- विधा: यह एक एकांकी (one-act play) है — गद्य में लिखा नाटक, जिसका पूरा कथानक एक ही दृश्य, एक ही स्थान (एक कमरा) और एक ही रात में घटता है।
- रचनाकार: उदयशंकर भट्ट (1898–1966) — हिंदी के प्रसिद्ध नाटककार एवं एकांकीकार।
- मूल भाव: भीषण गर्मी, छोटे किराये के मकान और शहरी मध्यवर्गीय जीवन की असुविधाओं के बीच जब दो अनजान मेहमान आ जाते हैं, तो "मान न मान मैं तेरा मेहमान" वाली विचित्र स्थिति बन जाती है।
- शैली: हास्य-व्यंग्य से भरी, सजीव बोलचाल की भाषा; संकोच, शिष्टाचार और मजबूरी का मार्मिक चित्रण।
- परीक्षा महत्व: ~5 अंक — प्रायः पात्रों की पहचान, संवाद की व्याख्या, कथानक/संदेश पर लघु-उत्तरीय एवं MCQ प्रश्न पूछे जाते हैं।
उदयशंकर भट्ट का जन्म उत्तर प्रदेश के इटावा में सन् 1898 में हुआ और निधन 1966 में हुआ। इनके परिवार में साहित्यिक वातावरण था, इसलिए बचपन से ही इनकी रुचि साहित्य में रही।
- इन्होंने रेडियो के लिए अनेक नाटक लिखे तथा नाटकों एवं फ़िल्मों में अभिनय भी किया।
- इन्होंने कविता और उपन्यास भी लिखे, परंतु इन्हें विशेष प्रसिद्धि नाटक एवं एकांकी के क्षेत्र में मिली।
- इनका उपन्यास लोक-परलोक तथा एकांकी-संग्रह पर्दे के पीछे बहुत चर्चित रहे।
प्रस्तुत एकांकी "नए मेहमान" इनकी सूक्ष्म निरीक्षण-शक्ति और सजीव संवाद-शैली का सुंदर उदाहरण है।
- विश्वनाथ — गृहपति (45 वर्ष का गठा हुआ शरीर, गेहुँआ रंग, मुख पर गंभीरता)। एक शिक्षित, शिष्ट शहरी मध्यवर्गीय व्यक्ति।
- रेवती — विश्वनाथ की पत्नी। गर्मी और सिरदर्द से परेशान, व्यावहारिक एवं स्पष्टवादी गृहिणी।
- प्रमोद और किरण — विश्वनाथ के बच्चे, जो मेहमानों की सेवा में लगे रहते हैं।
- नन्हेमल और बाबूलाल — दो अतिथि (मेहमान), जो वास्तव में किसी और के यहाँ जाना चाहते थे पर गलती से विश्वनाथ के घर पहुँच जाते हैं।
- आगंतुक — रेवती का भाई (असली मेहमान), जो नाटक के अंत में आता है।
- पड़ोसी — जिसकी छत पर मेहमानों द्वारा पानी फैलाने से झगड़ा होता है।
स्थान: भारत का कोई बड़ा नगर। समय: गर्मी की ऋतु, रात के आठ बजे।
1. आरंभिक दृश्य — गर्मी की मार
एकांकी का आरंभ एक साधारण किराये के मकान के छोटे-से कमरे से होता है। गर्मी की रात है, रात के आठ बजे हैं। कमरा बेहद गरम है। मेज़ पर रखा एक पुराना पंखा चल रहा है, जिससे बहुत कम हवा आती है। पलंग पर चार-पाँच साल का एक बच्चा गर्मी में पसीने से तर सोया हुआ बेचैन हो रहा है।
गृहपति विश्वनाथ कुरता उतारकर हाथ के पंखे से बच्चे को हवा करता है और कहता है — "ओफ़, बड़ी गरमी है! इन बंद मकानों में रहना कितना भयंकर है! मकान है कि भट्ठी!"
2. विश्वनाथ और रेवती की बातचीत
पत्नी रेवती आँचल से पसीना पोंछती हुई आती है और बताती है कि गर्मी से उसका सिर फट रहा है, पंद्रह दिन से सिरदर्द है। दोनों इस तंग, बंद मकान को "जेलखाना" और "भट्ठी" कहकर अपनी पीड़ा व्यक्त करते हैं।
- विश्वनाथ बताता है कि वह दो साल से बड़ा मकान ढूँढ़ रहा है, पर मिल ही नहीं रहा।
- छत इतनी छोटी है कि पूरी खाटें भी नहीं आतीं; एक खाट पर दो-तीन बच्चे सोते हैं।
- निर्दयी पड़ोसी खाली छत पर भी बच्चों के लिए एक खाट नहीं बिछाने देता — कहता है "सब हवा रुक जाएगी"।
विश्वनाथ सोचता है — "यदि कोई अतिथि आ जाए तो क्या होगा?" और रेवती प्रार्थना करती है कि इन दिनों कोई मेहमान न आए, क्योंकि वह बीमार और थकी हुई है।
3. दो अनजान मेहमानों का आगमन
तभी बाहर से दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ आती है। विश्वनाथ देखने जाता है और दो व्यक्ति — नन्हेमल (पैंतीस वर्ष, बड़ा) और बाबूलाल (चौबीस वर्ष, छोटा) — बिस्तर और संदूक लेकर भीतर आ जाते हैं। दोनों पसीने से तर हैं और पंडित जी (विश्वनाथ) से ठंडा पानी माँगते हैं।
विश्वनाथ बार-बार पूछता है — "आप कौन हैं? कहाँ से पधारे हैं?" पर मेहमान सीधा उत्तर नहीं देते। वे पहले पानी पीते हैं, फिर नहाने की बात करते हैं, फिर खाने की फ़रमाइश करते हैं ("बस एक साग और पूरी")। नन्हेमल कहता है कि वे संपतराम गोटेवाले से मिलने आए हैं और दावा करता है कि "हम तो आपको जानते हैं, कई बार देखा भी है।"
4. ग़लतफ़हमी गहराती है
विश्वनाथ साफ़ कहता है — "मैं संपतराम को नहीं जानता।" फिर भी मेहमान आराम से जम जाते हैं। वे बताते हैं कि वे बिजनौर से आए हैं। संयोग से विश्वनाथ कभी बीस साल पहले बिजनौर गया था, इसलिए मेहमान उसी को "जान-पहचान" मानकर बैठ जाते हैं।
रेवती और विश्वनाथ आपस में परेशान होते हैं — "ये लोग कौन हैं? जान-पहचान के तो मालूम नहीं पड़ते।" रेवती सिरदर्द के बावजूद, संकोचवश, बाज़ार से सामान मँगवाकर खाना बनाने को तैयार हो जाती है, क्योंकि "मेहमान भूखे कैसे सोएँ"।
5. पड़ोसी से झगड़ा
मेहमानों ने ऊपर पड़ोसी की छत पर हाथ धोकर गंदा पानी फैला दिया, जिससे पड़ोसी आकर झगड़ता है — "मेहमान आपके होंगे, मेरे नहीं!" विश्वनाथ बार-बार क्षमा माँगता है। पड़ोसी ताना मारता है — "तो आपके यहाँ इतने मेहमान आते ही क्यों हैं? यदि मेहमान बुलाने हों तो बड़ा-सा मकान लो।" यह दृश्य विश्वनाथ की विवशता और मध्यवर्गीय शहरी जीवन की तंगी को उजागर करता है।
6. भेद खुलता है — वे गलत घर आ गए!
विश्वनाथ धीरे-धीरे पूछताछ करता है। पता चलता है कि मेहमानों के पास कोई चिट्ठी या पता नहीं है। संपतराम ने उन्हें केवल इतना बताया था कि "स्टेशन से उतरकर कृष्णा गली चले जाना" — पर कृष्णा गली शहर में कई हैं। जिसके यहाँ जाना था उसका नाम तक उन्हें याद नहीं।
- कभी कहते हैं वह व्यक्ति कविराज है, कभी कवि, कभी वैद्य।
- अंत में पता चलता है कि उन्हें "कविराज रामलाल वैद्य" के यहाँ जाना था, जो पिछली गली में रहते हैं।
यानी ये दोनों मेहमान गलत घर में आ गए थे! विश्वनाथ उन्हें सही पता बताकर विदा करता है और राहत की साँस लेता है।
7. असली मेहमान — रेवती का भाई
जैसे ही वे दोनों जाते हैं, बाहर से एक और आवाज़ आती है — "भले आदमी, न जाने कहाँ मकान लिया है — ढूँढ़ते-ढूँढ़ते आधी रात हो गई।" यह आता है आगंतुक — रेवती का सगा भाई, जो असली मेहमान है। उसने झाँसी से तार भेजा था जो नहीं मिला।
रेवती प्रसन्न होकर भाई का स्वागत करती है। सिरदर्द से परेशान होने पर भी अंत में वह कहती है — "अब क्या, मैं खाना बनाऊँगी। भैया भूखे नहीं सो सकते।" इसके साथ यवनिका (पर्दा) गिर जाता है।
- शहरी मध्यवर्गीय जीवन की कठिनाइयाँ: छोटे किराये के मकान, भीषण गर्मी, पानी की किल्लत और जगह की तंगी का यथार्थ चित्रण।
- भारतीय अतिथि-सत्कार: तमाम परेशानी और संकोच के बावजूद घर का स्वामी अतिथि की सेवा को अपना कर्तव्य मानता है — "अतिथि देवो भव" की भावना।
- हास्य एवं व्यंग्य: गलत घर में आ बैठे "नए मेहमान" की स्थिति से हास्य उपजता है, साथ ही मानवीय व्यवहार और सामाजिक विवशता पर सूक्ष्म व्यंग्य भी।
- संवेदनशीलता: रेवती का बीमार होकर भी भाई के लिए खाना बनाने का निर्णय पारिवारिक स्नेह और कर्तव्य-भावना को दर्शाता है।
- विधा: एकांकी (single-act play) — एक दृश्य, एक स्थान, सीमित समय और थोड़े पात्र।
- भाषा: सरल, सजीव, बोलचाल की हिंदी; मुहावरेदार एवं स्वाभाविक संवाद।
- संवाद-प्रधानता: पूरी कथा पात्रों के संवादों के माध्यम से ही आगे बढ़ती है; मंच-निर्देश कोष्ठक में दिए गए हैं।
- रस: मुख्यतः हास्य रस, साथ ही करुण और यथार्थ का पुट।
- अंत: "यवनिका" शब्द से एकांकी की समाप्ति का संकेत।
- मेहमान — अतिथि, घर आया हुआ पाहुना।
- एकांकी — एक अंक (दृश्य) वाला नाटक।
- गृहपति — घर का स्वामी / मालिक।
- आगंतुक — आने वाला व्यक्ति, अतिथि।
- संकोचवश — झिझक के कारण, लज्जावश।
- असुविधा — कष्ट, सुविधा का अभाव।
- भट्ठी — आग जलाने का चूल्हा (यहाँ अत्यधिक गर्मी का प्रतीक)।
- जेलखाना — कारागार, बंदीगृह (यहाँ तंग मकान के लिए)।
- निर्दयी — दया-रहित, कठोर हृदय वाला।
- सुकुमार — कोमल, नाज़ुक।
- संपन्न — धनी, समृद्ध।
- खातिरदारी — आवभगत, सेवा-सत्कार।
- ठग — धोखेबाज़, छल करने वाला।
- कविराज / वैद्य — आयुर्वेदिक चिकित्सक।
- नेपथ्य — मंच के पीछे का भाग (जहाँ से आवाज़ आती है)।
- यवनिका — रंगमंच का पर्दा।
- हबड़-तबड़ — हड़बड़ी, अफरा-तफरी।
- तार — टेलीग्राम, तीव्र संदेश।
प्र.1 "नए मेहमान" एकांकी का मुख्य विषय क्या है?
उत्तर: इस एकांकी का मुख्य विषय शहरी मध्यवर्गीय परिवार की असुविधाओं — छोटे मकान, भीषण गर्मी और पानी की कमी — के बीच अचानक आ पहुँचे दो अनजान मेहमानों की सेवा से उत्पन्न परेशानी है। साथ ही यह भारतीय अतिथि-सत्कार की भावना को भी हास्य-व्यंग्यपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करता है।
प्र.2 विश्वनाथ और रेवती अपने मकान को "जेलखाना" और "भट्ठी" क्यों कहते हैं?
उत्तर: क्योंकि उनका किराये का मकान बहुत छोटा, बंद और हवा-रहित है। गर्मी में वहाँ साँस लेना भी कठिन है, पंखा भी मामूली हवा देता है। तंगी और घुटन के कारण वे उसे "भट्ठी" (अत्यधिक गर्म) और "जेलखाना" (बंद, कैद जैसा) कहते हैं।
प्र.3 नन्हेमल और बाबूलाल विश्वनाथ के घर कैसे पहुँचे? वे वास्तव में किसके यहाँ जाना चाहते थे?
उत्तर: वे बिजनौर से आए थे और संपतराम के बताए अधूरे पते ("कृष्णा गली") के सहारे ढूँढ़ते-ढूँढ़ते गलती से विश्वनाथ के घर पहुँच गए। उन्हें न तो उस व्यक्ति का सही पता याद था और न नाम। वास्तव में उन्हें "कविराज रामलाल वैद्य" के यहाँ, पिछली गली में जाना था।
प्र.4 पड़ोसी विश्वनाथ से क्यों झगड़ता है?
उत्तर: क्योंकि विश्वनाथ के मेहमानों ने ऊपर पड़ोसी की छत पर हाथ धोकर गंदा पानी फैला दिया था। पड़ोसी इसे बर्दाश्त नहीं कर पाता और कहता है कि मेहमान विश्वनाथ के हैं, उसके नहीं — साथ ही ताना देता है कि इतने मेहमान बुलाने हों तो बड़ा मकान लेना चाहिए।
प्र.5 अंत में आने वाला "आगंतुक" कौन है और वह क्यों देर से पहुँचता है?
उत्तर: अंत में आने वाला आगंतुक रेवती का सगा भाई है, जो असली मेहमान है। उसने झाँसी से तार भेजा था जो विश्वनाथ को नहीं मिला, और बड़े शहर में मकान ढूँढ़ते-ढूँढ़ते उसे आधी रात हो गई, इसलिए वह देर से पहुँचता है।
प्र.6 इस एकांकी से हमें क्या संदेश मिलता है?
उत्तर: यह एकांकी सिखाती है कि कठिनाई और असुविधा में भी मनुष्य को अतिथि-सत्कार और कर्तव्य-भावना नहीं भूलनी चाहिए। साथ ही यह शहरी जीवन की कठिनाइयों और मनुष्य की विवशता को सहानुभूति एवं हास्य के साथ प्रस्तुत करती है।
- कहानी
- एकांकी
- कविता
- निबंध
- प्रेमचंद
- जयशंकर प्रसाद
- उदयशंकर भट्ट
- रामधारी सिंह दिनकर
- नन्हेमल
- बाबूलाल
- विश्वनाथ
- आगंतुक
- बहन
- पत्नी
- माता
- बेटी
- वर्षा, सुबह
- शीत, दोपहर
- गर्मी, रात के आठ बजे
- बसंत, शाम
- लखनऊ
- बिजनौर
- झाँसी
- मुरादाबाद
- जगदीशप्रसाद
- संपतराम स्वयं
- कविराज रामलाल वैद्य
- लाला भानामल
- शोर मचाने पर
- छत पर गंदा पानी फैलाने पर
- किराया न देने पर
- बच्चों के झगड़े पर
- विश्वनाथ का मित्र
- रेवती का भाई
- संपतराम
- पड़ोसी का रिश्तेदार
- बिजनौर
- शिमला
- झाँसी
- लखनऊ
- महल
- भट्ठी
- बगीचा
- धर्मशाला
- मंच
- पर्दा
- दीपक
- अभिनेता
Book a free demo class