सवैये

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CLASS IX Hindi Ch 9 of 16
सवैये

Class 9 · Hindi · NCERT chapter notes · Akanksha Classes

💡 मूल भाव

रसखान एक मुसलमान भक्त कवि थे, जिनका हृदय श्रीकृष्ण के प्रेम में पूरी तरह डूबा हुआ था। इन सवैयों में वे कहते हैं कि उन्हें न तो स्वर्ग चाहिए, न राजपाट, न देवताओं का सुख — उनकी तो एक ही चाह है कि वे किसी भी रूप में ब्रजभूमि और कृष्ण के निकट रहें। यहाँ प्रेम और भक्ति सब सुखों से बड़ी सिद्ध होती है।

कवि

रसखान (सैयद इब्राहीम) — कृष्णभक्ति शाखा के प्रसिद्ध मुसलमान कवि।

रचना

ये सवैये “सुजान रसखान” से लिए गए हैं; काल — भक्तिकाल।

छंद

सवैया — एक वर्णिक छंद, जिसमें प्रत्येक चरण में समान वर्ण होते हैं।

भाषा

मधुर एवं प्रवाहमयी ब्रजभाषा, जिसमें कृष्ण-प्रेम घुला हुआ है।

📚 सप्रसंग व्याख्या एवं सारांश

1. कवि एवं काव्य का परिचय

रसखान का वास्तविक नाम सैयद इब्राहीम था। वे जाति से मुसलमान थे, परन्तु उनका मन श्रीकृष्ण की भक्ति में इतना रम गया कि वे कृष्णभक्ति शाखा के अमर कवियों में गिने जाने लगे। कहा जाता है कि “भागवत” का फ़ारसी अनुवाद पढ़कर उनके हृदय में कृष्ण के प्रति अनुराग जागा और वे ब्रज में आकर बस गए। इन सवैयों में उनका कृष्ण-प्रेम और ब्रज की धरती के प्रति अपार लगाव प्रकट होता है। वे यह कहते हैं कि सांसारिक तथा स्वर्गिक सब सुखों की तुलना में कृष्ण और ब्रज का प्रेम कहीं अधिक मूल्यवान है। उनका प्रेम निश्छल, सहज और अनन्य है।

2. पहला सवैया — “मानुष हौं तो वही रसखानि”

इस सवैये में रसखान अपनी अद्भुत कामना व्यक्त करते हैं। वे कहते हैं कि यदि मुझे अगले जन्म में मनुष्य बनना पड़े, तो मैं केवल वही रसखान बनूँ जो ब्रज के गोकुल गाँव के ग्वालों के बीच रहे। यदि मुझे पशु बनना पड़े, तो मैं नंद की गायों के साथ चरने वाला पशु ही बनूँ। यदि पत्थर बनना पड़े, तो मैं उसी गोवर्धन पर्वत का पत्थर बनूँ, जिसे कृष्ण ने इंद्र का कोप झेलने के लिए अपनी उँगली पर उठा लिया था। और यदि पक्षी बनना पड़े, तो मैं उसी कदम्ब की डाल पर बसेरा करूँ, जिस पर बैठकर कृष्ण बाँसुरी बजाते थे। इस प्रकार रसखान किसी भी रूप में — मनुष्य, पशु, पत्थर या पक्षी — ब्रज और कृष्ण के निकट ही रहना चाहते हैं। यही उनकी सबसे बड़ी अभिलाषा है।

3. दूसरा सवैया — “या लकुटी अरु कामरिया पर”

इस सवैये में रसखान कृष्ण की लाठी (लकुटी) और कम्बल (कामरिया) के प्रति अपना अगाध प्रेम प्रकट करते हैं। वे कहते हैं कि कृष्ण की इस छोटी-सी लाठी और कम्बल पर मैं तीनों लोकों का राज्य भी न्योछावर कर सकता हूँ। कृष्ण के सौंदर्य और सहज ग्वाल-रूप पर मुग्ध होकर वे कहते हैं कि आठों सिद्धियों और नौ निधियों के सुख को भी उन्होंने भुला दिया है। उन्हें न तो ऐश्वर्य चाहिए, न वैभव। उनकी एकमात्र इच्छा यह है कि वे जीवन भर ब्रज के उन्हीं वन, बाग और तालाबों (कुंजन) को निहारते रहें, जहाँ कृष्ण ने अपना बचपन बिताया और लीलाएँ कीं। ब्रज की यह धूल उनके लिए करोड़ों सुखों से बढ़कर है।

4. तीसरा सवैया — “कानन दै अँगुरी”

इस सवैये में कृष्ण की बाँसुरी का मनमोहक दृश्य चित्रित है। रसखान कहते हैं कि कृष्ण अपने कानों पर उँगली रखकर, अपने सुंदर वस्त्र (धोती-दुपट्टा) सँभालते हुए जब मुरली बजाते हैं, तो उनकी छवि अत्यंत मनोहर लगती है। एक ग्वालिन यह दृश्य देखकर मुग्ध हो जाती है और दूसरी से उसकी प्रशंसा करते नहीं थकती। वह कहती है कि हे सखी! जब-जब मेरी आँखें कृष्ण के इस सुंदर रूप पर पड़ती हैं, तब-तब मेरा मन उन्हीं पर अटक जाता है और वहीं रुक जाता है — मानो वह मन कृष्ण के रूप-जाल में फँसकर लौटना ही नहीं चाहता। इस प्रकार कवि ने कृष्ण के रूप-सौंदर्य और गोपियों के अनुराग का सजीव चित्रण किया है।

5. चौथा सवैया — “मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं”

इस सवैये में गोपी कृष्णमय हो जाने की अपनी प्रबल इच्छा व्यक्त करती है। वह कहती है कि मैं कृष्ण के समान ही बनना चाहती हूँ — अपने सिर पर मोरपंख धारण करूँगी, शरीर पर गुंजों की माला पहनूँगी और पीताम्बर (पीली धोती) ओढ़कर ग्वालों के साथ वन-वन घूमूँगी। वह यहाँ तक कहती है कि रसखान-रूपी कृष्ण के इन सब सुखों के लिए वह अपना समस्त धन-वैभव लुटा देगी, परन्तु एक शर्त है — वह कृष्ण की मुरली अपने होठों पर कभी नहीं रखेगी। इसका कारण यह है कि मुरली कृष्ण की सबसे प्रिय वस्तु है और कृष्ण उसे सदा अपने होठों से लगाए रखते हैं; गोपी को मुरली से ईर्ष्या है, क्योंकि वह कृष्ण के इतने निकट रहती है। यह भाव गोपी के अनन्य और अधिकारपूर्ण प्रेम को दर्शाता है।

6. भाव-सौंदर्य एवं विषय-विश्लेषण

अनन्य कृष्ण-भक्ति: इन सवैयों का केंद्रीय भाव रसखान की निश्छल और अनन्य कृष्ण-भक्ति है। एक मुसलमान होकर भी उनका हृदय कृष्ण-प्रेम से इतना भरा है कि वे किसी भी रूप में ब्रज और कृष्ण के निकट रहना चाहते हैं। यह सच्ची भक्ति का अनुपम उदाहरण है, जो जाति और धर्म की सीमाओं से ऊपर है।

ब्रज-भूमि के प्रति अनुराग: रसखान को केवल कृष्ण ही नहीं, बल्कि कृष्ण से जुड़ी हर वस्तु — गोवर्धन का पत्थर, कदम्ब की डाल, लाठी, कम्बल, वन और कुंज — अत्यंत प्रिय है। ब्रज की धूल उनके लिए तीनों लोकों के राज्य और स्वर्ग के सुखों से भी बढ़कर है।

सांसारिक सुखों के प्रति विरक्ति: रसखान आठों सिद्धियों, नौ निधियों, राजपाट और स्वर्ग के सुख को भी कृष्ण-प्रेम के सामने तुच्छ मानते हैं। उनके लिए प्रेम और भक्ति ही सबसे बड़ा धन है।

कलापक्ष: मधुर ब्रजभाषा, सवैया छंद की लयात्मकता, अनुप्रास अलंकार (“लकुटी अरु कामरिया”) और कृष्ण के रूप-सौंदर्य का सजीव चित्रण इन सवैयों को अमर बना देते हैं। भाषा सरल, प्रवाहमयी और भावपूर्ण है।

🔑 कठिन शब्दार्थ
  • रसखानि — रस की खान; कवि का नाम (श्लेष)
  • गोधन — गायों का धन, गायें
  • करील के कुंजन — करील की झाड़ियों के बीच के स्थान
  • लकुटी — छोटी लाठी
  • कामरिया — कम्बल
  • तिहूँ पुर — तीनों लोक (स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल)
  • आठहु सिधि नौ निधि — आठ सिद्धियाँ और नौ निधियाँ
  • कानन — कान
  • मुरली — बाँसुरी
  • मोरपखा — मोर का पंख
  • गुंज — घुँघची (एक लाल-काला बीज, जिसकी माला बनती है)
  • पीताम्बर — पीले रंग का वस्त्र
📝 आदर्श उत्तर 1

प्र. पहले सवैये में रसखान ने अपनी कौन-कौन सी अभिलाषाएँ व्यक्त की हैं? इससे उनकी भक्ति-भावना पर क्या प्रकाश पड़ता है? (दीर्घ उत्तर, लगभग 120 शब्द)

  1. चारों रूपों (मनुष्य, पशु, पत्थर, पक्षी) की इच्छाएँ क्रम से बताइए।
  2. प्रत्येक को कृष्ण-लीला से जोड़िए।
  3. इससे प्रकट होने वाली अनन्य भक्ति को स्पष्ट कीजिए।
  4. निष्कर्ष में जाति-धर्म से ऊपर उठी भक्ति का उल्लेख कीजिए।
उत्तर: पहले सवैये में रसखान कहते हैं कि चाहे उन्हें किसी भी रूप में जन्म मिले, वे ब्रज और कृष्ण के निकट ही रहना चाहते हैं। मनुष्य बनें तो गोकुल के ग्वालों के बीच रहें; पशु बनें तो नंद की गायों के साथ चरें; पत्थर बनें तो उसी गोवर्धन पर्वत के बनें जिसे कृष्ण ने उँगली पर उठाया था; और पक्षी बनें तो उसी कदम्ब की डाल पर बसेरा करें जिस पर बैठकर कृष्ण बाँसुरी बजाते थे। इन अभिलाषाओं से रसखान की अनन्य और निश्छल कृष्ण-भक्ति प्रकट होती है। एक मुसलमान होकर भी उनका हृदय कृष्ण-प्रेम से भरा है — यह सिद्ध करता है कि सच्ची भक्ति जाति और धर्म की सीमाओं से ऊपर होती है।
📝 आदर्श उत्तर 2

प्र. चौथे सवैये में गोपी कृष्ण की मुरली अपने होठों पर क्यों नहीं रखना चाहती? (लगभग 100 शब्द)

उत्तर: चौथे सवैये में गोपी कृष्ण का रूप धारण करना चाहती है — वह सिर पर मोरपंख, गले में गुंजों की माला और शरीर पर पीताम्बर धारण कर ग्वालों के साथ घूमना चाहती है, और इसके लिए अपना समस्त धन लुटाने को तैयार है। परन्तु वह कृष्ण की मुरली को अपने होठों पर कभी नहीं रखेगी। इसका कारण यह है कि मुरली कृष्ण को अत्यंत प्रिय है और वह सदा कृष्ण के होठों से लगी रहती है। गोपी को इसी बात से मुरली के प्रति ईर्ष्या है, क्योंकि वह कृष्ण के इतने निकट रहती है। यह भाव गोपी के अनन्य और अधिकारपूर्ण प्रेम को दर्शाता है।
🧠 याद रखने की तरकीब

पहले सवैये के चार रूप याद रखें — “मनुष्य → पशु → पत्थर → पक्षी” और उनके स्थान — ग्वाले, गायें, गोवर्धन, कदम्ब। चारों सवैयों का भाव एक पंक्ति में: “कृष्ण और ब्रज ही सब कुछ — स्वर्ग, राज, सिद्धि सब तुच्छ।”

🔥 झटपट तथ्य
कवि: रसखानमूल नाम: सैयद इब्राहीमधर्म: मुसलमानभक्ति: कृष्णग्रंथ: सुजान रसखानछंद: सवैयाभाषा: ब्रजभाव: अनन्य प्रेम
⚠️ अंक न गँवाएँ

ध्यान रहे — रसखान मुसलमान कवि थे, फिर भी अनन्य कृष्णभक्त थे; उत्तर में यह विशेषता अवश्य लिखें, क्योंकि यही उनकी भक्ति को अनुपम बनाती है। “रसखानि” शब्द में श्लेष है — यह कवि का नाम भी है और “रस की खान” भी। गोवर्धन को कृष्ण ने उँगली पर उठाया था (इंद्र के कोप से रक्षा हेतु) — इस प्रसंग को न भूलें।

🎯 महत्वपूर्ण प्रश्न (उत्तर सहित)

प्र.1 रसखान को कृष्ण की लाठी और कम्बल पर तीनों लोकों का राज्य न्योछावर करने में भी संकोच क्यों नहीं है?

उत्तर: रसखान कृष्ण के सहज, सरल ग्वाल-रूप पर पूरी तरह मुग्ध हैं। कृष्ण की छोटी-सी लाठी और कम्बल उनके लिए कृष्ण के सामीप्य और प्रेम के प्रतीक हैं। रसखान के लिए सांसारिक ऐश्वर्य, राजपाट और तीनों लोकों का राज्य कृष्ण-प्रेम के सामने तुच्छ है। उन्होंने आठों सिद्धियों और नौ निधियों के सुख को भी भुला दिया है। उनकी एकमात्र अभिलाषा है कि वे जीवन भर ब्रज के वन, बाग और कुंजों को निहारते रहें, जहाँ कृष्ण ने लीलाएँ कीं। इसलिए कृष्ण से जुड़ी इन साधारण वस्तुओं पर वे तीनों लोकों का राज्य भी सहर्ष न्योछावर कर देते हैं।

प्र.2 तीसरे सवैये में एक ग्वालिन की दशा का वर्णन कीजिए। उसका मन कहाँ अटक जाता है?

उत्तर: तीसरे सवैये में एक ग्वालिन कृष्ण के बाँसुरी बजाते रूप को देखकर मुग्ध हो जाती है। कृष्ण अपने कानों पर उँगली रखकर, सुंदर वस्त्र सँभालते हुए मुरली बजाते हैं, तो उनकी छवि अत्यंत मनोहर लगती है। ग्वालिन यह दृश्य देखकर दूसरी सखी से उसकी प्रशंसा किए बिना नहीं रहती। वह कहती है कि जब-जब उसकी आँखें कृष्ण के इस मनमोहक रूप पर पड़ती हैं, तब-तब उसका मन उन्हीं पर जाकर अटक जाता है और वहीं रुक जाता है। उसका मन कृष्ण के रूप-जाल में ऐसा फँस जाता है कि लौटना ही नहीं चाहता। यह कृष्ण के रूप-सौंदर्य और गोपी के गहरे अनुराग को दर्शाता है।

प्र.3 इन सवैयों के आधार पर सिद्ध कीजिए कि रसखान की भक्ति जाति और धर्म की सीमाओं से ऊपर थी।

उत्तर: रसखान का वास्तविक नाम सैयद इब्राहीम था और वे जाति से मुसलमान थे। फिर भी उनका हृदय श्रीकृष्ण के प्रेम में पूरी तरह डूबा हुआ था। वे किसी भी रूप — मनुष्य, पशु, पत्थर या पक्षी — में ब्रज और कृष्ण के निकट रहना चाहते हैं। उन्होंने स्वर्ग, राजपाट, आठों सिद्धियों और नौ निधियों के सुख को कृष्ण-प्रेम के सामने तुच्छ माना। उनके लिए ब्रज की धूल तीनों लोकों के राज्य से बढ़कर थी। यह सच्ची, निश्छल भक्ति इस बात का प्रमाण है कि प्रेम और भक्ति किसी जाति या धर्म की मोहताज नहीं होती; वह हृदय की पवित्रता पर निर्भर करती है। इसीलिए रसखान कृष्णभक्ति शाखा के अमर कवियों में गिने जाते हैं।

प्र.4 इन सवैयों की भाषा-शैली एवं काव्य-सौंदर्य की विशेषताएँ बताइए।

उत्तर: रसखान की भाषा अत्यंत मधुर, सरल और प्रवाहमयी ब्रजभाषा है, जो कृष्ण-प्रेम को व्यक्त करने में पूर्णतः सक्षम है। उन्होंने सवैया छंद का प्रयोग किया है, जिसकी लयात्मकता और संगीतात्मकता पाठक को मुग्ध कर देती है। “लकुटी अरु कामरिया” तथा “करील के कुंजन” जैसे प्रयोगों में अनुप्रास अलंकार की छटा है। “रसखानि” शब्द में श्लेष अलंकार है। कृष्ण के रूप-सौंदर्य और ब्रज-भूमि का सजीव, चित्रात्मक वर्णन इन सवैयों की विशेषता है। संक्षेप में, रसखान की भाषा-शैली में माधुर्य, भक्ति-भावना और चित्रात्मकता का अद्भुत संगम मिलता है।

✅ झटपट दोहराव
  • ✅ रसखान मुसलमान होते हुए भी अनन्य कृष्णभक्त थे।
  • ✅ ये सवैये “सुजान रसखान” से लिए गए हैं; भाषा — ब्रज।
  • ✅ पहला सवैया — किसी भी रूप में ब्रज-कृष्ण के निकट रहने की चाह।
  • ✅ दूसरा — कृष्ण की लाठी-कम्बल पर तीनों लोक न्योछावर।
  • ✅ तीसरा — मुरली बजाते कृष्ण के रूप पर ग्वालिन मुग्ध।
  • ✅ चौथा — गोपी कृष्ण-रूप तो चाहती है, पर मुरली से ईर्ष्या करती है।
  • ✅ मुख्य भाव — कृष्ण-प्रेम सब सांसारिक व स्वर्गिक सुखों से बड़ा।
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