- इस पाठ में जनकवि नागार्जुन की दो कविताएँ हैं — 'यह दंतुरित मुसकान' और 'फसल'। दोनों मुक्त छंद में रचित हैं।
- 'यह दंतुरित मुसकान' में कवि एक छोटे, नवदंतुरित (नए-नए दाँत निकले) शिशु की मनोहारी मुसकान देखकर भाव-विभोर हो उठते हैं। शिशु की मुसकान में जीवन का संदेश, कोमलता और सौंदर्य है।
- 'फसल' में कवि बताते हैं कि फसल किसी एक तत्व की देन नहीं — वह नदियों के पानी, करोड़ों हाथों के श्रम, मिट्टी के गुण-धर्म और सूरज-हवा के सहयोग का सामूहिक परिणाम है। यह श्रम और प्रकृति-मानव सहयोग की कविता है।
- भाषा-शैली: बोलचाल की सहज भाषा, बिंब-योजना, अनुप्रास व पुनरुक्ति, गीतात्मक लय — नागार्जुन को 'आधुनिक कबीर' कहा जाता है।
- परीक्षा-महत्त्व: प्रतिवर्ष लगभग ~3 अंक — प्रायः भावार्थ/व्याख्या आधारित एक प्रश्न, बिंब-योजना या भाव स्पष्ट करने वाला प्रश्न।
1. कवि परिचय — नागार्जुन
नागार्जुन का जन्म सन् 1911 में बिहार के दरभंगा ज़िले के सतलखा गाँव में हुआ। उनका मूल नाम वैद्यनाथ मिश्र था। आरंभिक शिक्षा संस्कृत पाठशाला में हुई, फिर अध्ययन के लिए वे बनारस और कलकत्ता (कोलकाता) गए। सन् 1936 में वे श्रीलंका गए और वहीं बौद्ध धर्म में दीक्षित हुए; दो साल प्रवास के बाद 1938 में स्वदेश लौटे। मातृभाषा मैथिली में वे 'यात्री' नाम से प्रतिष्ठित हुए। उन्होंने हिंदी, मैथिली, बांग्ला और संस्कृत — चारों भाषाओं में रचनाएँ कीं।
प्रमुख काव्य-कृतियाँ: युगधारा, सतरंगे पंखों वाली, हज़ार-हज़ार बाँहों वाली, तुमने कहा था, पुरानी जूतियों का कोरस, आखिर ऐसा क्या कह दिया मैंने, मैं मिलिटरी का बूढ़ा घोड़ा। उन्होंने उपन्यास तथा अन्य गद्य विधाओं में भी लेखन किया। उनका सम्पूर्ण कृतित्व 'नागार्जुन रचनावली' के सात खंडों में प्रकाशित है।
सम्मान: हिंदी अकादमी, दिल्ली का शिखर सम्मान, उत्तर प्रदेश का भारत भारती पुरस्कार, बिहार का राजेंद्र प्रसाद पुरस्कार तथा मैथिली कविता के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार। राजनीतिक सक्रियता के कारण उन्हें अनेक बार जेल भी जाना पड़ा। सन् 1998 में उनका देहांत हो गया।
लोकजीवन से गहरा सरोकार रखने वाले नागार्जुन भ्रष्टाचार, राजनीतिक स्वार्थ और समाज की पतनशील स्थितियों के प्रति विशेष सजग रहे। वे व्यंग्य में माहिर हैं, इसलिए उन्हें 'आधुनिक कबीर' भी कहा जाता है। वे वास्तविक अर्थों में जनकवि हैं — उनकी कविता गाँव की चौपालों और साहित्यिक दुनिया में समान रूप से लोकप्रिय रही। उन्होंने छंदों में काव्य-रचना की और मुक्त छंद में भी।
2. 'यह दंतुरित मुसकान' — मूल भाव एवं संदर्भ
यह कविता एक शिशु की निश्छल मुसकान पर केंद्रित है। 'दंतुरित' का अर्थ है — जिसके नए-नए दाँत निकल आए हों। कवि जब एक छोटे बच्चे की मनोहारी मुसकान देखते हैं तो उनके मन में जो भाव उमड़ते हैं, उन्हें अनेक बिंबों के माध्यम से प्रकट करते हैं। कवि का मानना है कि इस सुंदरता में ही जीवन का संदेश छिपा है। इस सुंदरता की व्याप्ति ऐसी है कि कठोर से कठोर मन भी पिघल जाए। इस दंतुरित मुसकान की मोहकता तब और बढ़ जाती है जब उसके साथ नज़रों का बाँकपन (तिरछी, कनखी भरी नज़र) जुड़ जाता है।
कवि लंबे समय से घर-परिवार से दूर रहे हैं ('चिर प्रवासी'), इसलिए शिशु उन्हें पहचानता नहीं। फिर भी उसकी मुसकान कवि के मरुस्थल जैसे रूखे मन में भी जीवन का संचार कर देती है। कविता वात्सल्य-रस की सुंदर अभिव्यक्ति है।
3. 'यह दंतुरित मुसकान' का भावार्थ — काव्यांश सहित व्याख्या
काव्यांश: "तुम्हारी यह दंतुरित मुसकान / मृतक में भी डाल देगी जान / धूलि-धूसर तुम्हारे ये गात... / छोड़कर तालाब मेरी झोंपड़ी में खिल रहे जलजात / परस पाकर तुम्हारा ही प्राण, / पिघलकर जल बन गया होगा कठिन पाषाण।"
भाव: कवि शिशु से कहते हैं कि तुम्हारी यह नवदंतुरित मुसकान इतनी जीवनदायी है कि वह मरे हुए (मृतक) व्यक्ति में भी प्राण डाल दे। धूल-मिट्टी से सने तुम्हारे कोमल अंग (धूलि-धूसर गात) देखकर कवि को लगता है मानो तालाब छोड़कर कमल के फूल (जलजात) उनकी झोंपड़ी में ही खिल उठे हों। आशय यह कि कवि का दरिद्र, सूना घर शिशु की उपस्थिति से कमल-सा सुंदर हो उठा। कवि कल्पना करते हैं कि तुम्हारे प्राणों का स्पर्श पाकर तो कठोर पत्थर (कठिन पाषाण) भी पिघलकर जल बन गया होगा — अर्थात् तुम्हारी कोमल मुसकान में कठोरतम हृदय को भी द्रवित कर देने की शक्ति है।
काव्यांश: "छू गया तुमसे कि झरने लग पड़े शेफालिका के फूल / बाँस था कि बबूल? / तुम मुझे पाए नहीं पहचान? / देखते ही रहोगे अनिमेष!"
भाव: कवि स्वयं को कठोर, नीरस बाँस या काँटेदार बबूल मानते थे। पर शिशु का स्पर्श पाते ही उनका रूखा मन शेफाली के सुंदर फूलों की तरह झर-झरकर कोमल हो उठा। आशय — शिशु के स्पर्श ने उनके कठोर व्यक्तित्व को भी फूलों-सा सरस बना दिया। कवि चिर प्रवासी होने के कारण बच्चे के लिए अपरिचित हैं, इसलिए शिशु उन्हें पहचान नहीं पाता और बिना पलक झपकाए (अनिमेष) उन्हें एकटक देखता रहता है।
काव्यांश: "क्या हुआ यदि हो सके परिचित न पहली बार? / यदि तुम्हारी माँ न माध्यम बनी होती आज / मैं न सकता देख / मैं न पाता जान / तुम्हारी यह दंतुरित मुसकान / धन्य तुम, माँ भी तुम्हारी धन्य!"
भाव: कवि कहते हैं — कोई बात नहीं यदि हम पहली बार में एक-दूसरे को पहचान न सके। यदि शिशु की माँ माध्यम न बनी होती (अर्थात् बच्चे को कवि के पास न लाती), तो कवि इस मनोहर मुसकान को न देख पाते, न जान पाते। इसलिए कवि शिशु को और उसकी माँ को — दोनों को धन्य कहते हैं। माँ ही वह कड़ी है जिसने पिता और शिशु के बीच परिचय व स्नेह का सेतु बनाया।
काव्यांश: "चिर प्रवासी मैं इतर, मैं अन्य! / इस अतिथि से प्रिय तुम्हारा क्या रहा संपर्क / उँगलियाँ माँ की कराती रही हैं मधुपर्क / देखते तुम इधर कनखी मार / और होतीं जब कि आँखें चार / तब तुम्हारी दंतुरित मुसकान / मुझे लगती बड़ी ही छविमान!"
भाव: कवि स्वयं को घर से दूर रहने वाला प्रवासी और शिशु के लिए 'इतर' (दूसरा), 'अन्य' (अपरिचित) तथा अतिथि-सा मानते हैं। शिशु का इस अतिथि (कवि) से कोई पुराना संपर्क नहीं रहा। माँ की उँगलियाँ शिशु को मधुपर्क (माँ के स्नेहयुक्त आत्मीयता का अमृत) पिलाती रहती हैं। शिशु तिरछी नज़र (कनखी) से कवि की ओर देखता है और जब दोनों की आँखें मिलती हैं (आँखें चार होती हैं), तब उसकी दंतुरित मुसकान कवि को बहुत ही सुंदर (छविमान) प्रतीत होती है। यही नज़रों का बाँकपन मुसकान की मोहकता को और बढ़ा देता है।
4. 'फसल' का भावार्थ — काव्यांश सहित व्याख्या
मूल भाव: 'फसल' शब्द सुनते ही खेतों में लहलहाती फसल आँखों के सामने आ जाती है। परंतु फसल है क्या और उसे पैदा करने में किन-किन तत्वों का योगदान होता है — यही नागार्जुन इस कविता में बताते हैं। कविता रेखांकित करती है कि प्रकृति और मनुष्य के सहयोग से ही सृजन संभव है। यह कविता उपभोक्ता-संस्कृति के दौर में हमें फिर से कृषि-संस्कृति के निकट ले जाती है।
काव्यांश: "एक के नहीं, / दो के नहीं, / ढेर सारी नदियों के पानी का जादू: / एक के नहीं, / दो के नहीं, / लाख-लाख कोटि-कोटि हाथों के स्पर्श की गरिमा: / एक की नहीं, / दो की नहीं, / हज़ार-हज़ार खेतों की मिट्टी का गुण धर्म:"
भाव: कवि बार-बार 'एक के नहीं, दो के नहीं' दोहराकर बताते हैं कि फसल किसी एक या दो तत्वों की देन नहीं है। उसमें अनेक नदियों के पानी का जादू समाया है, करोड़ों किसानों के हाथों के स्पर्श की गरिमा (श्रम का सम्मान) है, और हज़ारों खेतों की मिट्टी का गुण-धर्म घुला हुआ है। 'लाख-लाख', 'कोटि-कोटि', 'हज़ार-हज़ार' पुनरुक्तियाँ श्रम और सहयोग की विशालता को व्यक्त करती हैं।
काव्यांश: "फसल क्या है? / और तो कुछ नहीं है वह / नदियों के पानी का जादू है वह / हाथों के स्पर्श की महिमा है / भूरी-काली-संदली मिट्टी का गुण धर्म है / रूपांतर है सूरज की किरणों का / सिमटा हुआ संकोच है हवा की थिरकन का!"
भाव: कवि स्वयं प्रश्न का उत्तर देते हैं — फसल और कुछ नहीं, वह नदियों के पानी का जादू है, करोड़ों किसानों के हाथों के स्पर्श की महिमा है, भूरी-काली-चंदन जैसी सुगंधित (संदली) मिट्टी के गुण-धर्म का परिणाम है। वह सूरज की किरणों का रूपांतर है — अर्थात् सूर्य की ऊर्जा बदलकर अन्न-रूप में फसल बन जाती है। और वह हवा की थिरकन का सिमटा हुआ संकोच है — अर्थात् हवा की लहराती गति भी फसल में समाई हुई है। इस प्रकार फसल जल, श्रम, मिट्टी, सूर्य और वायु — सबके सम्मिलित सहयोग की उपज है। यही कविता का केंद्रीय संदेश है।
5. काव्य-सौंदर्य, अलंकार एवं भाषा
- मुक्त छंद: दोनों कविताएँ छंद-बंधन से मुक्त हैं; पंक्तियाँ असमान, पर भाव-प्रवाह सहज।
- बिंब-योजना: 'यह दंतुरित मुसकान' में अनेक दृश्य-बिंब — 'धूलि-धूसर गात', 'झोंपड़ी में खिले जलजात', 'झरते शेफालिका के फूल', 'पिघलता पाषाण'। ये बिंब शिशु की मुसकान के सौंदर्य को साकार कर देते हैं।
- अनुप्रास अलंकार: 'धूलि-धूसर', 'मृतक में', 'कठिन पाषाण' — वर्णों की आवृत्ति; 'फसल' में 'भूरी-काली-संदली'।
- पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार: 'फसल' में 'एक के नहीं, दो के नहीं', 'लाख-लाख', 'कोटि-कोटि', 'हज़ार-हज़ार' — बल और लय दोनों के लिए।
- रूपक/उपमा एवं मानवीकरण: 'हवा की थिरकन' (हवा का थिरकना — मानवीकरण), 'पानी का जादू', 'सूरज की किरणों का रूपांतर' (फसल को सूर्य-ऊर्जा का रूपांतर कहना)।
- प्रश्न-शैली: 'बाँस था कि बबूल?', 'फसल क्या है?' — प्रश्नों से पाठक को सोचने पर विवश करना।
- भाषा: बोलचाल की सहज, प्रवाहमयी खड़ी बोली; तत्सम ('अनिमेष', 'मधुपर्क', 'छविमान', 'पाषाण') और देशज शब्दों का मेल; गीतात्मक लय।
- रस: 'यह दंतुरित मुसकान' में वात्सल्य रस की प्रधानता।
6. कठिन शब्दार्थ (शब्द-संपदा)
- दंतुरित — बच्चों के नए-नए दाँत (जिसके नए दाँत निकल रहे हों)।
- धूलि-धूसर गात — धूल-मिट्टी से सने अंग-प्रत्यंग।
- जलजात — कमल का फूल (जल में उत्पन्न)।
- अनिमेष — बिना पलक झपकाए लगातार देखना।
- इतर — दूसरा, भिन्न।
- मधुपर्क — दही, घी, शहद, जल और दूध का योग जो देवता और अतिथि के सामने रखा जाता है (पंचामृत); कविता में इसका प्रयोग बच्चे को जीवन देने वाली, आत्मीयता की मिठास से युक्त माँ के प्यार के रूप में हुआ है।
- कनखी — तिरछी निगाह से देखना।
- छविमान — सुंदर।
- पाषाण — पत्थर। शेफालिका — एक सुगंधित श्वेत पुष्प (हरसिंगार)। संदली — चंदन जैसी सुगंधित। कोटि — करोड़। रूपांतर — बदला हुआ रूप।
7. मुख्य भाव — दोनों कविताओं का सार-संदेश
- 'यह दंतुरित मुसकान': शिशु की निश्छल मुसकान जीवन का प्रतीक है — वह कठोर हृदय को भी कोमल बना देती है। बच्चे की मुसकान स्वार्थ-रहित, निष्कपट होती है जबकि बड़ों की मुसकान में बनावट/प्रयोजन हो सकता है। कविता वात्सल्य और निश्छल सौंदर्य का गान है।
- 'फसल': कोई भी सृजन अकेले संभव नहीं — फसल जल, मिट्टी, सूर्य, वायु और करोड़ों मेहनतकश हाथों के सामूहिक श्रम तथा प्रकृति-मानव सहयोग का परिणाम है। कविता श्रम की गरिमा और कृषि-संस्कृति का सम्मान सिखाती है।
8. NCERT प्रश्न-अभ्यास — सम्पूर्ण उत्तर
यह दंतुरित मुसकान
प्र.1 बच्चे की दंतुरित मुसकान का कवि के मन पर क्या प्रभाव पड़ता है?
बच्चे की दंतुरित मुसकान कवि के नीरस, कठोर एवं प्रवासी जीवन में नवजीवन का संचार कर देती है। कवि का मन कमल-सा खिल उठता है, उनका कठोर हृदय शेफाली के फूलों-सा कोमल हो जाता है। उन्हें लगता है यह मुसकान मृतक में भी प्राण डाल सकती है और कठोर पत्थर को भी पिघला सकती है। कवि भाव-विभोर एवं आनंदित हो उठते हैं।
प्र.2 बच्चे की मुसकान और एक बड़े व्यक्ति की मुसकान में क्या अंतर है?
बच्चे की मुसकान निश्छल, निष्कपट और स्वार्थरहित होती है — उसमें कोई दिखावा या प्रयोजन नहीं होता, वह मन को सहज ही मोह लेती है और कठोर हृदय को भी पिघला देती है। इसके विपरीत बड़े व्यक्ति की मुसकान में प्रायः बनावट, औपचारिकता या किसी स्वार्थ/प्रयोजन की छाया हो सकती है; वह उतनी सहज एवं निश्छल नहीं होती।
प्र.3 कवि ने बच्चे की मुसकान के सौंदर्य को किन-किन बिंबों के माध्यम से व्यक्त किया है?
कवि ने अनेक सुंदर बिंबों का प्रयोग किया है — (क) मुसकान मृतक में भी जान डाल देगी; (ख) झोंपड़ी में तालाब छोड़कर खिलते कमल के फूल (जलजात); (ग) कठोर पत्थर का पिघलकर जल बन जाना; (घ) स्पर्श से झरते शेफालिका के फूल; (ङ) बाँस/बबूल जैसे कठोर कवि का कोमल हो जाना। ये बिंब मुसकान की कोमलता एवं जीवनदायी शक्ति को साकार करते हैं।
प्र.4 भाव स्पष्ट कीजिए—
(क) "छोड़कर तालाब मेरी झोंपड़ी में खिल रहे जलजात।" — कमल तालाब में खिलते हैं, परंतु कवि को लगता है मानो वे तालाब छोड़कर उनकी दरिद्र झोंपड़ी में ही खिल उठे हों। आशय यह कि शिशु के आगमन से कवि का सूना, गरीब घर कमल-पुष्पों-सा सुंदर एवं सुगंधित हो उठा।
(ख) "छू गया तुमसे कि झरने लग पड़े शेफालिका के फूल / बाँस था कि बबूल?" — कवि स्वयं को कठोर बाँस या काँटेदार बबूल मानते थे, किंतु शिशु का स्पर्श पाते ही उनका रूखा मन शेफाली के कोमल फूलों की तरह झर-झरकर सरस हो उठा। शिशु के स्पर्श ने उनके कठोर व्यक्तित्व को भी कोमल बना दिया।
प्र.5 (रचना और अभिव्यक्ति) मुसकान और क्रोध भिन्न-भिन्न भाव हैं। इनकी उपस्थिति से बने वातावरण की भिन्नता का चित्रण कीजिए।
मुसकान एक सकारात्मक भाव है — यह वातावरण को स्नेहपूर्ण, कोमल, उल्लासमय एवं आत्मीय बना देती है; मन में शांति और प्रेम का संचार होता है। इसके विपरीत क्रोध नकारात्मक भाव है — यह वातावरण को तनावपूर्ण, कटु, भयपूर्ण एवं अशांत बना देता है; आपसी दूरी और कटुता बढ़ती है। एक जोड़ता है, दूसरा तोड़ता है।
प्र.6 'दंतुरित मुसकान' से बच्चे की उम्र का अनुमान लगाइए और तर्क सहित उत्तर दीजिए।
'दंतुरित' का अर्थ है — जिसके नए-नए दाँत निकल रहे हों। शिशुओं के दाँत प्रायः छह-सात माह की आयु से निकलने आरंभ होते हैं। अतः बच्चे की उम्र लगभग छह माह से एक वर्ष के बीच होनी चाहिए, क्योंकि इसी अवस्था में नए दाँत निकलते हैं और बच्चा मुसकाता है।
प्र.7 बच्चे से कवि की मुलाकात का जो शब्द-चित्र उपस्थित हुआ है, उसे अपने शब्दों में लिखिए।
कवि लंबे समय बाद घर लौटे हैं; धूल-मिट्टी में सना नन्हा शिशु उन्हें पहचानता नहीं और एकटक (अनिमेष) देखता रहता है। माँ बच्चे को कवि के पास लाती है — वह माध्यम बनती है। बच्चा तिरछी नज़र (कनखी) से कवि को देखता है, और जब दोनों की आँखें मिलती हैं तो उसकी दंतुरित मुसकान खिल उठती है, जो कवि को अत्यंत सुंदर (छविमान) लगती है। यह अपरिचय से परिचय और स्नेह में बदलने का कोमल क्षण है।
फसल
प्र.1 कवि के अनुसार फसल क्या है?
कवि के अनुसार फसल नदियों के पानी का जादू, करोड़ों हाथों के स्पर्श की महिमा, भूरी-काली-संदली मिट्टी का गुण-धर्म, सूरज की किरणों का रूपांतर और हवा की थिरकन का सिमटा हुआ संकोच है। अर्थात् फसल जल, श्रम, मिट्टी, सूर्य और वायु के सम्मिलित सहयोग का परिणाम है।
प्र.2 कविता में फसल उपजाने के लिए आवश्यक तत्वों की बात कही गई है। वे आवश्यक तत्व कौन-कौन से हैं?
आवश्यक तत्व हैं — (1) नदियों का पानी, (2) करोड़ों किसानों के हाथों का श्रम, (3) खेतों की मिट्टी का गुण-धर्म, (4) सूरज की किरणें (सूर्य की ऊर्जा/ताप) और (5) हवा (वायु)।
प्र.3 फसल को 'हाथों के स्पर्श की गरिमा' और 'महिमा' कहकर कवि क्या व्यक्त करना चाहता है?
इन शब्दों से कवि श्रम की महत्ता एवं गरिमा को व्यक्त करना चाहते हैं। फसल केवल प्राकृतिक तत्वों से नहीं, बल्कि लाखों-करोड़ों किसानों के अथक परिश्रम एवं स्नेहयुक्त मेहनत से उपजती है। इन्हीं मेहनतकश हाथों का सम्मान करना ही 'गरिमा' और 'महिमा' कहने का आशय है।
प्र.4 भाव स्पष्ट कीजिए— "रूपांतर है सूरज की किरणों का / सिमटा हुआ संकोच है हवा की थिरकन का!"
फसल वस्तुतः सूर्य की किरणों का बदला हुआ रूप (रूपांतर) है — सूर्य की ऊर्जा ही पौधों में अन्न के रूप में परिवर्तित होती है। तथा वह हवा की थिरकन (लहराती गति) का सिमटा हुआ रूप है — हवा के स्पर्श और गति का प्रभाव भी फसल में समाया हुआ है। आशय यह कि फसल में सूर्य और वायु — दोनों प्राकृतिक शक्तियों का योगदान घुला-मिला है।
प्र.5 (रचना और अभिव्यक्ति) कवि ने फसल को हज़ार-हज़ार खेतों की मिट्टी का गुण-धर्म कहा है—
(क) मिट्टी के गुण-धर्म: मिट्टी की उर्वरता, उसमें घुले पोषक तत्व, नमी धारण करने की क्षमता और जैविक संतुलन ही उसका गुण-धर्म है, जो फसल को पोषण देता है।
(ख) वर्तमान जीवन-शैली का प्रभाव: रासायनिक खाद-कीटनाशकों का अति प्रयोग, औद्योगिक प्रदूषण, अधिक दोहन और प्लास्टिक-कचरा मिट्टी के प्राकृतिक गुण-धर्म को नष्ट कर रहे हैं; उसकी उर्वरता घट रही है।
(ग) गुण-धर्म छोड़ने पर: यदि मिट्टी अपना गुण-धर्म खो दे तो फसल उगना असंभव हो जाएगा, अन्न-संकट उत्पन्न होगा और किसी भी प्रकार के जीवन की कल्पना कठिन हो जाएगी, क्योंकि समस्त जीवन अंततः मिट्टी से उपजे अन्न पर निर्भर है।
(घ) हमारी भूमिका: हम जैविक खाद का प्रयोग, फसल-चक्र, कम रसायन, वृक्षारोपण, जल-संरक्षण तथा कचरा-प्रबंधन अपनाकर मिट्टी के गुण-धर्म को पोषित एवं सुरक्षित रख सकते हैं।
9. ध्यान देने योग्य बातें
- एक ही पाठ, दो कविताएँ — दोनों के कवि नागार्जुन हैं; उत्तर में कविता का नाम स्पष्ट लिखें।
- 'दंतुरित' = नए दाँत; 'जलजात' = कमल; 'अनिमेष' = अपलक देखना; 'कनखी' = तिरछी नज़र — ये शब्दार्थ प्रायः पूछे जाते हैं।
- 'यह दंतुरित मुसकान' में माँ की भूमिका (माध्यम) महत्त्वपूर्ण है — परिचय का सेतु।
- 'फसल' का केंद्रीय भाव — सामूहिक श्रम + प्रकृति-मानव सहयोग; इसे अकेले एक तत्व की देन न बताएँ।
- दोनों कविताएँ मुक्त छंद में हैं — छंद-संबंधी प्रश्न में यह अवश्य लिखें।
- भाव-स्पष्टीकरण में पहले पंक्ति का शाब्दिक अर्थ, फिर निहित भाव लिखें।
10. त्वरित पुनरावृत्ति
- कवि: नागार्जुन (मूल नाम वैद्यनाथ मिश्र, 1911–1998), मैथिली में 'यात्री', 'आधुनिक कबीर', जनकवि।
- 'यह दंतुरित मुसकान' — शिशु की निश्छल मुसकान; वात्सल्य रस; बिंब-योजना; माँ माध्यम; कठोर मन का कोमल होना।
- 'फसल' — जल + श्रम + मिट्टी + सूर्य + हवा का सामूहिक परिणाम; पुनरुक्ति 'एक के नहीं, दो के नहीं'।
- अलंकार: अनुप्रास, पुनरुक्ति प्रकाश, मानवीकरण; भाषा — सहज खड़ी बोली, मुक्त छंद।
- परीक्षा-केंद्र: भावार्थ/व्याख्या, बिंब, शब्दार्थ, 'फसल क्या है', बच्चे की उम्र।
- वैद्यनाथ मिश्र
- सूर्यकांत त्रिपाठी
- रामधारी सिंह
- हरिवंश राय
- दाँत रहित
- नए-नए दाँत निकलना
- टूटे दाँत
- बड़े दाँत
- जल की धारा
- कमल का फूल
- तालाब
- मछली
- केवल बच्चों को भाती है
- मृतक में भी जान डाल सकती है
- क्षणभंगुर है
- सामान्य है
- पलक झपकाना
- बिना पलक झपकाए लगातार देखना
- आँख मूँदना
- तिरछी नज़र
- दादी
- माँ
- पड़ोसी
- बहन
- केवल पानी का
- केवल मिट्टी का
- जल, श्रम, मिट्टी, सूर्य व हवा के सहयोग का
- केवल किसान का
- चाँदनी का
- सूर्य की किरणों/ऊर्जा का
- वर्षा का
- हवा का
- भोजन
- माँ के आत्मीय प्यार/स्नेह की मिठास
- पूजा-सामग्री
- औषधि
- उपमा
- पुनरुक्ति प्रकाश
- श्लेष
- यमक
- सीधी नज़र
- तिरछी निगाह से देखना
- आँख बंद करना
- घूरना
- दोहा
- चौपाई
- मुक्त छंद
- सवैया
- कुरूप
- सुंदर
- शक्तिशाली
- विशाल
- आधुनिक तुलसी
- आधुनिक कबीर
- आधुनिक सूर
- आधुनिक मीरा
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