- कवि: सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' (1899–1961) — छायावाद के प्रमुख स्तंभ, हिंदी में मुक्त छंद के प्रवर्तक तथा क्रांति एवं विद्रोह के कवि।
- 'उत्साह' एक आह्वान गीत है जो बादल को संबोधित है। बादल यहाँ एक ओर पीड़ित–प्यासे जन की आकांक्षा पूरी करने वाला है, तो दूसरी ओर नयी कल्पना, नए अंकुर और क्रांति-चेतना का प्रतीक भी।
- 'अट नहीं रही है' कविता फागुन (वसंत) की सर्वव्यापक सुंदरता और मादकता को व्यक्त करती है — प्रकृति का सौंदर्य इतना अपार है कि कहीं समा नहीं पा रहा।
- दोनों कविताओं में निराला की पहचान — नाद-सौंदर्य (शब्दों की ध्वनि का प्रभाव), लयात्मकता, बिंब-योजना और प्रतीकात्मकता — स्पष्ट दिखती है।
- बोर्ड महत्त्व: लगभग ~3 अंक/वर्ष — प्रायः एक भावार्थ/व्याख्या प्रश्न तथा एक काव्य-सौंदर्य या कठिन शब्दार्थ आधारित लघु प्रश्न।
1. कवि परिचय — सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' का जन्म सन् 1899 में बंगाल के महिषादल में हुआ। वे मूलतः उत्तर प्रदेश के गढ़ाकोला (ज़िला उन्नाव) के निवासी थे। उनकी औपचारिक शिक्षा केवल नौवीं तक ही हुई, किंतु उन्होंने स्वाध्याय से संस्कृत, बांग्ला और अंग्रेज़ी का गहरा ज्ञान अर्जित किया। वे संगीत और दर्शनशास्त्र के भी गहरे अध्येता थे। रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद की विचारधारा का उन पर विशेष प्रभाव पड़ा।
निराला का पारिवारिक जीवन दुखों और संघर्षों से भरा रहा। आत्मीय जनों के असामयिक निधन ने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया, फिर भी साहित्यिक मोर्चे पर वे निरंतर संघर्ष करते रहे। सन् 1961 में उनका देहांत हुआ।
उनकी प्रमुख काव्य-रचनाएँ हैं — अनामिका, परिमल, गीतिका, कुकुरमुत्ता और नए पत्ते। उपन्यास, कहानी, आलोचना और निबंध-लेखन में भी उनकी ख्याति अविस्मरणीय है। 'निराला रचनावली' के आठ खंडों में उनका संपूर्ण साहित्य प्रकाशित है।
काव्यगत विशेषताएँ: निराला विस्तृत सरोकारों के कवि हैं। दार्शनिकता, विद्रोह, क्रांति, प्रेम की तरलता और प्रकृति का विराट चित्र उनकी रचनाओं में उपस्थित है। उनके विद्रोही स्वभाव ने कविता के भाव-जगत और शिल्प-जगत दोनों में नए प्रयोग संभव किए। छायावादी रचनाकारों में उन्होंने सबसे पहले मुक्त छंद का प्रयोग किया। शोषित, उपेक्षित, पीड़ित और प्रताड़ित जन के प्रति उनकी कविता में जहाँ गहरी सहानुभूति है, वहीं शोषक वर्ग और सत्ता के प्रति प्रचंड प्रतिकार का भाव भी।
2. 'उत्साह' — मूल कविता
कविता को समझने से पहले मूल पंक्तियाँ एक बार पढ़ लें —
घेर घेर घोर गगन, धाराधर ओ!
ललित ललित, काले घुँघराले,
बाल कल्पना के-से पाले,
विद्युत-छबि उर में, कवि, नवजीवन वाले!
वज्र छिपा, नूतन कविता
फिर भर दो—
बादल, गरजो!
विकल विकल, उन्मन थे उन्मन
विश्व के निदाघ के सकल जन,
आए अज्ञात दिशा से अनंत के घन!
तप्त धरा, जल से फिर
शीतल कर दो—
बादल, गरजो!
3. 'उत्साह' का भावार्थ एवं व्याख्या
'उत्साह' एक आह्वान गीत है — अर्थात् किसी को पुकारकर कुछ कर डालने का गीत। कवि बादल को संबोधित करता है, क्योंकि बादल निराला का प्रिय विषय रहा है। यहाँ बादल केवल आकाश में छाया जल-भरा मेघ नहीं है; वह एक साथ कई अर्थ समेटे हुए प्रतीक है — जन की प्यास बुझाने वाला, नई कल्पना और नए अंकुर लाने वाला, तथा विध्वंस, विप्लव और क्रांति-चेतना को संभव करने वाला।
कवि बादल को ललकारता है — "बादल, गरजो!" वह चाहता है कि बादल पूरे आकाश को घेरकर, घोर रूप धारण कर, धारा बरसाने वाला (धाराधर) बन जाए। बादल सुंदर (ललित), काले और घुँघराले बालों जैसे हैं, मानो किसी बालक की कल्पना के पाले हुए हों। उनके भीतर विद्युत की छबि (बिजली की चमक) छिपी है — यह कवि और नवजीवन का प्रतीक है। इस बिजली में वज्र (कठोरता, क्रांति की शक्ति) छिपा है। कवि निवेदन करता है कि वह वज्र फूटे और संसार में नूतन कविता (नया सृजन, नई चेतना) फिर से भर दे। यहाँ बादल का गरजना केवल वर्षा नहीं, बल्कि पुरानी जड़ता को तोड़कर नए सृजन का आह्वान है।
कवि कहता है कि संसार के सभी लोग निदाघ (भीषण गर्मी) से व्याकुल (विकल) और उन्मन (अनमने, बेचैन) हैं। ऐसे में अनंत आकाश से, किसी अज्ञात दिशा से बादल आ पहुँचे हैं। कवि प्रार्थना करता है कि ये बादल तप्त धरा (तपती हुई पृथ्वी) को जल से फिर शीतल कर दें। यहाँ गर्मी से तपते जन शोषण और पीड़ा से त्रस्त समाज के प्रतीक हैं, और बादल की वर्षा उस तपन से मुक्ति, राहत तथा नवजीवन का प्रतीक है। इस प्रकार कविता में ललित कल्पना और क्रांति-चेतना दोनों एक साथ चलती हैं।
शीर्षक 'उत्साह' की सार्थकता: कविता का स्वर ओजपूर्ण और उत्साह से भरा है। कवि बादल को बार-बार गरजने, बरसने और परिवर्तन लाने के लिए प्रेरित करता है। यह ललकार, यह ऊर्जा और बदलाव की चाह ही 'उत्साह' है — इसी कारण शीर्षक पूर्णतः सार्थक है।
4. 'अट नहीं रही है' — मूल कविता
आभा फागुन की तन
सट नहीं रही है।
कहीं साँस लेते हो,
घर-घर भर देते हो,
उड़ने को नभ में तुम
पर-पर कर देते हो,
आँख हटाता हूँ तो
हट नहीं रही है।
पत्तों से लदी डाल
कहीं हरी, कहीं लाल,
कहीं पड़ी है उर में
मंद-गंध-पुष्प-माल,
पाट-पाट शोभा-श्री
पट नहीं रही है।
5. 'अट नहीं रही है' का भावार्थ एवं व्याख्या
यह कविता फागुन (वसंत ऋतु) की मादकता और सर्वव्यापक सुंदरता को प्रकट करती है। कवि कहता है कि फागुन की आभा (चमक, शोभा) इतनी अधिक है कि वह कहीं समा (अट) नहीं पा रही — प्रकृति का सौंदर्य इतना भरपूर है कि उसके लिए मानो जगह कम पड़ गई है।
"अट नहीं रही है / आभा फागुन की तन / सट नहीं रही है" — फागुन की शोभा इतनी व्याप्त है कि वह तन (शरीर/प्रकृति के अंग) पर भी ठीक से टिक (सट) नहीं पा रही। सौंदर्य इतना अधिक है कि वह संभाले नहीं संभलता। यहाँ अट का अर्थ है समाना, और आभा का अर्थ है चमक।
कवि फागुन को सजीव मानकर संबोधित करता है — "कहीं साँस लेते हो, घर-घर भर देते हो।" फागुन की सुगंध और सुंदरता हर घर में फैल जाती है। "उड़ने को नभ में तुम पर-पर कर देते हो" — फागुन मानो आकाश में उड़ने के लिए पंख (पर) फैला देता है। कवि कहता है कि वह जहाँ भी आँख हटाना चाहता है, सौंदर्य से आँख हट नहीं रही — चारों ओर इतना सौंदर्य बिखरा है कि दृष्टि कहीं और जा ही नहीं पाती।
"पत्तों से लदी डाल / कहीं हरी, कहीं लाल" — वृक्षों की डालियाँ कहीं हरे तो कहीं लाल पत्तों से लदी हैं। "कहीं पड़ी है उर में मंद-गंध-पुष्प-माल" — कहीं फूलों की मंद सुगंध वाली माला हृदय (उर) में पड़ी प्रतीत होती है। अंत में कवि कहता है — "पाट-पाट शोभा-श्री / पट नहीं रही है" अर्थात् जगह-जगह (पाट-पाट) सौंदर्य से भरपूर शोभा (शोभा-श्री) इतनी अधिक है कि वह समा (पट) नहीं रही। इस तरह फागुन की अपार सुंदरता का चित्र पूर्ण होता है।
निराला फागुन के सौंदर्य में पूरी तरह डूब गए हैं। उनमें फागुन की ऐसी आभा रच-बस गई है जिसे न शब्दों से अलग किया जा सकता है, न फागुन से।
6. दोनों कविताओं का काव्य-सौंदर्य, अलंकार एवं भाषा
नाद-सौंदर्य: शब्दों का ऐसा प्रयोग जिससे कविता के किसी भाव या दृश्य में ध्वन्यात्मक प्रभाव पैदा हो, नाद-सौंदर्य कहलाता है। 'उत्साह' में — "घेर घेर घोर गगन, धाराधर ओ", "ललित ललित, काले घुँघराले", "विकल विकल, उन्मन थे उन्मन" — में शब्दों की पुनरावृत्ति और 'ग', 'ल', 'क' ध्वनियों का दोहराव नाद-सौंदर्य उत्पन्न करता है।
'अट नहीं रही है' में — "घर-घर भर देते हो", "पर-पर कर देते हो", "पाट-पाट शोभा-श्री" — में शब्दों की आवृत्ति और तुकांत ('है', 'हो', 'लाल/माल') से अद्भुत लय बनती है।
प्रमुख अलंकार:
- पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार: "घेर घेर", "ललित ललित", "विकल विकल", "घर-घर", "पर-पर", "पाट-पाट" — एक ही शब्द की पुनरावृत्ति।
- अनुप्रास अलंकार: "घोर गगन", "धाराधर", "मंद-गंध-पुष्प-माल" में व्यंजन ध्वनियों की आवृत्ति।
- उपमा अलंकार: "बाल कल्पना के-से पाले" — बादलों की तुलना बालक की कल्पना से।
- मानवीकरण अलंकार: बादल और फागुन को सजीव मानकर संबोधन (बादल को गरजने को कहना; फागुन का साँस लेना)।
- रूपक/प्रतीक: 'उत्साह' में बादल = क्रांति, नवजीवन; 'नूतन कविता' = नया सृजन।
भाषा एवं छंद: दोनों कविताएँ मुक्त छंद में रची गई हैं — इनमें मात्रा या चरण की कठोर बंदिश नहीं है, फिर भी भीतरी लय बनी रहती है। 'उत्साह' की भाषा ओजपूर्ण और आह्वानात्मक है, जबकि 'अट नहीं रही है' की भाषा कोमल, मधुर और लालित्यपूर्ण है। सुंदर शब्दों का चयन और लय कविता को फागुन की ही तरह सुंदर एवं ललित बना देती है।
7. कठिन शब्दार्थ
- धाराधर — बादल (धारा को धारण करने वाला)।
- ललित — सुंदर, मनोहर।
- विद्युत-छबि — बिजली की चमक/शोभा।
- उर — हृदय।
- वज्र — कठोर, भीषण (इंद्र का अस्त्र)।
- नूतन — नया।
- विकल — व्याकुल, बेचैन।
- उन्मन — कहीं मन न टिकने की स्थिति, अनमनापन।
- निदाघ — गर्मी, ग्रीष्म।
- सकल — सब, सारे।
- घन — बादल।
- तप्त धरा — तपती हुई पृथ्वी।
- अट — समाना, प्रविष्ट होना।
- आभा — चमक, कांति।
- सट / पट — समा नहीं रही है, टिक नहीं रही।
- पाट-पाट — जगह-जगह।
- शोभा-श्री — सौंदर्य से भरपूर।
- मंद-गंध-पुष्प-माल — मंद सुगंध वाली फूलों की माला।
8. मुख्य भाव
'उत्साह': यह कविता बादल के माध्यम से परिवर्तन, क्रांति और नवनिर्माण का आह्वान करती है। कवि चाहता है कि बादल गरजे, बरसे और तपते हुए संसार को शीतल कर दे — अर्थात् पुरानी जड़ता टूटे और समाज में नई चेतना, नया जीवन और नया सृजन आए। बादल यहाँ ललित कल्पना और प्रचंड क्रांति, दोनों का प्रतीक है।
'अट नहीं रही है': यह कविता फागुन (वसंत) के अपार सौंदर्य का गीत है। प्रकृति का सौंदर्य इतना व्यापक और मादक है कि वह कहीं समा नहीं पा रहा। कवि की दृष्टि उस सौंदर्य से हट ही नहीं पाती। यह कविता प्रकृति-प्रेम और सौंदर्य-बोध की पराकाष्ठा है।
9. NCERT प्रश्न-अभ्यास — पूर्ण उत्तर
उत्साह
प्र.1 कवि बादल से फुहार, रिमझिम या बरसने के स्थान पर 'गरजने' के लिए कहता है, क्यों?
उत्तर: कवि बादल को केवल वर्षा का नहीं, बल्कि क्रांति और परिवर्तन का प्रतीक मानता है। फुहार या रिमझिम कोमलता और शांति की सूचक है, जबकि गर्जन शक्ति, उत्साह, विद्रोह और जड़ता को तोड़ने वाली ऊर्जा का प्रतीक है। कवि चाहता है कि समाज की पुरानी निष्क्रियता टूटे और नवजीवन का संचार हो — इसी ओजपूर्ण आह्वान के कारण वह 'गरजने' के लिए कहता है।
प्र.2 कविता का शीर्षक 'उत्साह' क्यों रखा गया है?
उत्तर: पूरी कविता का स्वर ऊर्जा, ओज और परिवर्तन की चाह से भरा है। कवि बादल को बार-बार गरजने, बरसने और तप्त धरा को शीतल करने के लिए ललकारता है। इस ललकार में जो जोश, प्रेरणा और बदलाव लाने की प्रबल इच्छा है, वही उत्साह है। यह उत्साह ही कविता का केंद्रीय भाव है, अतः शीर्षक पूर्णतः सार्थक है।
प्र.3 कविता में बादल किन-किन अर्थों की ओर संकेत करता है?
उत्तर: बादल कई अर्थों की ओर संकेत करता है — (i) प्यासे-पीड़ित जन की आकांक्षा पूरी करने वाला (वर्षा से तप्त धरा को शीतल करने वाला); (ii) नई कल्पना और नए अंकुर का स्रोत; (iii) विध्वंस, विप्लव और क्रांति-चेतना का प्रतीक (वज्र छिपा होना); (iv) नवजीवन और नूतन कविता (नए सृजन) का प्रतीक।
प्र.4 'उत्साह' कविता में ऐसे कौन-से शब्द हैं जिनमें नाद-सौंदर्य मौजूद है, छाँटकर लिखें।
उत्तर: "घेर घेर घोर गगन, धाराधर ओ", "ललित ललित, काले घुँघराले", "विकल विकल, उन्मन थे उन्मन", "बादल, गरजो" — इन पंक्तियों में शब्दों की पुनरावृत्ति और 'ग', 'घ', 'ल' ध्वनियों के दोहराव से सुंदर ध्वन्यात्मक प्रभाव (नाद-सौंदर्य) उत्पन्न होता है।
प्र.5 (रचना और अभिव्यक्ति) जैसे बादल उमड़-घुमड़कर बरसते हैं वैसे ही कवि के अंतर्मन में भी भावों के बादल उमड़-घुमड़कर कविता के रूप में अभिव्यक्त होते हैं। ऐसे ही किसी प्राकृतिक सौंदर्य को देखकर अपने उमड़ते भावों को कविता में उतारिए।
उत्तर (संकेत): यह सृजनात्मक प्रश्न है। विद्यार्थी किसी ऋतु (वर्षा, वसंत आदि), सूर्योदय, नदी या पर्वत के सौंदर्य को देखकर अपने मन में उठने वाले भावों को सरल, लयपूर्ण पंक्तियों में लिखें। उदाहरण — "रिमझिम बूँदें गाती हैं, धरती की प्यास बुझाती हैं..." जैसी स्व-रचित पंक्तियाँ स्वीकार्य।
अट नहीं रही है
प्र.1 छायावाद की एक खास विशेषता अंतर्मन के भावों का बाहर की दुनिया से सामंजस्य बिठाना है। कविता की किन पंक्तियों को पढ़कर यह धारणा पुष्ट होती है? लिखिए।
उत्तर: "आँख हटाता हूँ तो / हट नहीं रही है" तथा "कहीं पड़ी है उर में / मंद-गंध-पुष्प-माल" — इन पंक्तियों में कवि के अंतर्मन का सौंदर्य-बोध बाहरी प्रकृति के सौंदर्य से एकाकार हो जाता है। फागुन की बाहरी शोभा कवि के हृदय में बस जाती है, जिससे भीतर और बाहर का सामंजस्य पुष्ट होता है।
प्र.2 कवि की आँख फागुन की सुंदरता से क्यों नहीं हट रही है?
उत्तर: फागुन में प्रकृति का सौंदर्य चारों ओर इतना अधिक और मनमोहक हो जाता है — हरे-लाल पत्तों से लदी डालें, फूलों की सुगंध, रंग-बिरंगी शोभा — कि कवि का मन उसमें पूरी तरह डूब जाता है। यह सौंदर्य इतना आकर्षक है कि चाहकर भी कवि की दृष्टि कहीं और नहीं जा पाती, इसलिए आँख हट नहीं रही।
प्र.3 प्रस्तुत कविता में कवि ने प्रकृति की व्यापकता का वर्णन किन रूपों में किया है?
उत्तर: कवि ने प्रकृति की व्यापकता को कई रूपों में दिखाया है — (i) फागुन की आभा का तन पर न समाना; (ii) फागुन का घर-घर में फैल जाना; (iii) पत्तों से लदी हरी-लाल डालें; (iv) फूलों की मंद-गंध-पुष्प-माल; (v) "पाट-पाट शोभा-श्री" अर्थात् जगह-जगह बिखरा अपार सौंदर्य जो कहीं समा नहीं रहा।
प्र.4 फागुन में ऐसा क्या होता है जो बाकी ऋतुओं से भिन्न होता है?
उत्तर: फागुन में प्रकृति अपने पूर्ण सौंदर्य पर होती है — पेड़ नए हरे-लाल पत्तों और फूलों से लद जाते हैं, वातावरण में मादक सुगंध फैल जाती है, चारों ओर रंग, उल्लास और मादकता छा जाती है। यह सौंदर्य इतना व्यापक और सर्वस्पर्शी होता है कि वह अन्य ऋतुओं से भिन्न और अधिक मोहक प्रतीत होता है — मानो सौंदर्य कहीं समा ही नहीं पा रहा।
प्र.5 इन कविताओं के आधार पर निराला के काव्य-शिल्प की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर: निराला के काव्य-शिल्प की प्रमुख विशेषताएँ — (i) मुक्त छंद का प्रयोग; (ii) शब्दों की पुनरावृत्ति से उत्पन्न नाद-सौंदर्य और लय; (iii) प्रतीकात्मकता (बादल = क्रांति, फागुन = सौंदर्य); (iv) सजीव बिंब-योजना और मानवीकरण; (v) ओज तथा कोमलता दोनों भावों को व्यक्त करने वाली सशक्त भाषा।
प्र.6 (रचना और अभिव्यक्ति) होली के आसपास प्रकृति में जो परिवर्तन दिखाई देते हैं, उन्हें लिखिए।
उत्तर: होली (फागुन) के आसपास सर्दी समाप्त होकर वसंत का आगमन होता है। पेड़ों पर नई कोंपलें और फूल आ जाते हैं, आमों में बौर आता है, खेतों में सरसों फूलती है, वातावरण में सुगंध और मादकता फैल जाती है, भौंरे और तितलियाँ मँडराने लगती हैं, और चारों ओर रंग, उल्लास तथा उत्साह छा जाता है।
10. ध्यान देने योग्य बातें
- 'उत्साह' एक आह्वान गीत है — इसे "वर्णन" न कहें; इसमें कवि बादल को पुकारता/ललकारता है।
- बादल का गर्जन = क्रांति/परिवर्तन; केवल वर्षा भर नहीं — प्रतीकार्थ अवश्य लिखें।
- दोनों कविताएँ मुक्त छंद में हैं — तुकबंदी की कठोर बंदिश नहीं, पर भीतरी लय अवश्य है।
- नाद-सौंदर्य = शब्दों की ध्वनि से उत्पन्न प्रभाव; पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार से इसे न मिलाएँ (हालाँकि वे साथ आते हैं)।
- 'अट', 'सट', 'पट' तीनों का अर्थ प्रसंग में "समा नहीं रही/टिक नहीं रही" है।
- उत्तर लिखते समय कविता की पंक्तियाँ उद्धृत करें — इससे अंक पूरे मिलते हैं।
11. त्वरित पुनरावृत्ति
- कवि: निराला (1899–1961), छायावाद, मुक्त छंद के प्रवर्तक, संग्रह — अनामिका, परिमल, गीतिका, कुकुरमुत्ता, नए पत्ते।
- उत्साह: बादल को संबोधित आह्वान गीत — क्रांति, नवजीवन, तप्त धरा को शीतल करने का आह्वान।
- अट नहीं रही है: फागुन के अपार, सर्वव्यापक सौंदर्य का गीत — सौंदर्य कहीं समा नहीं रहा।
- शिल्प: मुक्त छंद, नाद-सौंदर्य, पुनरुक्ति, मानवीकरण, प्रतीक, अनुप्रास।
- भाषा: उत्साह — ओजपूर्ण; अट नहीं रही है — कोमल, मधुर, ललित।
- सूर्य
- बादल
- फागुन
- नदी
- 1899
- 1900
- 1911
- 1889
- दोहा
- चौपाई
- मुक्त छंद
- सवैया
- वर्षा
- ग्रीष्म
- शरद
- फागुन/वसंत
- नदी
- बादल
- बिजली
- पर्वत
- प्रसन्न
- अनमना, बेचैन
- थका हुआ
- शांत
- उपमा
- श्लेष
- यमक
- अतिशयोक्ति
- कोमलता
- क्रांति/प्रचंड शक्ति
- शांति
- प्रेम
- एक स्थान
- जगह-जगह
- नदी का किनारा
- पत्ता
- रुकना
- समाना/प्रविष्ट होना
- उड़ना
- गिरना
- वर्षा
- गर्मी/ग्रीष्म
- सर्दी
- अंधकार
- केवल उपमा
- पुनरुक्ति एवं अनुप्रास (नाद-सौंदर्य)
- रूपक
- श्लेष
- अनामिका
- परिमल
- कामायनी
- कुकुरमुत्ता
- हवा
- जल/वर्षा
- छाया
- बिजली
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