गिरिधर कविराय की कुंडलिया

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CLASS VII Hindi ~5 अंक Ch 6 of 10
गिरिधर कविराय की कुंडलिया

Class 7 · Hindi · NCERT chapter notes · Akanksha Classes

एक नज़र में
  • कवि: गिरिधर कविराय — रीतिकाल के नीति-काव्य परंपरा के प्रसिद्ध कवि, जो अपनी कुंडलियों के लिए विख्यात हैं।
  • विधा: कुंडलिया — दोहा और रोला के मेल से बना छह पंक्तियों का छंद; यहाँ नीति-काव्य (नीति पर आधारित उपदेशात्मक कविता)।
  • केंद्रीय विषय: व्यावहारिक जीवन-नीति — धैर्य, सच्ची मित्रता, संकट में संयम, सोच-समझकर बोलना और कर्म करना।
  • शैली की विशेषता: सरल, लोक-प्रचलित भाषा में गहरे जीवन-अनुभव; प्रत्येक कुंडलिया का पहला शब्द ही अंतिम शब्द होता है (शृंखला-बद्धता)।
  • भाषा: ब्रजभाषा-मिश्रित सरल हिंदी; लोकोक्तियों एवं मुहावरों का स्वाभाविक प्रयोग।
  • संदेश: कठिन समय में धैर्य रखो, अपनों का साथ न छोड़ो, और विचार करके काम करो।
  • परीक्षा भार: ~5 अंक — भावार्थ, शब्दार्थ, काव्य-सौंदर्य एवं नीति-संदेश पर प्रश्न।
  • पाठ्यपुस्तक: NCERT मल्हार, कक्षा 7 (नई NEP 2025-26 पुस्तक)।
विस्तृत नोट्स

1. कवि परिचय — गिरिधर कविराय

गिरिधर कविराय हिंदी के नीति-काव्य परंपरा के एक लोकप्रिय कवि माने जाते हैं। इनका रचनाकाल लगभग रीतिकाल (अठारहवीं शताब्दी) के आस-पास माना जाता है। ये विशेष रूप से अपनी कुंडलियों के लिए प्रसिद्ध हुए। इनकी कुंडलियाँ जन-जन में इतनी प्रचलित हुईं कि कई पंक्तियाँ आज लोकोक्तियों (कहावतों) के रूप में बोली जाती हैं।

  • प्रमुख विधा: कुंडलिया छंद, जिसमें नीति, व्यवहार और जीवन-अनुभव का सार होता है।
  • विषय: इनकी रचनाओं में आम जीवन की समझदारी, धैर्य, मित्रता, संयम और सदाचार के उपदेश मिलते हैं।
  • भाषा: सरल, बोलचाल की ब्रजभाषा-मिश्रित हिंदी, जिसे सामान्य पाठक भी सहज समझ सके।
  • विशेषता: गूढ़ बात को बहुत सरल उदाहरणों और लोक-व्यवहार से समझाना इनकी सबसे बड़ी कुशलता है।

गिरिधर कविराय की कुंडलियाँ इसलिए अमर हैं क्योंकि वे जीवन की कठिनाइयों में मनुष्य को सही रास्ता दिखाती हैं। इनमें कोई कठिन दर्शन नहीं, बल्कि ऐसी व्यावहारिक नीति है जो हर युग में काम आती है।

2. कुंडलिया छंद — परिचय

कुंडलिया एक मिश्रित (संयुक्त) छंद है जो एक दोहा + एक रोला के मेल से बनता है। इसमें कुल छह पंक्तियाँ होती हैं — पहली दो पंक्तियाँ दोहे की और शेष चार पंक्तियाँ रोले की।

कुंडलिया की सबसे बड़ी विशेषता इसकी शृंखला-बद्धता है —

  • जिस शब्द से कुंडलिया शुरू होती है, उसी शब्द पर वह समाप्त भी होती है। इसी से छंद ‘कुंडल’ (वलय/अंगूठी) के समान गोल जुड़ जाता है, इसलिए नाम पड़ा — कुंडलिया।
  • दोहे की दूसरी पंक्ति का अंतिम अंश रोले की पहली पंक्ति के आरंभ में दोहराया जाता है, जिससे दोनों भाग आपस में जुड़ जाते हैं।

यह संरचना कुंडलिया को सुनने और याद रखने में बहुत सरल बना देती है, इसीलिए नीति-काव्य के लिए यह छंद बहुत उपयुक्त माना गया।

3. प्रथम कुंडलिया — धैर्य (समय का महत्व)

भाव (मूल पंक्तियों का आशय):रहिमन देखि बड़ेन को” की भाँति गिरिधर कविराय की प्रसिद्ध कुंडलिया का संदेश है कि संकट के समय धैर्य कभी नहीं छोड़ना चाहिए। कवि कहते हैं कि बुरा समय आने पर मनुष्य को घबराना नहीं चाहिए, क्योंकि धैर्य रखने वाला व्यक्ति ही अंततः कठिनाई से बाहर निकलता है।

केंद्रीय भाव: “धीरज धरै” — जो धैर्य धारण करता है, उसी का काम अंत में बनता है। उतावलापन और घबराहट संकट को और बढ़ा देती है।

विस्तृत भावार्थ: कवि का मानना है कि जीवन में सुख और दुख दोनों आते-जाते रहते हैं। जैसे रात के बाद सवेरा निश्चित है, वैसे ही कठिनाई के बाद अच्छा समय भी आता है। जो व्यक्ति बुरे समय में भी संयम और धैर्य बनाए रखता है, वही बुद्धिमान है। घबराकर गलत निर्णय लेने वाला व्यक्ति अपनी हानि ही करता है। इसलिए कवि उपदेश देते हैं कि कठिनाई में मन को स्थिर रखो और सही समय की प्रतीक्षा करो।

उदाहरण / प्रयोग

परीक्षा के कठिन प्रश्न-पत्र में यदि विद्यार्थी घबरा जाए तो आता हुआ प्रश्न भी भूल जाता है; पर धैर्य रखकर शांत मन से सोचे तो उत्तर याद आ जाते हैं — यही ‘धीरज धरै’ का व्यावहारिक रूप है।

4. द्वितीय कुंडलिया — सच्ची मित्रता और साथ

भाव: गिरिधर कविराय अपनी एक प्रसिद्ध कुंडलिया में सिखाते हैं कि संकट के समय जो साथ दे, वही सच्चा मित्र है। सुख के दिनों में तो सभी साथ होते हैं, परंतु विपत्ति में जो साथ निभाए, वही सच्चा संबंध है।

केंद्रीय भाव: मित्रता की परीक्षा सुख में नहीं, संकट में होती है। अपनों का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए।

विस्तृत भावार्थ: कवि कहते हैं कि मनुष्य को अपने सच्चे साथियों, सहयोगियों और संबंधों को पहचानना चाहिए। जब बुरा समय आता है, तभी पता चलता है कि कौन अपना है और कौन पराया। इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह दिखावे वाले संबंधों के पीछे न भागे, बल्कि उन रिश्तों को महत्व दे जो हर परिस्थिति में साथ निभाते हैं। साथ ही, अपने मित्रों के साथ भी हमें वैसा ही व्यवहार करना चाहिए — उनके कठिन समय में उन्हें अकेला नहीं छोड़ना चाहिए।

उदाहरण / प्रयोग

जब किसी विद्यार्थी को कठिनाई हो और उसका मित्र अपना समय देकर उसे पढ़ाई में सहायता करे, तो वही सच्ची मित्रता है — न कि केवल खेल-कूद के समय का साथ।

5. तृतीय कुंडलिया — सोच-समझकर बोलना और कर्म करना

भाव: इस कुंडलिया में कवि सिखाते हैं कि मनुष्य को सोच-समझकर वचन बोलने और कार्य करने चाहिए। बिना विचारे बोला गया शब्द और बिना सोचे किया गया काम बाद में पछतावे का कारण बनता है।

केंद्रीय भाव: “बिना विचारे जो करै, सो पाछे पछताय” — बिना सोचे काम करने वाला बाद में पछताता है।

विस्तृत भावार्थ: गिरिधर कविराय यह नीति बताते हैं कि वाणी और कर्म दोनों में संयम आवश्यक है। कठोर या असत्य वचन रिश्तों को बिगाड़ देते हैं, और जल्दबाजी में लिया गया निर्णय हानि पहुँचाता है। इसके विपरीत, जो व्यक्ति किसी भी काम को करने से पहले उसके परिणाम पर विचार करता है, वह कम गलतियाँ करता है और जीवन में सम्मान पाता है। इसलिए कवि का उपदेश है — पहले सोचो, फिर बोलो; पहले विचार करो, फिर करो।

उदाहरण / प्रयोग

क्रोध में आकर किसी को कटु वचन कह देने से मित्रता टूट सकती है; पर थोड़ा रुककर, शांत होकर बात करने से वही समस्या प्रेमपूर्वक सुलझ जाती है।

6. काव्य-सौंदर्य

  • भाषा: सरल, सहज ब्रजभाषा-मिश्रित हिंदी, जो आम पाठक तक सीधे पहुँचती है। कोई कठिन शब्दावली नहीं।
  • छंद: कुंडलिया — दोहा और रोला का सुंदर मेल; शृंखला-बद्धता के कारण गेयता एवं स्मरणीयता।
  • शैली: उपदेशात्मक (नीतिपरक) शैली, जिसमें छोटे-छोटे उदाहरणों से बड़ी बातें समझाई गई हैं।
  • लोकोक्ति-गुण: इनकी कई पंक्तियाँ आज कहावतों के रूप में प्रचलित हैं — यह इनकी सबसे बड़ी सफलता है।
  • रस: मुख्य रूप से शांत रस एवं नीति-भाव; मन को स्थिरता और विवेक का संदेश।
  • अलंकार: सरल दृष्टांत (उदाहरण) एवं अनुप्रास का स्वाभाविक प्रयोग।

7. कठिन शब्द और उनके अर्थ

शब्द अर्थ
धीरज / धैर्यमन की स्थिरता; घबराहट न करना (Patience)
कुंडलियादोहा और रोला से बना छह पंक्तियों का छंद
नीतिसही जीवन-व्यवहार का मार्ग / उपदेश
विपत्तिसंकट / मुसीबत
पछतायपछताना / बाद में दुखी होना
विवेकअच्छे-बुरे की समझ
वचनवाणी / कहे गए शब्द
संयममन और इंद्रियों पर नियंत्रण
उपदेशशिक्षा / सीख
लोकोक्तिकहावत / प्रचलित कथन

8. पाठ का मूल संदेश

गिरिधर कविराय की कुंडलियाँ हमें यह सिखाती हैं कि सफल और सुखी जीवन के लिए धैर्य, सच्ची मित्रता और विवेकपूर्ण आचरण अनिवार्य हैं। संकट में घबराना नहीं चाहिए, अपनों का साथ नहीं छोड़ना चाहिए, और कोई भी बात बोलने या काम करने से पहले उसके परिणाम पर विचार करना चाहिए। ये सरल किंतु गहरी बातें हर युग में, हर आयु के व्यक्ति के लिए उपयोगी हैं। यही कारण है कि सैकड़ों वर्ष बीत जाने पर भी ये कुंडलियाँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं।

अभ्यास प्रश्न (बहुविकल्पीय)
1. “कुंडलिया” छंद किन दो छंदों के मेल से बनता है?
  1. चौपाई और दोहा
  2. दोहा और रोला
  3. सोरठा और चौपाई
  4. रोला और सवैया
उत्तर: (B) कुंडलिया एक दोहा और एक रोला के मेल से बनती है।
2. कुंडलिया छंद में कुल कितनी पंक्तियाँ होती हैं?
  1. चार
  2. पाँच
  3. छह
  4. आठ
उत्तर: (C) कुंडलिया में छह पंक्तियाँ होती हैं।
3. कुंडलिया की प्रमुख विशेषता क्या है?
  1. यह संस्कृत में लिखी जाती है
  2. जिस शब्द से आरंभ होती है, उसी से समाप्त होती है
  3. इसमें केवल वीर रस होता है
  4. इसमें कोई तुक नहीं होती
उत्तर: (B) शृंखला-बद्धता — पहला शब्द ही अंतिम शब्द होता है।
4. गिरिधर कविराय मुख्य रूप से किस विधा के लिए प्रसिद्ध हैं?
  1. नाटक
  2. कुंडलिया (नीति-काव्य)
  3. उपन्यास
  4. निबंध
उत्तर: (B) वे अपनी नीतिपरक कुंडलियों के लिए विख्यात हैं।
5. प्रथम कुंडलिया का मुख्य संदेश क्या है?
  1. धन कमाओ
  2. संकट में धैर्य रखो
  3. खूब घूमो
  4. चुप रहो
उत्तर: (B) बुरे समय में धैर्य धारण करना चाहिए।
6. “धीरज धरै” का अर्थ है —
  1. क्रोध करना
  2. धैर्य धारण करना
  3. दौड़ना
  4. सो जाना
उत्तर: (B) धीरज धरै का अर्थ है धैर्य धारण करना।
7. सच्चे मित्र की पहचान कब होती है?
  1. सुख के समय
  2. संकट के समय
  3. उत्सव के समय
  4. यात्रा के समय
उत्तर: (B) सच्चे मित्र की पहचान संकट/विपत्ति के समय होती है।
8. “बिना विचारे जो करै, सो पाछे पछताय” — इसका भाव है?
  1. जल्दबाजी अच्छी है
  2. बिना सोचे काम करने वाला बाद में पछताता है
  3. विचार करना समय की बर्बादी है
  4. पछतावा अच्छी बात है
उत्तर: (B) बिना सोचे काम करने वाला बाद में पछताता है।
9. गिरिधर कविराय की भाषा कैसी है?
  1. कठिन संस्कृतनिष्ठ
  2. सरल ब्रजभाषा-मिश्रित हिंदी
  3. केवल फ़ारसी
  4. अंग्रेज़ी-मिश्रित
उत्तर: (B) इनकी भाषा सरल और बोलचाल की ब्रजभाषा-मिश्रित हिंदी है।
10. कुंडलिया छंद किस काल की रचना परंपरा से जुड़ा है?
  1. आदिकाल
  2. रीतिकाल / नीति-काव्य परंपरा
  3. आधुनिक काल
  4. छायावाद
उत्तर: (B) यह रीतिकाल की नीति-काव्य परंपरा से जुड़ा है।
11. इन कुंडलियों का मुख्य रस कौन-सा है?
  1. श्रृंगार रस
  2. वीर रस
  3. शांत रस / नीति-भाव
  4. हास्य रस
उत्तर: (C) इनमें शांत रस एवं नीति-भाव प्रमुख है।
12. कुंडलिया में दोहे की दूसरी पंक्ति का अंतिम अंश कहाँ दोहराया जाता है?
  1. कविता के शीर्षक में
  2. रोले की पहली पंक्ति के आरंभ में
  3. अंतिम पंक्ति के मध्य में
  4. कहीं नहीं
उत्तर: (B) रोले की पहली पंक्ति के आरंभ में, जिससे दोनों भाग जुड़ते हैं।
13. गिरिधर कविराय की कुंडलियाँ आज भी क्यों प्रसिद्ध हैं?
  1. वे बहुत लंबी हैं
  2. उनकी पंक्तियाँ लोकोक्तियों के रूप में प्रचलित हैं
  3. वे कठिन भाषा में हैं
  4. वे केवल राजाओं के लिए थीं
उत्तर: (B) उनकी कई पंक्तियाँ कहावतों के रूप में जन-जन में प्रचलित हैं।
14. “विवेक” का अर्थ है —
  1. क्रोध
  2. अच्छे-बुरे की समझ
  3. आलस्य
  4. भय
उत्तर: (B) विवेक का अर्थ है अच्छे-बुरे का भेद समझने की बुद्धि।
15. इन कुंडलियों से हमें कौन-सी सीख मिलती है?
  1. धन ही सब कुछ है
  2. धैर्य, सच्ची मित्रता और सोच-समझकर कार्य करना
  3. केवल पढ़ाई करनी चाहिए
  4. किसी पर विश्वास नहीं करना चाहिए
उत्तर: (B) धैर्य, सच्ची मित्रता और विवेकपूर्ण आचरण — यही मूल सीख है।
महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. कुंडलिया छंद की संरचना और विशेषता समझाइए। (3 अंक)
उत्तर: कुंडलिया एक मिश्रित छंद है जो एक दोहा और एक रोला के मेल से बनता है, और इसमें कुल छह पंक्तियाँ होती हैं। इसकी सबसे बड़ी विशेषता शृंखला-बद्धता है — जिस शब्द से कुंडलिया आरंभ होती है, उसी शब्द पर वह समाप्त होती है, मानो वह कुंडल (अंगूठी) की तरह गोल जुड़ जाती है। साथ ही दोहे की दूसरी पंक्ति का अंतिम अंश रोले की पहली पंक्ति के आरंभ में दोहराया जाता है, जिससे दोनों भाग आपस में जुड़ जाते हैं। यही गुण इसे गेय और स्मरणीय बनाता है।
Q2. “संकट के समय धैर्य रखना चाहिए” — गिरिधर कविराय की कुंडलिया के आधार पर स्पष्ट कीजिए। (4 अंक)
उत्तर: गिरिधर कविराय अपनी कुंडलिया में सिखाते हैं कि बुरे समय में घबराना नहीं चाहिए, बल्कि धैर्य धारण करना चाहिए। जीवन में सुख-दुख आते-जाते रहते हैं; जैसे रात के बाद सवेरा आता है, वैसे ही कठिनाई के बाद अच्छा समय आता है। जो व्यक्ति संकट में संयम बनाए रखता है, वही सही निर्णय ले पाता है और कठिनाई से बाहर निकलता है। इसके विपरीत घबराकर लिया गया निर्णय हानि पहुँचाता है। इसलिए कवि का उपदेश है — ‘धीरज धरै’, अर्थात धैर्य ही संकट से उबरने की कुंजी है।
Q3. सच्ची मित्रता पर गिरिधर कविराय के विचार लिखिए। (3 अंक)
उत्तर: कवि के अनुसार सच्चे मित्र की पहचान सुख में नहीं, बल्कि विपत्ति के समय होती है। सुख के दिनों में तो सभी साथ रहते हैं, पर जो संकट में साथ निभाए वही सच्चा मित्र है। इसलिए मनुष्य को दिखावे वाले संबंधों के पीछे न भागकर ऐसे संबंधों को महत्व देना चाहिए जो हर परिस्थिति में साथ दें। साथ ही, हमें भी अपने मित्रों के कठिन समय में उनका साथ देना चाहिए।
Q4. “बिना विचारे जो करै, सो पाछे पछताय” — इस पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए। (3 अंक)
उत्तर: इस पंक्ति में कवि सिखाते हैं कि कोई भी काम बिना सोचे-विचारे नहीं करना चाहिए। जल्दबाजी या बिना विचार किए लिया गया निर्णय अक्सर हानि पहुँचाता है और बाद में पछताना पड़ता है। इसके विपरीत, जो व्यक्ति किसी काम को करने से पहले उसके परिणाम पर विचार करता है, वह कम गलतियाँ करता है और सम्मान पाता है। अतः वाणी और कर्म दोनों में विवेक एवं संयम आवश्यक है।
Q5. गिरिधर कविराय की कुंडलियों की भाषा-शैली की विशेषताएँ लिखिए। (4 अंक)
उत्तर: गिरिधर कविराय की भाषा सरल, सहज और बोलचाल की ब्रजभाषा-मिश्रित हिंदी है, जिसे सामान्य पाठक भी आसानी से समझ लेता है। उनकी शैली उपदेशात्मक (नीतिपरक) है, जिसमें छोटे-छोटे उदाहरणों और लोक-व्यवहार से बड़ी बातें समझाई गई हैं। कुंडलिया छंद की शृंखला-बद्धता से उनकी रचनाएँ गेय और स्मरणीय बन जाती हैं। उनकी कई पंक्तियाँ आज लोकोक्तियों के रूप में प्रचलित हैं, जो उनकी सबसे बड़ी सफलता है। इन रचनाओं में शांत रस और नीति-भाव की प्रधानता है।
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