यह संस्मरण 1975 की पटना की भयंकर बाढ़ का आँखों देखा हाल है। फणीश्वरनाथ रेणु बताते हैं कि जब प्रकृति का प्रकोप टूटता है, तब बड़े-बड़े बंगले और झोपड़ियाँ एक समान हो जाती हैं — पर सच्ची मानवता और आत्मीयता तभी जागती है जब लोग आपदा में एक-दूसरे का सहारा बनते हैं।
लेखक
फणीश्वरनाथ रेणु — आँचलिक (ग्रामीण) कथा-साहित्य के प्रसिद्ध सम्राट; “मैला आँचल” उपन्यास के रचयिता।
विधा
रिपोर्ताज (Reportage) — आँखों देखा, अनुभव किया हुआ सजीव वर्णन; पत्रकारिता और साहित्य का संगम।
घटनास्थल एवं समय
पटना शहर, सन् 1975 की भयानक बाढ़ — जब गंगा का जल नगर में घुस आया।
केंद्रीय भाव
आपदा में मनुष्य का भय, उत्सुकता, संघर्ष और आपसी सहयोग की भावना।
संक्षिप्त सारांश
“इस जल प्रलय में” फणीश्वरनाथ रेणु द्वारा लिखा गया एक मार्मिक रिपोर्ताज है, जिसमें उन्होंने सन् 1975 में पटना नगर में आई भयंकर बाढ़ का आँखों देखा, अनुभव किया हुआ वर्णन प्रस्तुत किया है। लेखक स्वयं उस बाढ़ के बीच रहते हैं और घटनाओं को बहुत निकट से देखते हैं। पहले शहर में बाढ़ की अफवाहें फैलती हैं, फिर धीरे-धीरे पानी सचमुच नगर में घुसने लगता है। लेखक बताते हैं कि किस प्रकार लोग रेडियो पर जल-स्तर के समाचार सुनते हैं, पानी बढ़ने की गति का अनुमान लगाते हैं और अपने सामान को सुरक्षित ऊँची जगहों पर रखने लगते हैं। जैसे-जैसे पानी चढ़ता है, लोगों के मन में भय के साथ-साथ एक विचित्र उत्सुकता और रोमांच भी पैदा होता है। अंततः बाढ़ का जल लेखक के घर के दरवाज़े तक पहुँच जाता है। इस पूरे रिपोर्ताज में रेणु ने बाढ़ की विभीषिका, उससे होने वाली तबाही, लोगों की मनोदशा और संकट में जागने वाली मानवीय सहानुभूति का अत्यंत सजीव चित्रण किया है।
बाढ़ का आगमन और लोगों की उत्सुकता
रिपोर्ताज के आरंभ में लेखक बताते हैं कि बाढ़ आने से पहले ही शहर में तरह-तरह की अफवाहें फैलने लगती हैं। लोग रेडियो और समाचारों से जल-स्तर की जानकारी लेते रहते हैं। हर व्यक्ति यह अनुमान लगाने में लगा रहता है कि पानी कितने बजे, कितना ऊपर चढ़ेगा। जब पानी सचमुच नगर में घुसने लगता है, तो लोगों में भय के साथ-साथ एक अजीब-सी उत्सुकता भी होती है — वे बार-बार बाहर निकलकर पानी का बढ़ता स्तर देखते हैं, सीढ़ियों पर निशान लगाते हैं और एक-दूसरे को खबरें देते हैं। यह मनोदशा बताती है कि मनुष्य संकट से डरता तो है, पर साथ ही उसमें जिज्ञासा और रोमांच की भावना भी बनी रहती है।
पानी का बढ़ना और बढ़ता संकट
धीरे-धीरे पानी का स्तर तेज़ी से बढ़ने लगता है। लेखक बताते हैं कि किस प्रकार लोग अपना ज़रूरी सामान, बर्तन, अनाज और कीमती चीज़ें ऊँचे स्थानों पर, छतों पर और मचानों पर रखने लगते हैं। नल का पानी आना बंद हो जाता है और शुद्ध पीने के पानी की समस्या खड़ी हो जाती है। बिजली चली जाती है। बाढ़ के पानी में मरे हुए जानवर, गंदगी और कूड़ा-करकट बहता दिखाई देता है, जिससे बीमारी फैलने का भय बढ़ जाता है। बाज़ार बंद हो जाते हैं और खाने-पीने की चीज़ों के दाम बढ़ने लगते हैं। इस तरह बाढ़ केवल पानी का प्रकोप नहीं, बल्कि अपने साथ अनेक कठिनाइयाँ लेकर आती है।
आपदा में समानता और मानवता
रेणु इस रिपोर्ताज में एक गहरी बात की ओर संकेत करते हैं — आपदा के समय अमीर और गरीब का भेद मिट जाता है। बाढ़ का पानी न बड़े बंगले को छोड़ता है, न झोपड़ी को। सभी एक समान संकट में फँस जाते हैं। ऐसे समय में लोगों के भीतर की मानवता जाग उठती है। पड़ोसी एक-दूसरे की मदद करते हैं, अपरिचित लोग भी एक-दूसरे का सहारा बनते हैं। नाव वाले लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुँचाते हैं। यह दृश्य दिखाता है कि संकट के क्षण में ही मनुष्य की असली संवेदनशीलता और सहयोग की भावना प्रकट होती है। लेखक की दृष्टि में यही आपदा का सबसे उज्ज्वल पक्ष है।
रिपोर्ताज की भाषा और शैली
इस रचना की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सजीवता है। रेणु ने बाढ़ को इस प्रकार वर्णित किया है मानो पाठक स्वयं वहाँ उपस्थित हो। उन्होंने आँचलिक शब्दावली, संवादात्मक शैली और छोटे-छोटे जीवंत दृश्यों का प्रयोग किया है। रेडियो की घोषणाएँ, लोगों की बातचीत, अफवाहें और घटनाओं का क्रम — सब कुछ इतनी बारीकी से प्रस्तुत किया गया है कि पूरा वातावरण आँखों के सामने खड़ा हो जाता है। यही रिपोर्ताज विधा की विशेषता है — इसमें तथ्य (पत्रकारिता) और भाव (साहित्य) दोनों का सुंदर मेल होता है।
भाव-सौंदर्य एवं संदेश
इस रिपोर्ताज का भाव-सौंदर्य इसकी सच्चाई और संवेदनशीलता में है। लेखक केवल बाढ़ की तबाही का वर्णन नहीं करते, बल्कि उस संकट में मनुष्य की मनोदशा, भय, साहस और सहयोग की भावना को भी उभारते हैं। रचना यह संदेश देती है कि प्राकृतिक आपदाएँ चाहे कितनी भी भयानक क्यों न हों, यदि मनुष्य एकजुट होकर एक-दूसरे का सहारा बने, तो वह हर विपत्ति का सामना कर सकता है। साथ ही यह भी कि प्रकृति के सामने मनुष्य का अहंकार और भेदभाव व्यर्थ है — सब बराबर हैं।
- यह रचना रिपोर्ताज विधा में लिखी गई है — आँखों देखा सजीव वर्णन।
- घटना सन् 1975 की पटना की बाढ़ पर आधारित है।
- लेखक स्वयं बाढ़ के बीच रहकर घटनाओं को निकट से देखते हैं।
- लोग रेडियो और अफवाहों से जल-स्तर का अनुमान लगाते रहते थे।
- बाढ़ में भय के साथ-साथ लोगों में विचित्र उत्सुकता भी थी।
- आपदा में अमीर-गरीब का भेद मिट गया — सब एक समान संकट में।
- संकट के समय लोगों में मानवता एवं आपसी सहयोग की भावना जागी।
“इस जल प्रलय में” रचना रिपोर्ताज विधा का सुंदर उदाहरण है — स्पष्ट कीजिए।
- रिपोर्ताज में किसी घटना का आँखों देखा, अनुभव किया हुआ वर्णन होता है।
- लेखक स्वयं बाढ़ के बीच रहकर घटनाओं को निकट से देखते हैं।
- इसमें तथ्य (पत्रकारिता) और भाव (साहित्य) दोनों का मेल है।
- सजीव दृश्य, संवाद और आँचलिक भाषा से वातावरण जीवंत हो उठता है।
बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा के समय मनुष्य की मनोदशा कैसी होती है? रचना के आधार पर लिखिए।
- आरंभ में लोगों में भय के साथ उत्सुकता और जिज्ञासा होती है।
- वे बार-बार पानी का बढ़ता स्तर देखते और खबरें साझा करते हैं।
- संकट बढ़ने पर भय गहरा होता है, पर साहस भी बना रहता है।
- अंततः आपसी सहयोग और मानवता की भावना जाग उठती है।
याद रखें — “रेणु + रिपोर्ताज + 1975 की पटना बाढ़”। और मूल संदेश का सूत्र: “पानी सबको बराबर करता है, पर मानवता सबको जोड़ती है।” इन दो बातों से पूरी रचना का सार पकड़ में आ जाता है।
सबसे आम गलती — विद्यार्थी इसे साधारण कहानी समझ लेते हैं। याद रखें: यह रिपोर्ताज है — आँखों देखी सच्ची घटना का वर्णन, कोई काल्पनिक कथा नहीं। उत्तर में “रिपोर्ताज विधा”, “1975 की पटना बाढ़” और “आपसी सहयोग का संदेश” अवश्य लिखें।
प्र.1 रिपोर्ताज किसे कहते हैं? “इस जल प्रलय में” को रिपोर्ताज क्यों कहा गया है?
उत्तर: रिपोर्ताज वह गद्य-विधा है जिसमें किसी वास्तविक घटना का आँखों देखा एवं अनुभव किया हुआ सजीव वर्णन प्रस्तुत किया जाता है। इसमें पत्रकारिता की तथ्यपरकता और साहित्य की संवेदनशीलता दोनों होती हैं। “इस जल प्रलय में” को रिपोर्ताज इसलिए कहा गया है, क्योंकि इसमें फणीश्वरनाथ रेणु ने सन् 1975 की पटना की बाढ़ का आँखों देखा वर्णन किया है। लेखक स्वयं उस बाढ़ के बीच उपस्थित रहकर घटनाओं, लोगों की मनोदशा और आपदा के दृश्यों को बारीकी से चित्रित करते हैं, इसलिए यह रचना एक आदर्श रिपोर्ताज है।
प्र.2 बाढ़ आने पर शहर के लोगों ने किस प्रकार की प्रतिक्रिया दिखाई?
उत्तर: बाढ़ आने से पहले ही शहर में अनेक अफवाहें फैलने लगीं। लोग रेडियो और समाचारों से जल-स्तर की जानकारी लेते रहे और बार-बार अनुमान लगाते रहे कि पानी कितना ऊपर चढ़ेगा। जब पानी सचमुच घुसने लगा, तो लोगों में भय के साथ-साथ विचित्र उत्सुकता भी थी — वे बार-बार पानी का बढ़ता स्तर देखते और एक-दूसरे को खबरें देते। फिर वे अपना ज़रूरी सामान, अनाज और कीमती चीज़ें ऊँचे स्थानों पर रखने लगे और सुरक्षित जगहों की ओर जाने लगे। इस प्रकार लोगों ने भय, उत्सुकता और सतर्कता — सभी प्रकार की प्रतिक्रियाएँ दिखाईं।
प्र.3 बाढ़ जैसी आपदा किस प्रकार अमीर-गरीब का भेद मिटा देती है? रचना के आधार पर समझाइए।
उत्तर: रेणु इस रचना में स्पष्ट करते हैं कि प्राकृतिक आपदा के सामने सभी मनुष्य समान होते हैं। बाढ़ का पानी न बड़े बंगलों को छोड़ता है और न ही गरीबों की झोपड़ियों को — सभी एक समान संकट में फँस जाते हैं। ऐसे समय में धन, पद और हैसियत का कोई महत्व नहीं रह जाता। सभी को एक जैसी कठिनाइयाँ झेलनी पड़ती हैं — पानी, भोजन और सुरक्षित स्थान की समस्या। यही कारण है कि संकट के समय लोग आपसी भेदभाव भूलकर एक-दूसरे की मदद करने लगते हैं। इस प्रकार आपदा मनुष्य को यह सिखाती है कि प्रकृति के सामने सब बराबर हैं।
प्र.4 इस रचना से हमें क्या संदेश मिलता है?
उत्तर: इस रचना से हमें यह संदेश मिलता है कि प्राकृतिक आपदाएँ चाहे कितनी भी भयानक क्यों न हों, यदि मनुष्य एकजुट होकर एक-दूसरे का सहारा बने तो हर विपत्ति का सामना किया जा सकता है। संकट के समय में ही मनुष्य की असली मानवता, संवेदनशीलता और सहयोग की भावना प्रकट होती है। साथ ही रचना यह भी सिखाती है कि प्रकृति के सामने मनुष्य का अहंकार और अमीरी-गरीबी का भेद व्यर्थ है — सब समान हैं। अतः हमें आपदा के समय धैर्य, साहस और परस्पर सहयोग का भाव बनाए रखना चाहिए। यही इस रचना का मूल संदेश है।
- ✅ लेखक फणीश्वरनाथ रेणु; विधा — रिपोर्ताज (आँखों देखा वर्णन)।
- ✅ घटना — सन् 1975 की पटना की भयंकर बाढ़।
- ✅ लोग रेडियो/अफवाहों से जल-स्तर का अनुमान लगाते थे; भय के साथ उत्सुकता।
- ✅ आपदा में अमीर-गरीब का भेद मिटा — सब एक समान संकट में।
- ✅ संदेश — एकता, मानवता और आपसी सहयोग से हर विपत्ति का सामना संभव।
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