एक पुरानी फोटो में प्रेमचंद के पैर का फटा जूता और होंठों पर हल्की व्यंग्य-भरी मुसकान — इसी छोटे-से दृश्य से हरिशंकर परसाई एक बड़ी बात कह जाते हैं: जो लेखक सच्चाई और गरीबी के बीच रहकर भी आदर्शों से समझौता नहीं करता, उसके फटे जूते उसकी हार नहीं, बल्कि उसकी ईमानदारी और संघर्ष की पहचान बन जाते हैं।
✍️ लेखक
हरिशंकर परसाई (1922–1995), हिंदी के सर्वश्रेष्ठ व्यंग्यकार। जन्म: जमानी, होशंगाबाद (म.प्र.)।
📖 विधा
व्यंग्य-निबंध (ललित निबंध)। एक फोटो को आधार बनाकर लिखा गया चिंतनपरक लेख।
🎯 केंद्र-बिंदु
प्रेमचंद का फटा जूता और उनकी मुसकान — गरीबी, आदर्श और समाज की पोल।
🌟 संदेश
दिखावे की दुनिया में सच्चाई और आदर्श पर डटे रहना ही असली बड़प्पन है।
फोटो से शुरुआत
लेखक प्रेमचंद की एक पुरानी फोटो देखता है, जिसमें प्रेमचंद अपनी पत्नी के साथ बैठे हैं। वे मोटे खुरदरे कपड़े पहने हैं — धोती और कनटोप जैसी टोपी। पैरों में कैनवस के जूते हैं। लेखक की निगाह सबसे पहले प्रेमचंद के चेहरे पर नहीं, बल्कि उनके दाहिने पैर के जूते पर जाती है, जो ऊपर से फटा हुआ है और उसमें से अँगुली बाहर झाँक रही है। यही फटा जूता पूरे निबंध का बीज बन जाता है।
फटे जूते पर हैरानी
लेखक सोचता है — फोटो तो खिंचवाने के लिए आदमी अपने सबसे अच्छे कपड़े-जूते पहनता है, फिर प्रेमचंद ने फटा जूता पहनकर फोटो क्यों खिंचवाई? लेखक के अपने पास भी ऐसे फटे जूते हैं, पर वह उन्हें छिपा लेता है, फोटो में नहीं आने देता। प्रेमचंद ने न जूता छिपाया, न शर्म की। यह उनकी सादगी और बेबाकी को दिखाता है — उनके पास झूठा दिखावा करने का न समय था, न इच्छा।
तुलसीदास और दिखावे की दुनिया
लेखक कहता है कि लोग कितना दिखावा करते हैं। वह तुलसीदास की पंक्ति याद करता है — जिसमें कहा गया है कि सिर पर पगड़ी, पैर में जूता न होने पर भी आदमी ऊपरी ठाठ-बाट दिखाने में लगा रहता है। दुनिया दिखावे और झूठी शान पर चलती है, पर प्रेमचंद इस दिखावे से बिलकुल अलग, सच्चे और साधारण इंसान थे।
जूता और टोपी की तुलना
लेखक व्यंग्य करता है कि कुछ लोग टोपी (इज्जत, पगड़ी) बचाने के लिए जूता (पैर, सच्चाई, आधार) तक बेच देते हैं। पर प्रेमचंद उल्टे थे — उन्होंने जूता फटने दिया, पर अपनी टोपी यानी अपने आदर्श और स्वाभिमान को कभी नहीं बेचा। उन्होंने कभी किसी के सामने झुककर सुविधा नहीं माँगी।
अँगुली का इशारा
लेखक कल्पना करता है कि फटे जूते से बाहर निकली प्रेमचंद की अँगुली मानो किसी ओर इशारा कर रही है — किसी ऐसी चीज़ की ओर जिसे ठोकर मारते-मारते जूता घिस गया। लेखक पूछता है कि वह कौन-सी चीज़ है जिसे प्रेमचंद बार-बार ठोकर मारते रहे? उत्तर है — समाज की झूठी व्यवस्था, अन्याय, ढोंग, शोषण और पाखंड। प्रेमचंद जीवन भर इन्हीं से टकराते रहे और इसी टकराहट में उनका जूता फट गया।
प्रेमचंद की मुसकान
फोटो में प्रेमचंद के होंठों पर एक हल्की-सी मुसकान है। लेखक को यह मुसकान साधारण नहीं लगती। यह व्यंग्य-भरी मुसकान है — मानो प्रेमचंद उस सारी दुनिया पर हँस रहे हों जो दिखावे, ढोंग और स्वार्थ में डूबी है। यह मुसकान दुख की भी है और गहरे आत्मविश्वास की भी — जैसे वे कह रहे हों कि मेरा जूता भले फट गया, पर मेरा ईमान सलामत है।
लेखक की अपनी पीड़ा
निबंध के अंत में लेखक अपनी ओर मुड़ता है। वह कहता है कि मैं तुम्हारी (प्रेमचंद की) तरह नहीं हो सका। मैं भी समाज के पाखंड को देखता हूँ, पर उससे टकराने के बजाय बचकर निकल जाता हूँ, अपने फटे जूते छिपा लेता हूँ। प्रेमचंद ठोकरें खाते रहे, पर रास्ता बदला नहीं। यहाँ लेखक स्वयं पर और पूरे समाज पर तीखा व्यंग्य करता है, जो सच्चाई के रास्ते पर चलने का साहस नहीं रखता।
प्रेमचंद की पत्नी और चेहरा
लेखक को प्रेमचंद का चेहरा गंभीर और दृढ़ लगता है। पत्नी का चेहरा भी सरल और शांत है। पूरा दृश्य एक ऐसे जोड़े का है जो गरीबी में भी आत्म-सम्मान के साथ जी रहा है। लेखक के मन में प्रेमचंद के प्रति श्रद्धा और स्नेह दोनों उमड़ते हैं।
- दंतुरित नहीं — यहाँ: पाँव की अँगुली : फटे जूते से बाहर झाँकती अँगुली।
- कनटोप : कान ढकने वाली टोपी।
- व्यंग्य : किसी की कमी या समाज के दोष पर तीखा, चुभने वाला हास्य।
- पाखंड / ढोंग : दिखावा, झूठा रूप।
- आदर्श : ऊँचे मूल्य और सिद्धांत जिनसे समझौता न हो।
- ठोकर मारना : यहाँ प्रतीक — समाज के अन्याय व पाखंड से टकराना।
प्रेमचंद का फटा जूता उनके जीवन और व्यक्तित्व का प्रतीक कैसे बन जाता है? स्पष्ट कीजिए।
- फटा जूता सबसे पहले प्रेमचंद की गरीबी और सादगी को दिखाता है — उनके पास दिखावे का साधन ही नहीं था।
- फोटो में भी जूता न छिपाना उनकी बेबाकी और सच्चाई का प्रमाण है।
- जूता घिसना यह बताता है कि वे जीवन भर समाज के अन्याय और पाखंड से टकराते रहे।
- इस प्रकार फटा जूता हार नहीं, बल्कि उनके संघर्ष, आदर्श और ईमानदारी का प्रतीक बन जाता है।
‘तुम जिस पर चल रहे हो वह पथ नहीं, चट्टान है’ — लेखक के इस आशय से प्रेमचंद के व्यक्तित्व पर क्या प्रकाश पड़ता है?
- प्रेमचंद ने आसान, सुविधाजनक रास्ता नहीं चुना।
- उन्होंने सच्चाई और आदर्श का कठिन रास्ता अपनाया, जो काँटों और चट्टानों भरा था।
- इसी कठिन राह पर चलते-चलते उनका जूता घिस-फट गया।
- फिर भी उन्होंने रास्ता नहीं बदला — यही उनकी महानता है।
तीन प्रतीक याद रखो — जूता = संघर्ष, अँगुली का इशारा = समाज के पाखंड की ओर, मुसकान = व्यंग्य व आत्मविश्वास। पूरा निबंध इन्हीं तीन के इर्द-गिर्द घूमता है।
उत्तर में सिर्फ़ कहानी मत लिखो कि “जूता फटा था”। हर बिंदु को प्रतीक के रूप में समझाओ — जूता क्यों फटा (समाज से टकराव), मुसकान का अर्थ (व्यंग्य), और लेखक की अपनी आत्म-स्वीकृति। यही गहराई परीक्षक को चाहिए।
Q1. लेखक की दृष्टि सबसे पहले फोटो में किस ओर जाती है और इससे लेखक के मन में क्या भाव उठते हैं?
उत्तर: लेखक की दृष्टि सबसे पहले प्रेमचंद के चेहरे पर नहीं, बल्कि उनके दाहिने पैर के फटे जूते पर जाती है, जिसमें से अँगुली बाहर झाँक रही है। लेखक को आश्चर्य होता है कि फोटो खिंचवाते समय भी प्रेमचंद ने फटा जूता पहना और उसे छिपाया नहीं। इससे लेखक के मन में पहले हैरानी, फिर गहरी श्रद्धा का भाव उठता है — क्योंकि यह प्रेमचंद की सादगी, बेबाकी और दिखावे से दूरी को दिखाता है। लेखक स्वयं को छोटा अनुभव करता है, क्योंकि वह अपने फटे जूते छिपा लेता है, जबकि प्रेमचंद ने ऐसा नहीं किया।
Q2. प्रेमचंद की मुसकान को लेखक ‘व्यंग्य-भरी मुसकान’ क्यों कहता है?
उत्तर: प्रेमचंद की होंठों पर हल्की-सी मुसकान है, जो लेखक को साधारण नहीं लगती। लेखक के अनुसार यह मुसकान पूरी दिखावटी और पाखंडी दुनिया पर एक व्यंग्य है — मानो प्रेमचंद कह रहे हों कि “मेरा जूता भले फट गया, पर मेरा ईमान और आदर्श सलामत है, और मैं तुम्हारे झूठे ठाठ-बाट पर हँसता हूँ।” यह मुसकान एक ओर गरीबी और संघर्ष की पीड़ा को छिपाए है, तो दूसरी ओर गहरे आत्मविश्वास और निर्भीकता को प्रकट करती है। इसीलिए लेखक इसे साधारण मुसकान न मानकर व्यंग्य-भरी मुसकान कहता है।
Q3. “मेरे पास भी फटे जूते हैं, पर मैं उन्हें छिपा लेता हूँ” — इस कथन के द्वारा लेखक किस पर व्यंग्य करता है?
उत्तर: इस कथन से लेखक स्वयं पर और पूरे समाज पर व्यंग्य करता है। आज के अधिकांश लोग, और स्वयं लेखक भी, समाज के पाखंड और अन्याय को देखते तो हैं, पर उससे सीधे टकराने का साहस नहीं रखते। वे अपनी कमियों और सच्चाई को छिपाकर दिखावे की दुनिया में ढल जाते हैं। इसके विपरीत प्रेमचंद ने न अपने फटे जूते छिपाए, न ही समाज से समझौता किया। इस प्रकार यह कथन कायरता और दिखावे की प्रवृत्ति पर तीखा व्यंग्य है और प्रेमचंद की निर्भीकता के सामने आत्म-स्वीकृति भी है।
Q4. फटे जूते से झाँकती अँगुली किस ओर इशारा करती है? इस प्रतीक का अर्थ समझाइए।
उत्तर: लेखक कल्पना करता है कि फटे जूते से बाहर निकली प्रेमचंद की अँगुली किसी ओर इशारा कर रही है। यह अँगुली समाज की उन कुरीतियों, अन्याय, ढोंग, शोषण और पाखंड की ओर संकेत करती है, जिनसे प्रेमचंद जीवन भर टकराते रहे। प्रतीक रूप में, प्रेमचंद इन्हीं बुराइयों को बार-बार ‘ठोकर’ मारते रहे, जिससे उनका जूता घिसकर फट गया। इस प्रकार यह अँगुली प्रेमचंद के संघर्ष की दिशा बताती है — वे केवल अपने लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के सच और न्याय के लिए लड़ते रहे। यही उनका सच्चा साहित्यकार-धर्म था।
- ✅ लेखक हरिशंकर परसाई ने प्रेमचंद की एक फोटो को आधार बनाकर व्यंग्य-निबंध लिखा।
- ✅ फोटो में प्रेमचंद का फटा जूता और होंठों पर हल्की व्यंग्य-भरी मुसकान है।
- ✅ फटा जूता गरीबी की नहीं, बल्कि आदर्श, सच्चाई और संघर्ष की निशानी है।
- ✅ अँगुली का इशारा समाज के पाखंड व अन्याय की ओर है, जिनसे प्रेमचंद टकराते रहे।
- ✅ लेखक स्वयं पर व्यंग्य करता है कि वह प्रेमचंद की तरह निर्भीक नहीं हो सका।
- ✅ संदेश: दिखावे से दूर रहकर आदर्श और सच्चाई पर डटे रहना ही असली बड़प्पन है।
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