- विधा: यह एक कविता (देशभक्ति का आह्वान-गीत) है, गद्य नहीं।
- कवि: गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही' (1883–1972), जन्म — उन्नाव (उत्तर प्रदेश)। दूसरा उपनाम 'त्रिशूल'।
- मुख्य भाव: देश के प्रति प्रेम (देश-प्रेम)। जिस हृदय में स्वदेश का प्यार नहीं, वह पत्थर के समान है।
- केंद्रीय पंक्ति: "वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।" — यह पूरी कविता में बार-बार दोहराई जाती है (आवृत्ति)।
- संदेश: साहस, उत्साह, संवेदना और देश-सेवा का भाव ही जीवन को सार्थक बनाता है।
- परीक्षा महत्त्व: लगभग ~5 अंक — भावार्थ, कठिन शब्द, बहुविकल्पीय और लघु/दीर्घ उत्तरीय प्रश्न।
1. कवि परिचय
इस 'स्वदेश' कविता के रचयिता गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही' हैं। वे हिंदी के उन कवियों में से हैं जिन्होंने ब्रजभाषा में कविता लिखना प्रारंभ किया और बाद में खड़ी बोली के श्रेष्ठ कवियों में अपना स्थान बनाया। उनका जन्म सन् 1883 में उत्तर प्रदेश के उन्नाव जनपद में हुआ और निधन सन् 1972 में हुआ।
उन्होंने स्वयं कहा था — "सरकारी नौकरी के कारण मुझे 'सनेही' के अतिरिक्त दूसरा उपनाम 'त्रिशूल' रखना पड़ा।" अर्थात उनके दो उपनाम (तखल्लुस) थे — 'सनेही' और 'त्रिशूल'।
राष्ट्र-प्रेम की कविताओं के साथ-साथ उन्होंने किसान, मज़दूर, सामाजिक कुरीतियों आदि विषयों पर भी प्रभावकारी कविताएँ लिखीं। त्रिशूल तरंग, राष्ट्रीय मंत्र, कृषक क्रंदन उनकी उल्लेखनीय रचनाओं में से हैं। 'स्वदेश' कविता स्वतंत्रता-आंदोलन के समय की रचना है, जो देशवासियों को देश-प्रेम के लिए प्रेरित और उत्साहित करती है।
2. कविता का स्वरूप व पृष्ठभूमि
'स्वदेश' एक आह्वान-गीत है, अर्थात ऐसा गीत जो लोगों को किसी कार्य के लिए पुकारता और उत्साहित करता है। यह कविता पाठक के मन में देश-प्रेम, साहस और कर्तव्य-बोध जगाती है।
कविता का प्रारंभ और अंत एक ही पंक्ति से होता है — "वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।" यह पंक्ति बीच में भी कई बार आती है। किसी पंक्ति के इस प्रकार बार-बार दोहराए जाने को आवृत्ति कहते हैं; इससे कविता का मुख्य भाव गहराई से मन में बैठ जाता है और गीत में लयात्मकता (संगीतमयता) आ जाती है।
3. कविता (मूल पंक्तियाँ)
वह हृदय नहीं है पत्थर है,
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।
जो जीवित जोश जगा न सका,
उस जीवन में कुछ सार नहीं॥
जो चल न सका संसार-संग,
उसका होता संसार नहीं॥
जिसने साहस को छोड़ दिया,
वह पहुँच सकेगा पार नहीं॥
जिससे न जाति-उद्धार हुआ,
होगा उसका उद्धार नहीं॥
जो भरा नहीं है भावों से,
बहती जिसमें रस-धार नहीं।
वह हृदय नहीं है पत्थर है,
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं॥
जिसकी मिट्टी में उगे बढ़े,
पाया जिसमें दाना-पानी।
हैं माता-पिता बंधु जिसमें,
हम हैं जिसके राजा-रानी॥
जिसने कि खजाने खोले हैं,
नव रत्न दिये हैं लासानी।
जिस पर ज्ञानी भी मरते हैं,
जिस पर है दुनिया दीवानी॥
उस पर है नहीं पसीजा जो,
क्या है वह भू का भार नहीं।
निश्चित है निस्संशय निश्चित,
है जान एक दिन जाने को।
है काल-दीप जलता हरदम,
जल जाना है परवानों को॥
सब कुछ है अपने हाथों में,
क्या तोप नहीं तलवार नहीं।
वह हृदय नहीं है, पत्थर है,
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं॥
— गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही'
4. भावार्थ (पद्यांश-वार व्याख्या)
पद्यांश 1 — "वह हृदय नहीं है पत्थर है... कुछ सार नहीं।" कवि कहते हैं कि जिस मनुष्य के हृदय में अपने देश के प्रति प्यार नहीं है, वह हृदय नहीं, बल्कि पत्थर है — कठोर और भावना-रहित। यहाँ 'पत्थर' शब्द संवेदनहीनता और कठोरता का प्रतीक है। जो व्यक्ति अपने भीतर जीवंत जोश और उत्साह नहीं जगा सका, उसके जीवन में कोई सार (सार्थकता, मूल्य) नहीं है।
पद्यांश 2 — "जो चल न सका संसार-संग... पार नहीं।" जो व्यक्ति समाज के साथ (संसार-संग) मिलकर नहीं चल पाता, संसार भी उसका अपना नहीं हो पाता। और जिसने साहस छोड़ दिया, वह अपने लक्ष्य के 'पार' अर्थात मंज़िल तक नहीं पहुँच सकता। तात्पर्य — सफलता के लिए सहयोग और साहस दोनों आवश्यक हैं।
पद्यांश 3 — "जिससे न जाति-उद्धार हुआ... रस-धार नहीं।" जिस व्यक्ति से अपने समाज/राष्ट्र (जाति) का उद्धार नहीं हुआ, उसका स्वयं का भी उद्धार नहीं हो सकता। और जिसका हृदय भावनाओं से भरा नहीं है, जिसमें प्रेम और संवेदना की रस-धार (कोमल भाव की धारा) नहीं बहती — वह हृदय पत्थर ही है।
पद्यांश 4 — "जिसकी मिट्टी में उगे बढ़े... राजा-रानी।" कवि देश की महत्ता बताते हैं — यह वही भूमि है जिसकी मिट्टी में हम पले-बढ़े, जिसने हमें दाना-पानी (अन्न और जल) दिया। इस देश में हमारे माता-पिता और बंधु-बांधव हैं, और इसी देश के हम 'राजा-रानी' अर्थात स्वामी (समस्त नागरिक) हैं।
पद्यांश 5 — "जिसने कि खजाने खोले हैं... दुनिया दीवानी।" इस देश ने ज्ञान और संपदा के खजाने खोले हैं, अनेक बहुमूल्य नव रत्न (श्रेष्ठ विद्वान, वीर, कलाकार) दिए हैं जो लासानी (अनुपम, बेजोड़) हैं। इस देश के ज्ञान पर बड़े-बड़े ज्ञानी मर-मिटते हैं और सारी दुनिया दीवानी है।
पद्यांश 6 — "उस पर है नहीं पसीजा जो... भार नहीं।" ऐसे महान देश के लिए जिसका हृदय नहीं पसीजता (द्रवित नहीं होता), क्या वह व्यक्ति भू (पृथ्वी) का भार नहीं है? अर्थात ऐसा संवेदनहीन व्यक्ति धरती पर बोझ-मात्र है।
पद्यांश 7 — "निश्चित है निस्संशय निश्चित... परवानों को।" कवि कहते हैं — यह पूर्णतः निश्चित है कि एक दिन सबको मरना है (जान जाने को है)। संसार में मृत्यु रूपी काल-दीप हर समय जलता रहता है और परवानों (पतंगों) को उसमें जलना ही है। तात्पर्य — जब मृत्यु निश्चित है, तो क्यों न देश के लिए साहसपूर्वक जिया-मरा जाए।
पद्यांश 8 — "सब कुछ है अपने हाथों में... पत्थर है।" देश की प्रगति और रक्षा सब कुछ हमारे ही हाथों में है। क्या हमारे पास तोप-तलवार (साहस और इच्छाशक्ति रूपी अस्त्र) नहीं हैं? इसलिए जो हृदय देश-प्रेम से भरा नहीं, वह पत्थर ही है — कविता इसी मूल भाव पर समाप्त होती है।
5. मुख्य भाव / केंद्रीय संदेश
- देश-प्रेम सर्वोपरि है। जिस हृदय में स्वदेश का प्यार नहीं, वह संवेदनाहीन (पत्थर) है।
- साहस और उत्साह के बिना जीवन व्यर्थ है; साहस छोड़ने वाला लक्ष्य तक नहीं पहुँचता।
- सहयोग ज़रूरी है — जो समाज के साथ चलना नहीं जानता, संसार उसका नहीं होता।
- देश की प्रगति व रक्षा हमारे ही हाथों में है; तोप-तलवार जैसे साधन (इच्छाशक्ति) हमारे पास हैं।
- मृत्यु निश्चित है, इसलिए जीवन को देश-सेवा में लगाकर सार्थक बनाना चाहिए।
6. काव्य-शैली व सौंदर्य
- भाषा: सरल, ओजपूर्ण खड़ी बोली; भाव जगाने वाली।
- रस: मुख्यतः वीर रस के साथ देश-प्रेम (राष्ट्रीय भावना)।
- तुक (अनुप्रास/तुकांत): 'दाना-पानी / राजा-रानी', 'पत्थर / सार', 'भार / पार' जैसे शब्दों की अंतिम ध्वनि एक-सी है — इसे तुक मिलाना कहते हैं। तुक मिलने से कविता में लय और प्रवाह आता है।
- आवृत्ति: "वह हृदय नहीं है पत्थर है..." पंक्ति बार-बार आकर मुख्य भाव को सशक्त करती है।
- लयात्मकता: "है जान एक दिन जाने को", "है काल-दीप जलता हरदम" — यहाँ 'है' शब्द पहले आने से कविता में संगीतमयता आई है।
- प्रतीक/बिंब: 'पत्थर' = कठोरता; 'काल-दीप व परवाने' = मृत्यु का अटल सत्य; 'तोप-तलवार' = साहस व सामर्थ्य; 'नव रत्न' = देश की अमूल्य विभूतियाँ।
- योजक चिह्न (-): 'संसार-संग', 'दाना-पानी', 'माता-पिता', 'राजा-रानी', 'रस-धार', 'जाति-उद्धार', 'काल-दीप' में योजक चिह्न दो शब्दों को जोड़ता है।
7. कठिन शब्दों के अर्थ
- स्वदेश — अपना देश
- सार — सत्त्व, सार्थकता, मूल्य
- जोश — उत्साह, उमंग
- संसार-संग — संसार/समाज के साथ
- पार — मंज़िल, किनारा, लक्ष्य
- जाति-उद्धार — समाज/राष्ट्र का कल्याण
- उद्धार — मुक्ति, कल्याण
- रस-धार — कोमल भावों/प्रेम की धारा
- दाना-पानी — अन्न और जल
- बंधु — भाई, संबंधी, मित्र
- लासानी — अनुपम, बेजोड़, जिसका सानी (बराबरी) न हो
- नव रत्न — नौ श्रेष्ठ विभूतियाँ / अमूल्य व्यक्ति
- दीवानी — मुग्ध, आसक्त, पागल
- पसीजा — द्रवित हुआ, करुणा से भर गया
- भू — पृथ्वी, धरती
- निस्संशय — बिना किसी संदेह के, निश्चित रूप से
- काल-दीप — मृत्यु/समय रूपी दीपक
- परवाने — पतंगे (जो दीपक पर जल मरते हैं)
- हरदम — हर समय, सदा
8. समानार्थी शब्द (पाठ से)
- भू — धरा, पृथ्वी
- दीप — प्रदीप, दीपक
- हृदय — दिल, जी
- तलवार — असि, कृपाण
- दुनिया — जग, संसार
- पत्थर — पाहन, पाषाण
9. पाठ्यपुस्तक के प्रश्न — उत्तर (मेरी समझ से)
(क) उपयुक्त उत्तर:
- 1. "वह हृदय नहीं है पत्थर है" — हृदय के पत्थर होने का तात्पर्य है → संवेदनहीनता से तथा कठोरता से। (पत्थर भाव-रहित और कठोर होता है।)
- 2. कविता का मुख्य भाव → देश के प्रति प्रेम।
- 3. "हम हैं जिसके राजा-रानी" में 'हम' शब्द आया है → देश के समस्त नागरिकों के लिए (हम सब इस देश के स्वामी हैं)।
- 4. कविता के अनुसार पत्थर के समान हृदय वह है → जिसमें देश-प्रेम का भाव नहीं है (तथा जिसमें स्नेह/भाव नहीं है)।
मिलकर करें मिलान (स्तंभ 1 — स्तंभ 2):
- 1. "जिसने साहस को छोड़ दिया, वह पहुँच सकेगा पार नहीं।" → (3) जिसने किसी कार्य को करने का साहस छोड़ दिया हो वह किसी लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकता।
- 2. "जो जीवित जोश जगा न सका, उस जीवन में कुछ सार नहीं।" → (4) जो स्वयं के साथ ही दूसरों को भी प्रेरित और उत्साहित नहीं कर सकते उनका जीवन निष्फल और अर्थहीन है।
- 3. "जिस पर ज्ञानी भी मरते हैं, जिस पर है दुनिया दीवानी।" → (1) जिस देश की ज्ञान-संपदा से समूचा विश्व प्रभावित है।
- 4. "सब कुछ है अपने हाथों में, क्या तोप नहीं तलवार नहीं।" → (2) जिस प्रकार युद्ध में तोप और तलवार की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार मनुष्य की प्रगति के लिए साहस और इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है।
सोच-विचार के लिए:
- (क) "हम हैं जिसके राजा-रानी" में 'राजा-रानी' देश के समस्त नागरिकों को कहा गया है, क्योंकि लोकतंत्र में देश की सत्ता और गौरव के असली स्वामी नागरिक ही होते हैं — हम सब इस देश के मालिक हैं।
- (ख) 'संसार-संग चलने' का अर्थ है — समाज के साथ मिल-जुलकर, सहयोग से चलना। जो व्यक्ति समाज के साथ नहीं चलता, वह अकेला पड़ जाता है; न उसे किसी का सहयोग मिलता है, न वह किसी के काम आता है — इसलिए संसार उसका अपना नहीं हो पाता।
- (ग) "उस पर है नहीं पसीजा जो / क्या है वह भू का भार नहीं" — जिस व्यक्ति का हृदय इतने महान देश के लिए भी द्रवित नहीं होता, वह संवेदनहीन व्यक्ति धरती पर केवल बोझ है, उसके जीवन का कोई मूल्य नहीं।
- (घ) 'देश-प्रेम' से तात्पर्य है — अपने देश से सच्चा लगाव, देश के लोगों, संस्कृति व प्राकृतिक संपदा का सम्मान, उसकी रक्षा व उन्नति के लिए परिश्रम करना, स्वच्छता रखना, नियमों का पालन करना तथा आवश्यकता पड़ने पर त्याग करना।
- (ङ) यह आह्वान-गीत की अन्य विशेषताएँ — सरल ओजपूर्ण भाषा, तुकांत व लयात्मकता, मुख्य पंक्ति की आवृत्ति, प्रतीकों का प्रयोग (पत्थर, काल-दीप, तोप-तलवार) और सीधे हृदय को छूने वाला प्रेरक भाव।
अनुमान और कल्पना से:
- (क) "जिसने कि खजाने खोले हैं" — यहाँ ज्ञान, विद्या, संस्कृति, कला और प्राकृतिक संपदा के खजाने की बात की गई है, जिन्हें भारत ने पूरी दुनिया को दिया।
- (ख) "जिसकी मिट्टी में उगे बढ़े" — 'उगे-बढ़े' देशवासियों/नागरिकों (हम सब) के लिए कहा गया है, क्योंकि हम सब इसी देश की मिट्टी में जन्मे और पले-बढ़े।
- (ग) 'हृदय' के लिए 'पत्थर' इसलिए कहा गया क्योंकि पत्थर कठोर और भाव-रहित होता है; जिस हृदय में प्रेम-संवेदना न हो वह भी ऐसा ही कठोर व निर्जीव है — इसी समानता के कारण यह तुलना की गई।
10. स्मरणीय बिंदु (त्वरित दोहराव)
- विधा — कविता (आह्वान-गीत); कवि — गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही' (1883–1972), उन्नाव (उ.प्र.)।
- मुख्य भाव — देश-प्रेम; प्रेम-रहित हृदय = पत्थर।
- 'पत्थर' = कठोरता/संवेदनहीनता का प्रतीक; 'राजा-रानी' = सभी नागरिक।
- केंद्रीय पंक्ति की आवृत्ति से भाव गहराता है व लय बनती है।
- संदेश — साहस, सहयोग, उत्साह और देश-सेवा से जीवन सार्थक बनता है।
- सोहनलाल द्विवेदी
- गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही'
- माखनलाल चतुर्वेदी
- सुभद्राकुमारी चौहान
- कानपुर
- लखनऊ
- उन्नाव
- इलाहाबाद
- जो धनी है
- जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं
- जो वीर है
- जो ज्ञानी है
- देश के शासकों के लिए
- केवल राजघराने के लिए
- देश के समस्त नागरिकों के लिए
- देश के सैनिकों के लिए
- देश की सुरक्षा
- देश के प्रति प्रेम
- देश की स्वतंत्रता
- देश की प्रगति
- बहुमूल्य
- अनुपम / बेजोड़
- पुराना
- साधारण
- दीपावली का उत्सव
- मृत्यु अटल और निश्चित है
- आग से बचाव
- दीपक जलाने की विधि
- दृढ़ता का
- कठोरता व संवेदनहीनता का
- स्थिरता का
- शक्ति का
- साहसी ही नदी पार करता है
- साहस छोड़ने वाला लक्ष्य तक नहीं पहुँचता
- तैरना सीखना चाहिए
- नाव से ही पार जाना चाहिए
- आकाश
- धरा / पृथ्वी
- जल
- वायु
- केवल युद्ध-सामग्री का
- साहस व इच्छाशक्ति का
- शिकार के औज़ार का
- धन-संपत्ति का
- अवधी
- संस्कृत
- ब्रजभाषा
- उर्दू
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