती हैं।

भाषा-अध्ययन

प्र.8 — निम्नलिखित वाक्यों में से क्रियापद छाँटकर क्रिया-भेद भी लिखिए।

  • (क) एक सफ़ेदपोश सज्जन बहुत सुविधा से पालथी मारे बैठे थे। — क्रियापद: बैठे थे (अकर्मक क्रिया)।
  • (ख) नवाब साहब ने संगति के लिए उत्साह नहीं दिखाया। — क्रियापद: दिखाया (सकर्मक क्रिया)।
  • (ग) ठाली बैठे, कल्पना करते रहने की पुरानी आदत है। — क्रियापद: करते रहने (की आदत है) (सकर्मक क्रिया)।
  • (घ) अकेले सफ़र का वक्त काटने के लिए ही खीरे खरीदे होंगे। — क्रियापद: खरीदे होंगे (सकर्मक क्रिया)।
  • (ङ) दोनों खीरों के सिर काटे और उन्हें गोदकर झाग निकाला। — क्रियापद: काटे, निकाला (सकर्मक क्रिया)।
  • (च) नवाब साहब ने सतृष्ण आँखों से नमक-मिर्च के संयोग से चमकती खीरे की फाँकों की ओर देखा। — क्रियापद: देखा (सकर्मक क्रिया)।
  • (छ) नवाब साहब खीरे की तैयारी और इस्तेमाल से थककर लेट गए। — क्रियापद: लेट गए (अकर्मक क्रिया)।
  • (ज) जेब से चाकू निकाला। — क्रियापद: निकाला (सकर्मक क्रिया)।

9. ध्यान देने योग्य बातें

  • रचना का प्रकार पूछे जाने पर — यह व्यंग्यात्मक रेखाचित्र/कहानी है, शुद्ध कहानी नहीं।
  • "नई कहानी" आंदोलन और खीरे के रूपक का संबंध बोर्ड में अक्सर पूछा जाता है — खीरा = कथ्य, फेंकना = कथ्यहीनता, डकार = खोखली रचना।
  • नवाब साहब किसी एक व्यक्ति नहीं, बल्कि पूरे पतनशील सामंती/परजीवी वर्ग के प्रतीक हैं।
  • "ज्ञान-चक्षु खुल गए" — यह वाक्य कहानी का मोड़ (टर्निंग पॉइंट) है, जहाँ लेखक नवाब को "नई कहानी का लेखक" पहचानते हैं।
  • लेखक स्वयं खीरा खाना चाहते थे (मुँह में पानी आया), पर आत्मसम्मान के कारण इनकार कर देते हैं — यह भी हल्का आत्म-व्यंग्य है।

10. त्वरित पुनरावृत्ति

  • लेखक — यशपाल (1903–1976); यथार्थवादी रचनाकार; प्रसिद्ध उपन्यास झूठा सच
  • पात्र — लेखक तथा लखनवी नवाब साहब; स्थल — सेकंड क्लास रेल डिब्बा।
  • केंद्रीय घटना — खीरे को बड़े यत्न से तैयार कर, बिना खाए केवल सूँघकर खिड़की से बाहर फेंकना।
  • व्यंग्य — पतनशील सामंती वर्ग का दिखावा, झूठा आत्मसम्मान, परजीवी संस्कृति।
  • साहित्यिक संदर्भ — "नई कहानी" आंदोलन; बिना कथ्य के कहानी नहीं बनती।
  • संबंधित संदर्भ — प्रेमचंद की "शतरंज के खिलाड़ी" व सत्यजीत राय की फ़िल्म (पतनशील सामंती वर्ग का चित्रण)।
अभ्यास — बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)
1. "लखनवी अंदाज़" के लेखक कौन हैं?
  1. प्रेमचंद
  2. यशपाल
  3. निराला
  4. रामवृक्ष बेनीपुरी
उत्तर: (B) यशपाल।
2. लेखक ने किस श्रेणी (क्लास) का टिकट खरीदा था?
  1. फर्स्ट क्लास
  2. थर्ड क्लास
  3. सेकंड क्लास
  4. एसी क्लास
उत्तर: (C) सेकंड क्लास — भीड़ से बचकर एकांत में सोचने के लिए।
3. नवाब साहब के सामने तौलिए पर क्या रखे थे?
  1. दो आम
  2. दो ताज़े खीरे
  3. दो सेब
  4. दो केले
उत्तर: (B) दो ताज़े-चिकने खीरे।
4. नवाब साहब ने खीरे की फाँकों के साथ अंततः क्या किया?
  1. सब खा गए
  2. लेखक को दे दीं
  3. सूँघकर खिड़की से बाहर फेंक दीं
  4. थैले में रख लीं
उत्तर: (C) केवल सूँघकर, बिना खाए, खिड़की से बाहर फेंक दीं।
5. खीरे की फाँकों पर नवाब साहब ने क्या बुरका?
  1. शक्कर
  2. जीरा-मिला नमक और लाल मिर्च
  3. चाट मसाला
  4. घी
उत्तर: (B) जीरा-मिला नमक और पिसी लाल मिर्च।
6. "ज्ञान-चक्षु खुल गए" से लेखक का क्या आशय है?
  1. लेखक को नींद आ गई
  2. लेखक ने नवाब को "नई कहानी का लेखक" पहचान लिया
  3. लेखक को भूख लग गई
  4. लेखक स्टेशन पहचान गए
उत्तर: (B) उन्होंने पहचाना कि बिना कथ्य के कहानी रचने वाले "नई कहानी" के लेखक ऐसे ही होते हैं।
7. नवाब साहब के अनुसार खीरा कैसा होता है?
  1. लज़ीज़ पर सकील (न पचने वाला)
  2. बेस्वाद
  3. हल्का और सुपाच्य
  4. कड़वा
उत्तर: (A) लज़ीज़ होता है, लेकिन सकील — मेदे पर बोझ डाल देता है।
8. यह रचना किस वर्ग पर व्यंग्य करती है?
  1. किसान वर्ग
  2. मज़दूर वर्ग
  3. पतनशील सामंती (नवाबी) वर्ग
  4. व्यापारी वर्ग
उत्तर: (C) पतनशील सामंती वर्ग की परजीवी, दिखावटी संस्कृति पर।
9. "किबला" शब्द का प्रयोग किसके लिए हुआ है?
  1. स्थान के लिए
  2. आदरपूर्ण संबोधन के रूप में
  3. भोजन के लिए
  4. गाड़ी के लिए
उत्तर: (B) आदरसूचक संबोधन ("किबला शौक फ़रमाएँ")।
10. यशपाल का प्रसिद्ध उपन्यास, जो भारत-विभाजन की त्रासदी पर आधारित है —
  1. दिव्या
  2. अमिता
  3. झूठा सच
  4. दादा कामरेड
उत्तर: (C) झूठा सच।
11. "मेदा" शब्द का अर्थ है —
  1. हृदय
  2. आमाशय
  3. फेफड़ा
  4. यकृत
उत्तर: (B) आमाशय (पेट)।
12. इस रचना के माध्यम से यशपाल किस साहित्यिक आंदोलन पर व्यंग्य करते हैं?
  1. छायावाद
  2. प्रगतिवाद
  3. नई कहानी आंदोलन
  4. रीतिकाल
उत्तर: (C) "नई कहानी" आंदोलन — बिना कथ्य/घटना/पात्र के कहानी रचने की प्रवृत्ति पर।
13. "सफ़ेदपोश" शब्द का अर्थ है —
  1. गरीब व्यक्ति
  2. भद्र/प्रतिष्ठित व्यक्ति
  3. सफ़ाईकर्मी
  4. सिपाही
उत्तर: (B) भद्र व्यक्ति।
अभिकथन–कारण (Assertion–Reason)
अभिकथन (A): नवाब साहब ने खीरा खाए बिना ही फेंक दिया।   कारण (R): वे किसी सफ़ेदपोश के सामने खीरा खाना अपनी खानदानी शान के विरुद्ध समझते थे।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, तथा R, A की सही व्याख्या है — झूठे आत्मसम्मान और दिखावे के कारण ही उन्होंने ऐसा किया।
अभिकथन (A): यह रचना यह सिद्ध करती है कि बिना कथ्य के कहानी नहीं लिखी जा सकती।   कारण (R): खीरे की केवल गंध-कल्पना से पेट नहीं भरता, भले ही डकार आ जाए।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, तथा R, A की सही व्याख्या है — खीरे का रूपक ठीक इसी बात को स्पष्ट करता है कि कोरी कल्पना से सार्थक रचना नहीं बनती।
विगत वर्ष के प्रश्न
प्र.1 — नवाब साहब ने खीरा खाने की कैसी तैयारी की? पूरी प्रक्रिया का वर्णन कीजिए। (CBSE, 3 अंक)
संकेत: तौलिया बिछाना → लोटे से खीरे धोना → पोंछना → चाकू से सिरे काटकर गोदना, झाग निकालना → सावधानी से छीलना → फाँकों में सजाना → जीरा-नमक व लाल मिर्च बुरकना। (देखें §8 का प्र.5क उत्तर।)
प्र.2 — "लखनवी अंदाज़" किस वर्ग पर व्यंग्य है? स्पष्ट कीजिए। (CBSE, 3 अंक)
संकेत: पतनशील सामंती/नवाबी वर्ग पर — जो वास्तविकता से कटकर झूठे आत्मसम्मान, दिखावे और परजीवी संस्कृति में जीता है; नवाब साहब का खीरा सूँघकर फेंकना इसी खोखलेपन का प्रतीक है।
प्र.3 — लेखक के "ज्ञान-चक्षु" कब और कैसे खुले? (CBSE, 2–3 अंक)
संकेत: जब नवाब साहब खीरा खाए बिना केवल सूँघकर तृप्ति की डकार लेते हैं, तब लेखक पहचानते हैं कि ये "नई कहानी" के लेखक हैं — अर्थात् जैसे कल्पना मात्र से पेट नहीं भरता, वैसे ही बिना कथ्य के कहानी नहीं बनती।
प्र.4 — "बिना घटना और पात्रों के कहानी नहीं बन सकती" — यशपाल के इस मत से आप कहाँ तक सहमत हैं? तर्क सहित लिखिए। (CBSE, 3 अंक)
संकेत: सहमति — कहानी के लिए कोई कथ्य, अनुभूति, घटना या पात्र आवश्यक है; कोरी कल्पना/इच्छा से बनी रचना निरर्थक रह जाती है, ठीक वैसे ही जैसे खीरा सूँघने भर से पेट नहीं भरता। (देखें §3 का विवरण।)
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