रीढ़ की हड्डी

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CLASS IX Hindi Ch 16 of 16
रीढ़ की हड्डी

Class 9 · Hindi · NCERT chapter notes · Akanksha Classes

💡 मूल विचार

'रीढ़ की हड्डी' जगदीशचंद्र माथुर का एक तीखा एकांकी है जो दहेज प्रथा और लड़कियों को बोझ समझने वाली समाज की सड़ी-गली सोच पर करारा प्रहार करता है। यह नाटक कहता है — असली कमी लड़कियों में नहीं, बल्कि उन पुरुषों में है जिनके पास आत्मसम्मान रूपी 'रीढ़ की हड्डी' ही नहीं!

लेखक

जगदीशचंद्र माथुर — प्रसिद्ध एकांकीकार एवं नाटककार।

विधा

एकांकी (एक अंक का नाटक), सामाजिक व्यंग्य प्रधान।

मुख्य पात्र

रामस्वरूप, गोपालप्रसाद, उमा, शंकर, रतन।

केंद्रीय समस्या

दहेज प्रथा एवं नारी की दयनीय स्थिति।

📚 विस्तार से

नाटक का परिवेश एवं आरंभ

एकांकी का सारा घटनाक्रम रामस्वरूप के घर के बैठक-कक्ष में एक ही शाम को घटित होता है। रामस्वरूप अपनी पढ़ी-लिखी बेटी उमा का विवाह कराना चाहते हैं। लड़के वाले — गोपालप्रसाद और उनका बेटा शंकर — उमा को 'देखने' आने वाले हैं। रामस्वरूप घबराए हुए हैं क्योंकि उन्होंने लड़के वालों से यह छिपाया है कि उमा वास्तव में बहुत पढ़ी-लिखी है। उस समय का समाज मानता था कि अधिक पढ़ी-लिखी लड़की का विवाह कठिन होता है, इसलिए माता-पिता को झूठ का सहारा लेना पड़ता था। नौकर रतन को भी समझाया जाता है कि वह अच्छे से व्यवहार करे और घर की कमियाँ छिप जाएँ।

लड़की दिखाने की कुप्रथा

एकांकी का सबसे मार्मिक भाग वह है जहाँ उमा को सजा-धजाकर लड़के वालों के सामने 'प्रदर्शित' किया जाता है, मानो वह कोई वस्तु हो जिसे खरीदा-बेचा जाना है। गोपालप्रसाद उमा से तरह-तरह के प्रश्न पूछते हैं — गाना गाने को कहते हैं, उसकी आँखों, दाँतों, स्वास्थ्य तक का निरीक्षण करना चाहते हैं, जैसे कोई पशु-मेले में जानवर परखा जा रहा हो। यह दृश्य नारी की अपमानजनक स्थिति को बेपर्दा करता है। उमा यह सब चुपचाप सहती है, परंतु उसके भीतर असंतोष और स्वाभिमान की आग सुलगती रहती है।

उमा का स्वाभिमानपूर्ण विद्रोह

जब अपमान सहन की सीमा पार कर जाता है, तब उमा का धैर्य टूट जाता है और वह स्पष्ट शब्दों में बोल पड़ती है। वह बताती है कि वह केवल मैट्रिक पास नहीं, बल्कि बी.ए. तक पढ़ी हुई है — यानी उसके पिता ने झूठ बोला था। फिर वह शंकर की कलई खोल देती है। शंकर वही नवयुवक है जो कॉलेज के दिनों में लड़कियों के छात्रावास के चक्कर लगाया करता था और लड़कियों को छेड़ता था। उमा निडर होकर कहती है कि जिस लड़के में स्वयं चरित्र और रीढ़ की हड्डी नहीं, वह दूसरों को क्या परखेगा। उमा का यह विद्रोह पूरे नाटक का चरमबिंदु है, जहाँ एक 'दिखाई जाने वाली' लड़की 'परखने वाली' बन जाती है।

'रीढ़ की हड्डी' शीर्षक का गूढ़ अर्थ

नाटक के अंत में शंकर झुककर बैठा रहता है, मानो उसकी रीढ़ की हड्डी ही न हो। गोपालप्रसाद घबराकर कहते हैं कि लगता है इसमें रीढ़ की हड्डी ही नहीं है। यहाँ 'रीढ़ की हड्डी' दोहरे अर्थ में प्रयुक्त होती है — शाब्दिक रूप से शंकर की कमज़ोर शारीरिक मुद्रा, और प्रतीकात्मक रूप से उसके चरित्र, आत्मसम्मान और नैतिक बल का अभाव। शीर्षक व्यंग्यपूर्ण है — जो समाज लड़की में कमी ढूँढ़ता है, उसी समाज का 'योग्य' वर असल में रीढ़विहीन निकलता है।

दहेज प्रथा पर प्रहार

गोपालप्रसाद बार-बार धन, सुविधाओं और लड़की के गुणों की बात इस तरह करते हैं मानो विवाह कोई व्यापारिक सौदा हो। लेखक इसके माध्यम से दहेज प्रथा और लड़कियों को आर्थिक बोझ समझने वाली मानसिकता पर तीव्र व्यंग्य करते हैं। नाटक यह संदेश देता है कि विवाह दो व्यक्तियों के बीच परस्पर सम्मान का बंधन है, न कि लेन-देन का बाज़ार।

रामस्वरूप का अंतर्द्वंद्व

रामस्वरूप एक संवेदनशील पिता हैं जो बेटी से प्रेम करते हैं, परंतु समाज के दबाव में झूठ बोलने को विवश हैं। उनका चरित्र उस मध्यवर्गीय पिता का प्रतिनिधित्व करता है जो प्रगतिशील विचार रखते हुए भी रूढ़ियों से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाता। जब उमा सच बोलती है, तब रामस्वरूप के भीतर का संकोच और बेटी पर गर्व दोनों उभरते हैं।

📖 मुख्य प्रसंग
  • रामस्वरूप द्वारा उमा की पढ़ाई छिपाना।
  • उमा को सजा-धजाकर 'दिखाया' जाना।
  • गोपालप्रसाद के अपमानजनक प्रश्न एवं परीक्षण।
  • उमा द्वारा शंकर के कॉलेज-काल के चरित्र की पोल खोलना।
  • अंत में शंकर का रीढ़विहीन-सा झुककर बैठना।
📝 आदर्श उत्तर

प्रश्न: 'रीढ़ की हड्डी' शीर्षक की सार्थकता पर प्रकाश डालिए।

  1. शीर्षक का शाब्दिक संदर्भ बताइए — अंत में शंकर का झुककर बैठना।
  2. प्रतीकात्मक अर्थ स्पष्ट कीजिए — आत्मसम्मान व चरित्रबल का अभाव।
  3. व्यंग्य दिखाइए — जो लड़की परखता है, वही रीढ़विहीन है।
  4. मूल संदेश से जोड़िए।
उत्तर: 'रीढ़ की हड्डी' शीर्षक अत्यंत सटीक एवं व्यंग्यपूर्ण है। शाब्दिक रूप से यह शंकर की उस झुकी हुई मुद्रा की ओर संकेत करता है जिसे देखकर गोपालप्रसाद कहते हैं कि लगता है इसमें रीढ़ की हड्डी ही नहीं। प्रतीकात्मक रूप से 'रीढ़ की हड्डी' मनुष्य के आत्मसम्मान, नैतिक साहस और चरित्रबल का प्रतीक है। शंकर में ये गुण अनुपस्थित हैं — वह कॉलेज में लड़कियों को छेड़ता था और सामने आने पर निरुत्तर हो जाता है। शीर्षक का गहरा व्यंग्य यह है कि जो समाज और 'वर पक्ष' लड़की में कमियाँ ढूँढ़ता है, उसी का योग्य समझा गया लड़का वास्तव में रीढ़विहीन निकलता है। इस प्रकार शीर्षक पूरे एकांकी के केंद्रीय भाव को सशक्त रूप से अभिव्यक्त करता है।
📝 आदर्श उत्तर

प्रश्न: उमा के चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।

  1. शिक्षित एवं विचारशील होना बताइए।
  2. आत्मसम्मानी एवं निडर स्वभाव पर बल दीजिए।
  3. अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने का गुण जोड़िए।
उत्तर: उमा इस एकांकी की केंद्रीय एवं प्रभावशाली पात्र है। वह बी.ए. तक शिक्षित, विचारशील और आत्मसम्मान से भरी युवती है। आरंभ में वह संस्कारवश अपमान सहती है, परंतु जब सहनशीलता की सीमा टूट जाती है तो वह निडर होकर सच बोलती है। वह न केवल अपनी शिक्षा का सत्य प्रकट करती है, बल्कि शंकर के दूषित चरित्र की पोल भी खोल देती है। उमा परंपरागत 'दिखाई जाने वाली' लड़की की छवि तोड़कर एक स्वाभिमानी, साहसी और जागरूक नारी के रूप में उभरती है, जो अन्याय और अपमान के विरुद्ध खड़ी होती है।
🧠 याद रखने की तरकीब

शीर्षक याद रखने का सूत्र — \"शंकर झुका, उमा डटी\"। शंकर की झुकी पीठ = रीढ़ की हड्डी का अभाव; उमा का सीधा खड़ा होना = असली रीढ़ उसी में है।

🔥 झटपट तथ्य
विधा: एकांकीलेखक: ज. माथुरविषय: दहेजनायिका: उमारीढ़विहीन: शंकर
⚠️ अंक न गँवाएँ

उत्तर लिखते समय केवल कहानी मत दोहराइए। 'रीढ़ की हड्डी' के प्रतीकात्मक अर्थ और दहेज पर व्यंग्य को अवश्य जोड़िए — परीक्षक यही गहराई देखते हैं। शीर्षक के दोनों अर्थ (शाब्दिक + प्रतीकात्मक) लिखना न भूलें।

🎯 महत्वपूर्ण प्रश्न (उत्तर सहित)

प्रश्न 1. रामस्वरूप ने अपनी बेटी उमा की शिक्षा के बारे में झूठ क्यों बोला?

उत्तर: उस समय के समाज में यह मान्यता प्रचलित थी कि अधिक पढ़ी-लिखी लड़की का विवाह कठिन हो जाता है, क्योंकि लड़के वाले अधिक शिक्षित लड़की को अपने अनुकूल नहीं समझते थे। रामस्वरूप यह डर मन में रखते थे कि यदि गोपालप्रसाद को उमा के बी.ए. तक पढ़े होने का पता चल गया तो वे विवाह से इनकार कर देंगे। इसी सामाजिक दबाव और बेटी का विवाह कराने की चिंता में रामस्वरूप ने झूठ का सहारा लिया और उमा को केवल कम पढ़ी-लिखी बताया। यह झूठ उनकी विवशता को दर्शाता है, साथ ही उस रूढ़िवादी मानसिकता पर भी प्रश्न उठाता है जो नारी की शिक्षा को विवाह में बाधा मानती है।

प्रश्न 2. 'लड़की दिखाने' की प्रथा पर एकांकी किस प्रकार व्यंग्य करता है?

उत्तर: एकांकी में उमा को सजा-धजाकर लड़के वालों के सामने इस प्रकार प्रस्तुत किया जाता है मानो वह कोई वस्तु हो। गोपालप्रसाद उससे गाना गाने को कहते हैं, उसके स्वास्थ्य, आँखों और रूप-रंग का निरीक्षण करना चाहते हैं, जैसे किसी पशु-मेले में जानवर परखा जाता है। लेखक इस दृश्य के माध्यम से दिखाते हैं कि यह प्रथा नारी के आत्मसम्मान का घोर अपमान है। इसमें लड़की की भावनाओं, बुद्धि और इच्छा का कोई महत्व नहीं रहता — केवल उसका बाहरी रूप परखा जाता है। माथुर जी इस कुप्रथा पर तीखा व्यंग्य करते हुए समाज की संवेदनहीनता को उजागर करते हैं।

प्रश्न 3. उमा ने शंकर की पोल किस प्रकार खोली और इसका क्या प्रभाव पड़ा?

उत्तर: जब अपमान सहन की सीमा पार हो गई, तब उमा निडर होकर बोल पड़ी। उसने बताया कि वह केवल कम पढ़ी-लिखी नहीं, बल्कि बी.ए. तक शिक्षित है। फिर उसने शंकर की असलियत सामने रखी — शंकर वही युवक था जो कॉलेज के दिनों में लड़कियों के छात्रावास के चक्कर लगाता और उन्हें छेड़ता था। उमा ने स्पष्ट कहा कि जिसमें स्वयं चरित्र और आत्मसम्मान नहीं, वह दूसरों को परखने का अधिकारी कैसे हो सकता है। इसका प्रभाव यह हुआ कि शंकर निरुत्तर होकर सिर झुकाए बैठ गया और गोपालप्रसाद की सारी अकड़ धरी रह गई। उमा का यह साहस पूरे एकांकी का चरमबिंदु बन जाता है।

प्रश्न 4. इस एकांकी का मूल उद्देश्य अथवा संदेश क्या है?

उत्तर: इस एकांकी का मूल उद्देश्य समाज में व्याप्त दहेज प्रथा, 'लड़की दिखाने' की अपमानजनक परंपरा और नारी को बोझ समझने वाली रूढ़िवादी मानसिकता पर प्रहार करना है। लेखक यह संदेश देते हैं कि नारी न तो कोई वस्तु है और न ही बोझ; वह आत्मसम्मान और बुद्धि से युक्त एक स्वतंत्र व्यक्तित्व है। साथ ही नाटक यह भी बताता है कि असली योग्यता रूप या धन में नहीं, बल्कि चरित्र और नैतिक बल — अर्थात 'रीढ़ की हड्डी' — में है। उमा का साहस यह प्रेरणा देता है कि अन्याय और अपमान के विरुद्ध आवाज़ उठानी चाहिए। यही इस एकांकी का सार्थक एवं प्रेरक संदेश है।

✅ झटपट दोहराव
  • ✅ 'रीढ़ की हड्डी' जगदीशचंद्र माथुर का सामाजिक व्यंग्य एकांकी है।
  • ✅ यह दहेज प्रथा एवं 'लड़की दिखाने' की कुप्रथा पर प्रहार करता है।
  • ✅ उमा शिक्षित, स्वाभिमानी एवं निडर नायिका है।
  • ✅ शीर्षक शंकर के चरित्र-बल (आत्मसम्मान) के अभाव का प्रतीक है।
  • ✅ संदेश — नारी बोझ नहीं, सम्मान की अधिकारी है।
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