- 'एक आशीर्वाद' सुप्रसिद्ध ग़ज़लकार दुष्यंत कुमार की एक प्रेरक कविता है, जिसमें एक बड़ा व्यक्ति (माता/पिता/गुरु) किसी बच्चे या युवा को बड़े सपने देखने का आशीर्वाद देता है।
- कविता का मूल भाव — "तेरे स्वप्न बड़े हों"। बड़े सपने देखो, पर उन्हें केवल कल्पना में न रखकर धरती पर उतारो, यानी प्रयास करके पूरा करो।
- कविता एक ही संज्ञा शब्द 'स्वप्न' को केंद्र में रखकर अनेक क्रिया शब्दों (चलना, रूठना, मचलना, हँसना, गाना, ललचाना आदि) के सहारे बुनी गई है।
- पाठ के साथ डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का उद्बोधन 'सपनों की उड़ान' जुड़ा है — "सपने वे नहीं जो नींद में दिखें, सपने वे हैं जो सोने न दें।"
- परीक्षा महत्त्व: ~5 अंक — प्रायः एक भावार्थ/सप्रसंग व्याख्या, छोटे उत्तरीय प्रश्न तथा बहुविकल्पीय प्रश्न पूछे जाते हैं।
1. कविता का मूल पाठ
पूरी कविता इस प्रकार है (आशीर्वाद देने वाला 'जा' कहकर बच्चे को विदा करता है):
तेरे स्वप्न बड़े हों
भावना की गोद से उतरकर
जल्द पृथ्वी पर चलना सीखें
चाँद-तारों-सी अप्राप्य सच्चाइयों के लिए
रूठना-मचलना सीखें
हँसें
मुसकराएँ
गाएँ
हर दीये की रोशनी देखकर ललचाएँ
उँगली जलाएँ
अपने पाँवों पर खड़े हों।
जा,
तेरे स्वप्न बड़े हों।
ध्यान दें — इस छोटी-सी कविता में 'स्वप्न' को एक जीवित बच्चे की तरह दिखाया गया है, जो चलता है, रूठता है, हँसता है और अंत में अपने पाँवों पर खड़ा हो जाता है। यही इसका सबसे सुंदर शिल्प है।
2. लेखक/कवि परिचय — दुष्यंत कुमार
- दुष्यंत कुमार (1933–1975) हिंदी के लोकप्रिय रचनाकारों में से एक हैं।
- इनका जन्म बिजनौर (उत्तर प्रदेश) में हुआ था।
- बहुत कम समय में ही इन्होंने हिंदी साहित्य को विविधतापूर्ण रचनाओं एवं जीवंत भाषा से समृद्ध किया।
- इनका सर्वाधिक चर्चित ग़ज़ल संग्रह है — 'साये में धूप'।
- इनका संपूर्ण रचना-संसार 'दुष्यंत कुमार रचनावली' चार खंडों में प्रकाशित है।
दुष्यंत कुमार आम आदमी की पीड़ा और आशा को सरल, आत्मीय भाषा में कहने के लिए जाने जाते हैं — यही गुण इस कविता में भी झलकता है।
3. कविता का सारांश
'एक आशीर्वाद' में एक बड़ा (अभिभावक या गुरु) किसी बच्चे/युवा को जीवन-पथ पर विदा करते हुए आशीर्वाद देता है। वह 'जा' कहकर शुरुआत करता है और कामना करता है कि बच्चे के सपने बड़े हों।
पर केवल बड़े सपने देखना काफ़ी नहीं — वह चाहता है कि ये सपने केवल भावना (कल्पना) की गोद में न पड़े रहें, बल्कि उससे उतरकर पृथ्वी पर चलना सीखें, यानी वास्तविकता में बदलें और प्रयास से पूरे हों।
आशीर्वाद यह भी है कि बच्चा चाँद-तारों जैसी असंभव/कठिन सच्चाइयों को पाने के लिए हठ करे (रूठे-मचले), यानी असंभव-से लगने वाले लक्ष्यों के लिए भी पूरी लगन से जुटे। साथ ही वह जीवन में हँसे, मुसकराए, गाए — अर्थात् सपनों को आनंद और मुसकराहटों में बदले।
'हर दीये की रोशनी देखकर ललचाएँ' — हर तरह के ज्ञान और प्रकाश के प्रति आकर्षित हो और उसे पाने की ललक रखे। 'उँगली जलाएँ' — कठिनाइयों और चुनौतियों से न घबराए, बल्कि उन्हें स्वीकार करे। और अंत में सबसे बड़ी कामना — बच्चा 'अपने पाँवों पर खड़ा हो', यानी आत्मनिर्भर बने। कविता वहीं से शुरू और वहीं पर समाप्त होती है जहाँ से चली थी — "जा, तेरे स्वप्न बड़े हों।"
4. पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ
कवि (आशीर्वाद देने वाला) बच्चे को जीवन-पथ पर विदा करते हुए कामना करता है कि उसके सपने छोटे-सीमित नहीं, बल्कि बड़े और ऊँचे लक्ष्य वाले हों। यही पंक्ति आरंभ और अंत में दोहराई गई है, इसलिए यही कविता का मूल आशीर्वाद है।
सपने केवल कल्पना/भावना में न रहें। 'पृथ्वी पर चलना' का अर्थ है — सपनों का वास्तविकता का सामना करना और प्रयास द्वारा साकार होना। भावनाओं में बहना नहीं, ज़मीनी हकीकत पर उतरना है।
चाँद-तारे यहाँ दूर, कठिन, असंभव-से लगने वाले लक्ष्यों के प्रतीक हैं। 'रूठना-मचलना' = जैसे बच्चा ज़िद करके चीज़ पा लेता है, वैसे ही ऐसे कठिन लक्ष्यों के लिए भी हठ और लगातार प्रयास करे।
सपनों को बोझ न बनाकर उन्हें आनंद और मुसकराहटों में बदले। कठिन परिस्थितियों में भी मन प्रसन्न और मनोबल ऊँचा बना रहे।
हर प्रकार के ज्ञान, प्रकाश और अवसर के प्रति आकर्षित हो और उसे पाने की प्रबल ललक रखे — किसी भी अच्छी चीज़ को सीखने-पाने से न चूके।
दीये की लौ छूने पर उँगली जल सकती है, फिर भी ललक न रुके — अर्थात् चुनौतियों और कठिनाइयों को स्वीकार करे, जोखिम और कष्ट से न घबराए।
सबसे बड़ी कामना — बच्चा आत्मनिर्भर बने, दूसरों पर निर्भर न रहे, स्वयं के बल पर जीवन में खड़ा हो सके।
5. कविता का मुख्य भाव / केंद्रीय संदेश
- बड़े सपने देखो — पर उन्हें कल्पना तक सीमित न रखो, धरती पर उतारो (प्रयास करो)।
- कठिन से कठिन लक्ष्य के लिए भी हठ और निरंतर परिश्रम करो।
- संघर्ष के बीच भी आनंद, हँसी और मनोबल बनाए रखो।
- ज्ञान-प्रकाश की ललक रखो और चुनौतियों से न डरो।
- अंतिम लक्ष्य — आत्मनिर्भरता, अपने पाँवों पर खड़े होना।
संक्षेप में — यह कविता एक पीढ़ी का दूसरी पीढ़ी को दिया गया आशीर्वाद है: बड़े सपने देखो और उन्हें पूरा करने का साहस व लगन भी रखो।
6. शीर्षक की सार्थकता
कविता का शीर्षक 'एक आशीर्वाद' है — दिलचस्प बात यह है कि यह शब्द कविता में कहीं भी प्रयुक्त नहीं हुआ। फिर भी शीर्षक पूरी तरह सार्थक है, क्योंकि पूरी कविता बड़े के द्वारा छोटे को दी गई शुभकामना (आशीर्वाद) ही है — "तेरे स्वप्न बड़े हों"। 'जा' शब्द से लगता है कि कोई बड़ा बच्चे को आगे बढ़ने के लिए विदा करते हुए यह आशीष दे रहा है।
7. काव्य-शैली एवं विशेषताएँ
- विधा: यह एक कविता (मुक्त छंद) है — इसमें तुक/लय का बंधन नहीं।
- मानवीकरण: 'स्वप्न' को मनुष्य/बच्चे की तरह चलते, रूठते, हँसते, मुसकराते, गाते दिखाया गया है — यह मानवीकरण अलंकार है।
- एक संज्ञा + अनेक क्रियाएँ: पूरी कविता एक ही संज्ञा 'स्वप्न' के इर्द-गिर्द चलना, रूठना, मचलना, हँसना, मुसकराना, गाना, ललचाना, खड़ा होना जैसे क्रिया शब्दों के ताने-बाने से बुनी गई है।
- प्रतीक: चाँद-तारे = कठिन/अप्राप्य लक्ष्य; दीये की रोशनी = ज्ञान/प्रकाश; उँगली जलाना = चुनौती स्वीकारना।
- भाषा: सरल, आत्मीय, बोलचाल की हिंदी — सीधे हृदय तक पहुँचने वाली।
- आवृत्ति: "जा, / तेरे स्वप्न बड़े हों" का आरंभ व अंत में दोहराव भाव को गहराता है।
8. साथ में जुड़ा गद्यांश — 'सपनों की उड़ान' (डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम)
पाठ के 'झरोखे से' भाग में भारत के पूर्व राष्ट्रपति और सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का एक प्रेरक उद्बोधन दिया गया है, जो कविता के भाव को और आगे बढ़ाता है:
- प्रसिद्ध कथन: "सपने वे नहीं होते जो आप नींद में देखते हैं, सपने वे होते हैं जो आपको सोने नहीं देते।" — अर्थात् सच्चे सपने वही हैं जो हमें पूरा करने के लिए जगाए रखें।
- उन्होंने कहा कि इक्कीसवीं सदी में मानव के सामने इतनी संभावनाएँ हैं जितनी इतिहास में पहले कभी नहीं थीं — प्रौद्योगिकी और नई खोजों से ये संभावनाएँ तेज़ी से बढ़ रही हैं।
- उनका सपना है कि संसार के हर युवा को वे सारे अनुभव मिल सकें जिनकी उसे चाह हो।
- इसे संभव बनाने के दो तरीके उन्होंने बताए — (1) उपलब्ध समय को बढ़ाना, और (2) उतने ही समय में किए जाने वाले काम की मात्रा बढ़ाना।
- जहाँ कविता बड़े सपने देखने की बात करती है, वहीं कलाम जी सपनों को पूरा करने की योजना और प्रक्रिया पर ज़ोर देते हैं — दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।
9. शब्दार्थ (कठिन शब्द)
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| आशीर्वाद | शुभकामना, आशीष, मंगलकामना |
| स्वप्न | सपना, आकांक्षा, इच्छा |
| भावना | मन का भाव, कल्पना |
| गोद | अंक, क्रोड़ (यहाँ — कल्पना का आश्रय) |
| पृथ्वी | धरती, धरा, वसुधा, अवनि |
| अप्राप्य | जो प्राप्त न हो सके, कठिन, असंभव |
| सच्चाई | सत्य, वास्तविकता |
| रूठना | नाराज़ होना, अप्रसन्न होना |
| मचलना | ज़िद करना, हठ करना |
| मुसकराना | हल्के से हँसना |
| दीया | दीपक, प्रदीप, ज्योति |
| रोशनी | प्रकाश, उजाला, आलोक |
| ललचाना | लालायित होना, पाने की तीव्र इच्छा करना |
| ललक | तीव्र इच्छा, उत्कंठा |
| उँगली जलाना | (लाक्षणिक) कष्ट/चुनौती झेलने को तैयार होना |
| आत्मनिर्भर | अपने बल पर खड़ा, स्वावलंबी |
पर्यायवाची याद रखें (NCERT तालिका से): चाँद = शशि, निशाकर, मयंक; तारे = नक्षत्र, तारक, उडुगण; पृथ्वी = धरा, वसुधा, अवनि (पर 'सुता' नहीं)। ध्यान दें — चाँद का पर्याय 'मधुकर' नहीं (वह भौंरा है); तारे का पर्याय 'सोम' नहीं; स्वप्न का पर्याय 'यथार्थ' नहीं (वह तो उल्टा अर्थ है); दीया का पर्याय 'दीन' नहीं।
10. प्रश्नोत्तर (पाठ से एवं अतिरिक्त)
प्र.1 कविता में किसे संबोधित किया गया है?
उत्तर — कविता में बच्चों (तथा आगे बढ़ते युवा) को संबोधित किया गया है, जिन्हें एक बड़ा आशीर्वाद दे रहा है।
प्र.2 "तेरे स्वप्न बड़े हों" पंक्ति में 'स्वप्न' से क्या आशय है?
उत्तर — यहाँ 'स्वप्न' का आशय है बड़े लक्ष्य निर्धारित करना तथा ऊँची आकांक्षाएँ रखना — नींद में दिखने वाले सपने नहीं।
प्र.3 "उँगली जलाएँ" पंक्ति में उँगली जलाने का भाव क्या है?
उत्तर — इसका भाव है चुनौतियों को स्वीकार करना तथा कष्टों से न घबराना।
प्र.4 "अपने पाँवों पर खड़े हों" पंक्ति से क्या आशय है?
उत्तर — इसका आशय है आत्मनिर्भर होना — अपने बल पर जीवन में खड़ा होना।
प्र.5 'भावना की गोद से उतरकर पृथ्वी पर चलना' का क्या अर्थ है?
उत्तर — सपनों को केवल कल्पना में न रखकर वास्तविकता का सामना करना और प्रयास द्वारा उन्हें साकार करना।
प्र.6 चाँद-तारे किसके प्रतीक हैं? उनके लिए 'रूठना-मचलना' क्यों कहा गया?
उत्तर — चाँद-तारे दूर, कठिन व अप्राप्य लक्ष्यों के प्रतीक हैं। 'रूठना-मचलना' का अर्थ है ऐसे असंभव-से लक्ष्यों के लिए भी हठ और निरंतर प्रयास करना।
प्र.7 'हर दीये की रोशनी देखकर ललचाएँ' से कवि क्या कहना चाहता है?
उत्तर — हर प्रकार के ज्ञान और प्रकाश के प्रति आकृष्ट होना तथा उसे पाने की प्रबल ललक रखना।
प्र.8 शीर्षक 'एक आशीर्वाद' कविता में कहीं नहीं आया, फिर भी यह सार्थक क्यों है?
उत्तर — क्योंकि पूरी कविता एक बड़े द्वारा बच्चे को दी गई शुभकामना/आशीर्वाद ही है — "तेरे स्वप्न बड़े हों"। इसलिए शीर्षक पूरी तरह उपयुक्त है।
प्र.9 डॉ. कलाम के अनुसार सच्चे सपने कौन-से हैं?
उत्तर — सच्चे सपने वे नहीं जो नींद में दिखते हैं, बल्कि वे हैं जो हमें सोने नहीं देते — यानी जिन्हें पूरा करने की धुन हमें जगाए रखती है।
11. याद रखने योग्य बिंदु (त्वरित दोहराव)
- कवि — दुष्यंत कुमार (1933–1975), जन्म बिजनौर (उ.प्र.); चर्चित ग़ज़ल संग्रह — 'साये में धूप'।
- विधा — मुक्त छंद कविता; प्रमुख अलंकार — मानवीकरण (स्वप्न का)।
- मूल आशीर्वाद — "तेरे स्वप्न बड़े हों" (आरंभ व अंत में दोहराव)।
- संदेश — बड़े सपने देखो, उन्हें धरती पर उतारो, चुनौती झेलो, हँसते रहो, आत्मनिर्भर बनो।
- जुड़ा गद्यांश — डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का 'सपनों की उड़ान'।
- हरिवंशराय बच्चन
- दुष्यंत कुमार
- सुमित्रानंदन पंत
- माखनलाल चतुर्वेदी
- मधुशाला
- कामायनी
- साये में धूप
- आँसू
- श्रमिकों को
- नागरिकों को
- बच्चों को
- वृद्धों को
- नींद में दिखने वाले दृश्य
- बड़े लक्ष्य निर्धारित करना
- आलस्य करना
- केवल कल्पना करना
- सरल लक्ष्यों के
- अप्राप्य/कठिन सच्चाइयों के
- रात के
- सुंदरता के
- प्रकाश का प्रसार करना
- अग्नि के ताप का अनुभव करना
- चुनौतियों को स्वीकार करना
- आग से खेलना
- आत्मनिर्भर होना
- दौड़ लगाना
- दूसरों पर निर्भर रहना
- आराम करना
- केवल भावनाओं में बहना
- भावनाओं में न बहकर वास्तविकता का सामना करना
- धरती पर पैदल चलना
- सपने भूल जाना
- उपमा
- अनुप्रास
- मानवीकरण
- श्लेष
- जवाहरलाल नेहरू
- डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम
- महात्मा गांधी
- रवींद्रनाथ टैगोर
- नींद में दिखते हैं
- आपको सोने नहीं देते
- केवल कल्पना में रहते हैं
- कभी पूरे नहीं होते
- धरा
- वसुधा
- अवनि
- सुता
- लालची बनना
- विविध ज्ञान के प्रति आकृष्ट होना और उसे पाने की ललक
- दीपक खरीदना
- रोशनी से डरना
- अनेक बार आया है
- केवल अंत में आया है
- कहीं भी प्रयुक्त नहीं हुआ
- केवल आरंभ में आया है
Book a free demo class