मीरा के पद

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CLASS VII Hindi ~5 अंक Ch 10 of 10
मीरा के पद

Class 7 · Hindi · NCERT chapter notes · Akanksha Classes

एक नज़र में
  • कवयित्री: मीराबाई — भक्तिकाल की प्रसिद्ध कृष्ण-भक्त संत-कवयित्री, राजस्थान के मेड़ता की राजकुमारी।
  • विधा: पद (भक्ति-गीत) — कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम और समर्पण से भरे भजन।
  • आराध्य: भगवान श्रीकृष्ण — जिन्हें मीरा “गिरधर गोपाल” कहकर पुकारती हैं।
  • केंद्रीय विषय: कृष्ण के प्रति अनन्य भक्ति, प्रेम, समर्पण और सांसारिक मोह से विरक्ति।
  • भाव: मीरा स्वयं को कृष्ण की दासी मानती हैं; उनका सारा जीवन कृष्ण-भक्ति को समर्पित है।
  • भाषा: राजस्थानी-ब्रज मिश्रित सरल, मधुर एवं भावपूर्ण लोकभाषा।
  • परीक्षा भार: ~5 अंक — भावार्थ, शब्दार्थ, काव्य-सौंदर्य एवं भक्ति-भाव पर प्रश्न।
  • पाठ्यपुस्तक: NCERT मल्हार, कक्षा 7 (नई NEP 2025-26 पुस्तक)।
विस्तृत नोट्स

1. कवयित्री परिचय — मीराबाई

मीराबाई भक्तिकाल की सबसे प्रसिद्ध कृष्ण-भक्त संत-कवयित्री मानी जाती हैं। उनका जन्म राजस्थान के मेड़ता के पास एक राजपूत राजघराने में हुआ था (लगभग सोलहवीं शताब्दी)। बचपन से ही उनके हृदय में भगवान श्रीकृष्ण के प्रति गहरा प्रेम था। कहा जाता है कि बालपन में ही उन्होंने कृष्ण को अपना पति मान लिया था।

  • आराध्य: भगवान श्रीकृष्ण, जिन्हें वे “गिरधर गोपाल” और “गिरधर नागर” कहकर पुकारती हैं।
  • रचनाएँ: मीरा के असंख्य पद (भजन) आज भी जन-जन में गाए जाते हैं।
  • भाषा: सरल राजस्थानी-ब्रज मिश्रित लोकभाषा, जो सीधे हृदय को छू जाती है।
  • विशेषता: उनके पदों में कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम, समर्पण, विरह और भक्ति का भाव कूट-कूटकर भरा है।

मीरा ने अपना सारा राजसी सुख त्याग दिया और कृष्ण की भक्ति में लीन हो गईं। उनका जीवन भक्ति, त्याग और अटूट प्रेम का अद्भुत उदाहरण है। उन्होंने समाज की रूढ़ियों और बाधाओं की परवाह न करते हुए सच्ची भक्ति का मार्ग अपनाया।

2. पद — विधा का परिचय

पद एक छोटी भक्ति-रचना (गीत/भजन) है, जिसे संगीत के साथ गाया जाता है। भक्तिकाल में संतों और भक्तों ने अपने आराध्य के प्रति प्रेम और समर्पण व्यक्त करने के लिए पदों की रचना की।

मीरा के पद मुख्यतः कृष्ण-भक्ति से भरे हैं। इनमें वे कभी कृष्ण से मिलने की उत्कंठा प्रकट करती हैं, कभी विरह में व्याकुल होती हैं, और कभी स्वयं को कृष्ण की दासी कहकर पूर्ण समर्पण व्यक्त करती हैं। उनके पद इतने सरल और भावपूर्ण हैं कि सुनने वाले का मन भी भक्ति-भाव से भर जाता है।

3. प्रथम पद — अनन्य भक्ति और समर्पण

भाव: इस पद में मीरा अपने आराध्य गिरधर गोपाल (श्रीकृष्ण) के प्रति अपना अनन्य प्रेम और पूर्ण समर्पण व्यक्त करती हैं। वे कहती हैं कि कृष्ण ही उनके एकमात्र स्वामी और सर्वस्व हैं, उनके अतिरिक्त वे और किसी को नहीं चाहतीं।

केंद्रीय भाव: “मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई” — मीरा का सब कुछ केवल कृष्ण हैं; उन्हीं को उन्होंने अपना सर्वस्व मान लिया है।

विस्तृत भावार्थ: मीरा कहती हैं कि उनके लिए संसार में केवल गिरधर गोपाल (कृष्ण) ही सब कुछ हैं। वे सांसारिक संबंधों, धन-संपत्ति और राजसी सुख को त्यागकर पूरी तरह कृष्ण की भक्ति में लीन हो गई हैं। उन्होंने लोक-लाज और समाज की आलोचना की परवाह नहीं की। उनकी भक्ति निष्काम (बिना किसी स्वार्थ के) है — वे केवल प्रेमवश ही कृष्ण की आराधना करती हैं। यह पद सच्ची, निःस्वार्थ और अटूट भक्ति का सुंदर उदाहरण है।

भाव-विस्तार

मीरा का प्रेम सांसारिक प्रेम से ऊपर एक आध्यात्मिक प्रेम है। जैसे कोई व्यक्ति अपने सबसे प्रिय को अपना सर्वस्व मान लेता है, वैसे ही मीरा ने कृष्ण को अपना तन-मन-धन सब कुछ अर्पित कर दिया।

4. द्वितीय पद — दर्शन की उत्कंठा एवं दासी-भाव

भाव: इस पद में मीरा भगवान कृष्ण के दर्शन की तीव्र उत्कंठा व्यक्त करती हैं और स्वयं को उनकी दासी (सेविका) कहकर पूर्ण समर्पण प्रकट करती हैं। वे चाहती हैं कि कृष्ण उन्हें अपनी सेवा में स्वीकार कर लें।

केंद्रीय भाव: मीरा कृष्ण की चाकरी (सेवा) करना चाहती हैं ताकि सदा उनके समीप रहकर उनके दर्शन कर सकें। दासी बनकर सेवा करना ही उनके लिए सबसे बड़ा सुख है।

विस्तृत भावार्थ: मीरा कहती हैं कि वे कृष्ण की दासी बनकर रहना चाहती हैं। वे उनके बगीचे लगाएँगी, उन्हें निहारेंगी और उनके नाम का स्मरण करती रहेंगी। दासी बनने का अर्थ है — पूर्ण विनम्रता और समर्पण के साथ अपने प्रभु की सेवा करना। मीरा को कोई ऊँचा पद या राजसी सुख नहीं चाहिए; उन्हें तो केवल कृष्ण की निकटता और उनके दर्शन का सुख चाहिए। उनकी यह दीनता और समर्पण ही उनकी भक्ति की पराकाष्ठा है।

भाव-विस्तार

दासी-भाव भक्ति की सर्वोच्च अवस्था मानी जाती है, जिसमें भक्त अपने अहंकार को पूरी तरह त्याग देता है और केवल प्रभु की सेवा में आनंद पाता है। मीरा का यही दीन-समर्पण उन्हें महान भक्त बनाता है।

5. भक्ति-भाव और मीरा की विशेषताएँ

  • अनन्य भक्ति: मीरा केवल कृष्ण की भक्त हैं; उनके लिए कृष्ण ही सब कुछ हैं।
  • निष्काम प्रेम: उनकी भक्ति में कोई स्वार्थ या इच्छा नहीं, केवल शुद्ध प्रेम है।
  • त्याग: उन्होंने राजसी सुख, धन और सांसारिक संबंधों का त्याग कर दिया।
  • दीनता और समर्पण: वे स्वयं को कृष्ण की दासी मानती हैं — पूर्ण विनम्रता का भाव।
  • निर्भीकता: उन्होंने लोक-लाज और समाज की आलोचना की परवाह किए बिना भक्ति-मार्ग अपनाया।
  • विरह और मिलन: उनके पदों में कृष्ण से मिलने की उत्कंठा और विरह की वेदना दोनों मिलती हैं।

6. काव्य-सौंदर्य

  • भाषा: सरल, मधुर राजस्थानी-ब्रज मिश्रित लोकभाषा, जो सीधे हृदय को छू जाती है।
  • भाव-प्रवणता: पदों में प्रेम, समर्पण, विरह और भक्ति के भाव बहुत गहराई से व्यक्त हुए हैं।
  • संगीतात्मकता (गेयता): मीरा के पद लयबद्ध हैं, इसलिए आज भी भजन के रूप में गाए जाते हैं।
  • आत्मीयता: मीरा कृष्ण से सीधे, अपने प्रिय की तरह बात करती हैं — इससे एक मधुर आत्मीय भाव उत्पन्न होता है।
  • रस: मुख्य रूप से भक्ति रस (और शांत रस); ईश्वर के प्रति प्रेम और समर्पण।
  • अलंकार: अनुप्रास, पुनरुक्ति और संबोधन का स्वाभाविक प्रयोग।

7. कठिन शब्द और उनके अर्थ

शब्द अर्थ
गिरधर गोपालगोवर्धन पर्वत उठाने वाले श्रीकृष्ण
पदभक्ति-गीत / भजन
अनन्यजिसके समान दूसरा कोई न हो; एकमात्र
भक्तिईश्वर के प्रति प्रेम और श्रद्धा
समर्पणस्वयं को पूरी तरह अर्पित कर देना
दासी / चाकरीसेविका / सेवा करना
विरहप्रिय से बिछड़ने की पीड़ा
निष्कामबिना किसी स्वार्थ या इच्छा के
लोक-लाजसमाज में बदनामी का डर
उत्कंठातीव्र इच्छा / उत्सुकता
आराध्यजिसकी आराधना/पूजा की जाए
विरक्तिसांसारिक मोह से दूर हट जाना

8. पाठ का मूल संदेश

मीरा के पद हमें सच्ची भक्ति, प्रेम, समर्पण और त्याग का संदेश देते हैं। मीरा का जीवन यह सिखाता है कि सच्चा प्रेम और भक्ति निःस्वार्थ होती है; इसमें कोई स्वार्थ या कामना नहीं होती। मीरा ने राजसी सुख त्यागकर, समाज की परवाह किए बिना, अपने आराध्य कृष्ण की भक्ति को ही अपना जीवन-लक्ष्य बना लिया। उनके पद हमें यह भी सिखाते हैं कि लक्ष्य के प्रति पूर्ण समर्पण, दृढ़ निष्ठा और विनम्रता से ही जीवन में कुछ बड़ा प्राप्त किया जा सकता है। यही कारण है कि मीरा के पद सैकड़ों वर्ष बीत जाने पर भी आज जन-जन के हृदय में बसे हुए हैं।

अभ्यास प्रश्न (बहुविकल्पीय)
1. मीराबाई किस काल की कवयित्री हैं?
  1. आदिकाल
  2. भक्तिकाल
  3. रीतिकाल
  4. आधुनिक काल
उत्तर: (B) मीराबाई भक्तिकाल की प्रसिद्ध संत-कवयित्री हैं।
2. मीराबाई किसकी भक्त थीं?
  1. भगवान राम
  2. भगवान श्रीकृष्ण
  3. भगवान शिव
  4. देवी दुर्गा
उत्तर: (B) मीराबाई भगवान श्रीकृष्ण की अनन्य भक्त थीं।
3. मीरा कृष्ण को किस नाम से पुकारती हैं?
  1. गिरधर गोपाल
  2. रघुनंदन
  3. नीलकंठ
  4. गणपति
उत्तर: (A) मीरा कृष्ण को “गिरधर गोपाल” कहकर पुकारती हैं।
4. “पद” किस प्रकार की रचना है?
  1. कहानी
  2. भक्ति-गीत / भजन
  3. निबंध
  4. नाटक
उत्तर: (B) पद एक भक्ति-गीत या भजन है जिसे संगीत के साथ गाया जाता है।
5. मीराबाई का जन्म किस राज्य में हुआ था?
  1. गुजरात
  2. राजस्थान
  3. पंजाब
  4. बंगाल
उत्तर: (B) मीराबाई का जन्म राजस्थान (मेड़ता के पास) में हुआ था।
6. “मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई” का भाव है —
  1. मीरा को धन प्रिय है
  2. मीरा के लिए कृष्ण ही सब कुछ हैं
  3. मीरा को राज्य चाहिए
  4. मीरा किसी को नहीं मानती
उत्तर: (B) मीरा के लिए केवल कृष्ण ही सर्वस्व हैं, और कोई नहीं।
7. मीरा स्वयं को कृष्ण की क्या मानती हैं?
  1. रानी
  2. दासी (सेविका)
  3. माता
  4. मित्र
उत्तर: (B) मीरा स्वयं को कृष्ण की दासी मानती हैं।
8. मीरा की भक्ति कैसी है?
  1. स्वार्थपूर्ण
  2. निष्काम (निःस्वार्थ)
  3. दिखावटी
  4. अनिच्छुक
उत्तर: (B) मीरा की भक्ति निष्काम अर्थात निःस्वार्थ है।
9. मीरा ने भक्ति के लिए क्या त्याग किया?
  1. कुछ नहीं
  2. राजसी सुख और सांसारिक संबंध
  3. केवल भोजन
  4. केवल आभूषण
उत्तर: (B) मीरा ने राजसी सुख और सांसारिक संबंधों का त्याग कर दिया।
10. मीरा के पदों की भाषा कैसी है?
  1. कठिन संस्कृत
  2. सरल राजस्थानी-ब्रज मिश्रित लोकभाषा
  3. अंग्रेज़ी
  4. फ़ारसी
उत्तर: (B) सरल राजस्थानी-ब्रज मिश्रित मधुर लोकभाषा।
11. “विरह” शब्द का अर्थ है —
  1. मिलन का सुख
  2. प्रिय से बिछड़ने की पीड़ा
  3. क्रोध
  4. भय
उत्तर: (B) विरह का अर्थ है प्रिय से बिछड़ने की पीड़ा।
12. मीरा के पदों में प्रमुख रस कौन-सा है?
  1. वीर रस
  2. भक्ति रस
  3. हास्य रस
  4. रौद्र रस
उत्तर: (B) मीरा के पदों में भक्ति रस प्रमुख है।
13. मीरा के पद आज भी किस रूप में गाए जाते हैं?
  1. नाटक
  2. भजन
  3. लोरी
  4. देशभक्ति गीत
उत्तर: (B) मीरा के पद आज भी भजन के रूप में गाए जाते हैं।
14. मीरा ने किसकी परवाह नहीं की?
  1. भक्ति की
  2. लोक-लाज और समाज की आलोचना की
  3. कृष्ण की
  4. सत्य की
उत्तर: (B) मीरा ने लोक-लाज और समाज की आलोचना की परवाह नहीं की।
15. मीरा के पद हमें क्या संदेश देते हैं?
  1. धन ही सब कुछ है
  2. सच्ची भक्ति, प्रेम, समर्पण और त्याग
  3. केवल राज करना
  4. किसी पर भरोसा न करना
उत्तर: (B) सच्ची भक्ति, निःस्वार्थ प्रेम, समर्पण और त्याग का संदेश।
महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. मीराबाई का संक्षिप्त परिचय दीजिए। (4 अंक)
उत्तर: मीराबाई भक्तिकाल की सबसे प्रसिद्ध कृष्ण-भक्त संत-कवयित्री मानी जाती हैं। उनका जन्म राजस्थान के मेड़ता के पास एक राजपूत राजघराने में हुआ था। बचपन से ही उनके हृदय में भगवान श्रीकृष्ण के प्रति गहरा प्रेम था और उन्होंने कृष्ण को ही अपना सर्वस्व मान लिया। उन्होंने अपने राजसी सुख त्यागकर तथा समाज की रूढ़ियों की परवाह न करते हुए कृष्ण-भक्ति का मार्ग अपनाया। उनके असंख्य पद आज भी भजन के रूप में जन-जन में गाए जाते हैं। उनका जीवन भक्ति, त्याग और अटूट प्रेम का अद्भुत उदाहरण है।
Q2. “मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई” पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए। (4 अंक)
उत्तर: इस पंक्ति में मीरा अपना अनन्य प्रेम और पूर्ण समर्पण व्यक्त करती हैं। वे कहती हैं कि उनके लिए संसार में केवल गिरधर गोपाल (श्रीकृष्ण) ही सब कुछ हैं, उनके अतिरिक्त वे और किसी को नहीं चाहतीं। उन्होंने सांसारिक संबंधों, धन-संपत्ति और राजसी सुख को त्यागकर अपना तन-मन-धन सब कुछ कृष्ण को अर्पित कर दिया है। यह पंक्ति मीरा की सच्ची, निःस्वार्थ और अटूट भक्ति का सुंदर परिचय देती है।
Q3. मीरा स्वयं को कृष्ण की दासी क्यों कहती हैं? (3 अंक)
उत्तर: मीरा स्वयं को कृष्ण की दासी इसलिए कहती हैं क्योंकि वे पूर्ण विनम्रता और समर्पण के साथ अपने प्रभु की सेवा करना चाहती हैं। दासी बनने का अर्थ है — अपने अहंकार को पूरी तरह त्यागकर केवल प्रभु की सेवा में आनंद पाना। मीरा को कोई ऊँचा पद या राजसी सुख नहीं चाहिए; उन्हें तो केवल कृष्ण की निकटता और उनके दर्शन का सुख चाहिए। यही दीनता और समर्पण उनकी भक्ति की पराकाष्ठा है।
Q4. मीरा की भक्ति की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए। (4 अंक)
उत्तर: मीरा की भक्ति की प्रमुख विशेषताएँ हैं — (i) अनन्य भक्ति: उनके लिए केवल कृष्ण ही सब कुछ हैं; (ii) निष्काम प्रेम: उनकी भक्ति में कोई स्वार्थ या कामना नहीं, केवल शुद्ध प्रेम है; (iii) त्याग: उन्होंने राजसी सुख और सांसारिक संबंधों का त्याग कर दिया; (iv) दीनता और समर्पण: वे स्वयं को कृष्ण की दासी मानती हैं; और (v) निर्भीकता: उन्होंने लोक-लाज और समाज की आलोचना की परवाह किए बिना भक्ति-मार्ग अपनाया। ये गुण उन्हें एक महान भक्त बनाते हैं।
Q5. मीरा के पदों के काव्य-सौंदर्य की विशेषताएँ लिखिए। (3 अंक)
उत्तर: मीरा के पदों की भाषा सरल, मधुर राजस्थानी-ब्रज मिश्रित लोकभाषा है, जो सीधे हृदय को छू जाती है। इनमें प्रेम, समर्पण, विरह और भक्ति के भाव बहुत गहराई से व्यक्त हुए हैं। पद लयबद्ध और गेय हैं, इसलिए आज भी भजन के रूप में गाए जाते हैं। मीरा कृष्ण से अपने प्रिय की तरह आत्मीयता से बात करती हैं, जिससे एक मधुर भाव उत्पन्न होता है। इनमें भक्ति रस प्रमुख है और अनुप्रास तथा पुनरुक्ति अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग हुआ है।
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