कबीर के दोहे

www.akankshaclasses.com
CLASS VIII Hindi ~5 अंक Ch 5 of 10
कबीर के दोहे

Class 8 · Hindi · NCERT chapter notes · Akanksha Classes

एक नज़र में (Snapshot)
  • यह पाठ संत कबीर के सात दोहों का संकलन है, जो जीवन को सही ढंग से जीने की सीख देते हैं — सत्य, गुरु-महिमा, परिश्रम, संतुलन, मधुर वाणी, आत्म-सुधार और सत्संगति।
  • दोहा एक मात्रिक छंद है — दो पंक्तियाँ (चार चरण); पहले-तीसरे चरण में 13 मात्राएँ, दूसरे-चौथे चरण में 11 मात्राएँ होती हैं।
  • कबीर की भाषा सधुक्कड़ी (अनेक बोलियों का मिश्रण) है; शैली सरल पर गहरी — कम शब्दों में जीवन का बड़ा सत्य।
  • हर दोहा एक जीवन-कौशल सिखाता है — इसीलिए ये आज भी भजन और कहावत बनकर लोगों की ज़ुबान पर हैं (जैसे — "जैसा संग वैसा रंग")।
  • परीक्षा भार: लगभग ~5 अंक — दोहे का भावार्थ/मूल संदेश, शब्दार्थ, अलंकार-पहचान और लघु प्रश्नोत्तर प्रायः पूछे जाते हैं।
विस्तृत अध्ययन

1. कवि परिचय — संत कबीर

कबीर एक ऐसे संत थे जो करघे पर कपड़ा बुनते और साथ-साथ मन में कविता भी बुनते थे। बुनते-बुनते वे इतने प्रसिद्ध हो गए कि उनकी कविताएँ आज भी लोग भजनों की तरह गाते-सुनते हैं और वे पाठ्यपुस्तकों में पढ़ाई जाती हैं।

  • जन्म: माना जाता है कि कबीर का जन्म चौदहवीं शताब्दी में काशी (वाराणसी) में हुआ था।
  • रचनाएँ: उनकी रचनाएँ मुख्यतः कबीर ग्रंथावली में संगृहीत हैं।
  • योगदान: उन्होंने बाहरी आडंबर, पाखंड और भेदभाव का खंडन किया और सच्चाई, प्रेम तथा अच्छे आचरण पर बल दिया।
  • आज भी प्रासंगिक: उनकी रचनाएँ हमें जीवन की सच्चाई समझने और अच्छा मनुष्य बनने की प्रेरणा देती हैं।

कबीर निर्गुण भक्तिधारा (ज्ञानाश्रयी शाखा) के प्रमुख संत-कवि माने जाते हैं। उनके दोहे सहज, सरल पर बेहद प्रभावशाली हैं — यही उनकी पहचान है।

2. दोहा 1 — सत्य की महिमा

"साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।
जाके हिरदे साँच है, ता हिरदे गुरु आप॥"

भावार्थ: कबीर कहते हैं कि सत्य के समान कोई तपस्या नहीं है और झूठ के समान कोई पाप नहीं है। अर्थात सच बोलना अपने-आप में सबसे बड़ी साधना है। जिस व्यक्ति के हृदय में सत्य बसा होता है, उसके हृदय में स्वयं गुरु (परमात्मा) का निवास होता है — सत्य ही उसे पवित्र और प्रकाशित कर देता है।

शिक्षा: सत्य का पालन कठिन तपस्या से कम नहीं; सत्य ही जीवन का सबसे बड़ा मूल्य है, जिससे हृदय प्रकाशित होता है।

3. दोहा 2 — बड़प्पन नहीं, उपयोगिता बड़ी

"बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागै अति दूर॥"

भावार्थ: कबीर कहते हैं कि केवल आकार में बड़ा या ऊँचा हो जाना कोई बड़ी बात नहीं। उदाहरण के लिए खजूर का पेड़ बहुत ऊँचा होता है, परंतु वह राहगीर (पंथी) को छाया नहीं देता और उसके फल भी इतने ऊँचे (अति दूर) लगते हैं कि सहज ही नहीं मिलते। इसी प्रकार बड़ा या संपन्न होकर भी यदि कोई दूसरों के काम न आए, तो उसका बड़प्पन व्यर्थ है।

शिक्षा: सच्चा बड़प्पन परोपकार और दूसरों के काम आने में है, केवल पद या धन में नहीं। यह दोहा "परिश्रम और लगन से काम करना तथा सभी के काम आना" — इस जीवन-कौशल पर बल देता है।

4. दोहा 3 — गुरु की महिमा

"गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥"

भावार्थ: कबीर कल्पना करते हैं कि यदि गुरु और गोविंद (ईश्वर) दोनों एक साथ सामने खड़े हों, तो पहले किसके चरण छुएँ? वे स्वयं उत्तर देते हैं — पहले गुरु के, क्योंकि गुरु ही वह मार्गदर्शक है जिसने ईश्वर तक पहुँचने का रास्ता बताया। इसलिए वे अपने गुरु पर बलिहारी (न्योछावर) जाते हैं।

शिक्षा: यह दोहा गुरु के महत्व को दर्शाता है — गुरु शिष्य का मार्गदर्शन करता है, अतः उसका स्थान ईश्वर से भी ऊँचा माना गया है।

5. दोहा 4 — हर चीज़ में संतुलन

"अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप॥"

भावार्थ: कबीर कहते हैं कि किसी भी चीज़ की अति (अधिकता) अच्छी नहीं होती। न तो बहुत अधिक बोलना अच्छा है, न ही बहुत अधिक चुप रहना; न बहुत अधिक वर्षा अच्छी है, न ही बहुत अधिक धूप। हर परिस्थिति में संतुलन आवश्यक है।

शिक्षा: जीवन में संतुलन ही श्रेष्ठ है — अति किसी भी रूप में हानिकारक होती है। (आज के संदर्भ में — मोबाइल या इंटरनेट का अत्यधिक प्रयोग भी हानिकारक है।)

6. दोहा 5 — मधुर वाणी का प्रभाव

"ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को सीतल करै, आपहुँ सीतल होय॥"

भावार्थ: कबीर सलाह देते हैं कि ऐसी मधुर वाणी बोलनी चाहिए जिसमें अहंकार (आपा) न हो। ऐसी वाणी दूसरों को तो शीतलता (शांति) देती ही है, साथ ही बोलने वाले को भी मन की शांति देती है।

शिक्षा: मधुर वाणी का सबसे बड़ा लाभ — दूसरों और स्वयं दोनों को मानसिक शांति मिलती है। शब्दों का प्रभाव सुनने वाले पर ही नहीं, बोलने वाले पर भी पड़ता है।

7. दोहा 6 — आलोचक को पास रखो

"निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करै सुभाय॥"

भावार्थ: कबीर कहते हैं कि अपनी निंदा करने वाले (निंदक/आलोचक) को अपने पास ही रखना चाहिए — चाहे आँगन में उसके लिए झोपड़ी ही क्यों न छवानी पड़े। क्योंकि वह बिना पानी और बिना साबुन के ही हमारे स्वभाव (सुभाय) को निर्मल (शुद्ध) कर देता है। आलोचक हमारी गलतियाँ बताकर हमें सुधरने का अवसर देता है।

शिक्षा: आलोचकों को दूर भगाना नहीं, बल्कि पास रखना चाहिए — वे हमारी कमियाँ बताकर हमें बेहतर इंसान बनाते हैं।

8. दोहा 7 — साधु का विवेक और सत्संगति

"साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।
सार सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय॥"

"कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।
जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय॥"

भावार्थ (पहला अंश): साधु (सज्जन/विवेकी व्यक्ति) ऐसा होना चाहिए जैसा सूप (अनाज फटकने का छाज) होता है। जैसे सूप सार (अच्छा अनाज) को रोक लेता है और थोथा (भूसी/व्यर्थ) को उड़ा देता है, वैसे ही विवेकी व्यक्ति अच्छी बातों को ग्रहण करता है और बुरी बातों को छोड़ देता है। यहाँ 'सूप' विवेक और सूझबूझ का प्रतीक है।

भावार्थ (दूसरा अंश): कबीर कहते हैं कि मन पंछी (पक्षी) के समान है — जहाँ उसका मन करता है, वहीं उड़ जाता है। और मनुष्य जैसी संगति करता है, उसे वैसा ही फल मिलता है। अच्छी संगति अच्छे, बुरी संगति बुरे परिणाम देती है।

शिक्षा: जीवन में विवेक से सार-असार की पहचान करनी चाहिए और सदैव अच्छी संगति करनी चाहिए — यही दोहा आगे चलकर "जैसा संग वैसा रंग" कहावत बना।

9. पाठ का मुख्य भाव / केंद्रीय सीख

कबीर के ये सातों दोहे मिलकर एक संदेश देते हैं — अच्छा मनुष्य कैसे बना जाए। संक्षेप में हर दोहे की सीख:

  • दोहा 1: सत्य ही सबसे बड़ी तपस्या; झूठ सबसे बड़ा पाप।
  • दोहा 2: केवल बड़ा होना नहीं, दूसरों के काम आना बड़प्पन है।
  • दोहा 3: गुरु का स्थान ईश्वर से भी ऊँचा।
  • दोहा 4: हर चीज़ में संतुलन रखो; अति वर्जित है।
  • दोहा 5: मधुर, अहंकाररहित वाणी बोलो।
  • दोहा 6: आलोचक को पास रखो, वह तुम्हें सुधारता है।
  • दोहा 7: विवेक रखो और अच्छी संगति करो।

कुल मिलाकर — सच्चाई, विनम्रता, परोपकार, संयम और विवेक ही सद्जीवन के आधार हैं।

10. भाषा-शैली एवं अलंकार

  • छंद: सभी रचनाएँ दोहा छंद में हैं (मात्रिक छंद — 13, 11, 13, 11 मात्राएँ)।
  • भाषा: सधुक्कड़ी — अवधी, ब्रज, राजस्थानी, पंजाबी आदि बोलियों का मिश्रण; सरल, बोलचाल की भाषा (जैसे — हिरदे, पाँय, सीतल, नियरे, सुभाय)।
  • शैली: सहज, उपदेशात्मक एवं दृष्टांतमूलक — कठिन बात को सरल उदाहरण से समझाना (खजूर, सूप, पंछी)।
  • अनुप्रास अलंकार: एक ही अक्षर की आवृत्ति — "साँच…साँच", "सार सार", "सीतल…सीतल", "बानी बोलिए"।
  • पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार: एक शब्द का दो बार आना — "सार सार"।
  • उपमा अलंकार: तुलना दिखाना — "जैसे पेड़ खजूर", "जैसा सूप सुभाय", "मन पंछी भया"।
  • रूपक अलंकार: 'सूप' को विवेक का तथा 'मन' को पंछी का रूप देना।
  • विरोधाभास/संतुलन: "अति का भला न बोलना… न चूप" — विपरीत भावों का संतुलित प्रयोग।

11. शब्दार्थ (कठिन शब्द)

  • साँच — सत्य, सच्चाई
  • तप — तपस्या, साधना
  • हिरदे — हृदय, मन
  • पंथी — राहगीर, यात्री
  • अति दूर — बहुत ऊँचे/दूर
  • दोऊ — दोनों
  • काके — किसके
  • पाँय — पैर, चरण
  • बलिहारी — न्योछावर, कुर्बान
  • अति — अधिकता, बहुत ज़्यादा
  • चूप (चुप) — मौन रहना
  • बानी (वाणी) — बोली, वचन
  • आपा — अहंकार, मैं-पन
  • औरन — दूसरों को
  • सीतल (शीतल) — शांत, ठंडा
  • नियरे — निकट, पास
  • निंदक — आलोचना/निंदा करने वाला
  • कुटी — झोपड़ी
  • छवाय — छवाकर, बनवाकर
  • सुभाय (स्वभाव) — आदत, प्रकृति
  • सूप — अनाज फटकने का छाज
  • सार — उपयोगी/अच्छा तत्व
  • गहि रहै — पकड़कर रखता है
  • थोथा — व्यर्थ, भूसी, खोखला
  • नियरे — पास
  • तहवाँ — वहीं
  • संगति — साथ, मेल-जोल

12. प्रश्नोत्तर (NCERT आधारित)

प्र.1 — "गुरु गोविंद दोऊ खड़े…" दोहे में किसके महत्व पर बल दिया गया है?

उत्तर: इस दोहे में गुरु के महत्व पर बल दिया गया है। कबीर के अनुसार गुरु ही ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग बताता है, इसलिए उसका स्थान ईश्वर से भी ऊँचा है।

प्र.2 — "अति का भला न बोलना…" दोहे का मूल संदेश क्या है?

उत्तर: इसका मूल संदेश है कि हर परिस्थिति में संतुलन होना आवश्यक है। किसी भी चीज़ की अति — चाहे बोलना हो, मौन हो, वर्षा हो या धूप — हानिकारक होती है।

प्र.3 — "बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर…" दोहा किस जीवन-कौशल पर बल देता है?

उत्तर: यह दोहा दूसरों के काम आने तथा परोपकार के जीवन-कौशल पर बल देता है। खजूर के पेड़ की तरह बड़ा होकर भी यदि कोई किसी के काम न आए, तो उसका बड़प्पन व्यर्थ है।

प्र.4 — "ऐसी बानी बोलिए…" के अनुसार मधुर वाणी का सबसे बड़ा लाभ क्या है?

उत्तर: मधुर वाणी का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इससे दूसरों और स्वयं — दोनों को मानसिक शांति मिलती है।

प्र.5 — "साँच बराबर तप नहीं…" दोहे से क्या निष्कर्ष निकलता है?

उत्तर: इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि सत्य एक महत्वपूर्ण जीवन-मूल्य है जिससे हृदय प्रकाशित होता है। सत्य का पालन किसी तपस्या से कम नहीं।

प्र.6 — "निंदक नियरे राखिए…" में जीवन में किस दृष्टिकोण को अपनाने की सलाह दी गई है?

उत्तर: इसमें आलोचकों को अपने पास रखने का दृष्टिकोण अपनाने की सलाह दी गई है, क्योंकि वे हमारी गलतियाँ बताकर हमें सुधरने का अवसर देते हैं।

प्र.7 — "साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय…" में 'सूप' किसका प्रतीक है?

उत्तर: यहाँ 'सूप' विवेक और सूझबूझ का प्रतीक है — जैसे सूप सार को रखकर थोथा उड़ा देता है, वैसे ही विवेकी व्यक्ति अच्छी बातें ग्रहण कर बुरी छोड़ देता है।

प्र.8 — "कबिरा मन पंछी भया…" दोहे से संगति के विषय में क्या सीख मिलती है?

उत्तर: इससे सीख मिलती है कि मनुष्य जैसी संगति करता है, वैसा ही फल पाता है। अच्छी संगति अच्छा और बुरी संगति बुरा परिणाम देती है।

अभ्यास हेतु MCQ
1. कबीर का जन्म किस शताब्दी में हुआ माना जाता है?
  1. बारहवीं
  2. तेरहवीं
  3. चौदहवीं
  4. सोलहवीं
Answer: (C) चौदहवीं शताब्दी में, काशी में।
2. "साँच बराबर तप नहीं" — यहाँ 'तप' किसके समान बताया गया है?
  1. पाप के
  2. सत्य के
  3. झूठ के
  4. क्रोध के
Answer: (B) सत्य के — सत्य ही सबसे बड़ी तपस्या है।
3. खजूर के पेड़ के उदाहरण से कबीर क्या समझाना चाहते हैं?
  1. ऊँचाई महत्वपूर्ण है
  2. केवल बड़ा होना पर्याप्त नहीं, उपयोगी होना ज़रूरी है
  3. फल मीठे होने चाहिए
  4. छाया सबसे आवश्यक है
Answer: (B) बड़ा होकर भी दूसरों के काम न आना व्यर्थ है।
4. "गुरु गोविंद दोऊ खड़े" दोहे में कबीर ने पहले किसके चरण छूने को कहा?
  1. गोविंद (ईश्वर) के
  2. माता-पिता के
  3. गुरु के
  4. मित्र के
Answer: (C) गुरु के, क्योंकि गुरु ने ही ईश्वर का मार्ग बताया।
5. "अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप" का केंद्रीय भाव है—
  1. हमेशा चुप रहना ही ठीक है
  2. हर परिस्थिति में संतुलन आवश्यक है
  3. अधिक बोलना अच्छा है
  4. वर्षा से बचना चाहिए
Answer: (B) किसी भी चीज़ की अति हानिकारक है — संतुलन ज़रूरी है।
6. "ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय" में 'आपा' का अर्थ है—
  1. स्वयं
  2. अहंकार
  3. शांति
  4. क्रोध
Answer: (B) अहंकार — वाणी में अहंकार नहीं होना चाहिए।
7. कबीर के अनुसार 'निंदक' को कहाँ रखना चाहिए?
  1. बहुत दूर
  2. अपने पास (नियरे)
  3. घर से बाहर
  4. गाँव के बाहर
Answer: (B) पास — वह बिना पानी-साबुन के स्वभाव निर्मल कर देता है।
8. "साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय" में 'सूप' किसका प्रतीक है?
  1. सुख-सुविधाओं का
  2. मन की कल्पनाओं का
  3. विवेक और सूझबूझ का
  4. क्रोधी स्वभाव का
Answer: (C) विवेक और सूझबूझ का।
9. "सार सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय" में 'थोथा' का अर्थ है—
  1. उपयोगी अनाज
  2. व्यर्थ/भूसी
  3. शुद्ध जल
  4. मधुर वाणी
Answer: (B) व्यर्थ/भूसी — विवेकी व्यक्ति बेकार बातें छोड़ देता है।
10. "जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय" — यह दोहा किस कहावत के रूप में प्रसिद्ध हुआ?
  1. नेकी कर दरिया में डाल
  2. जैसा संग वैसा रंग
  3. अब पछताए होत क्या
  4. दूध का जला छाछ फूँक-फूँककर पीता है
Answer: (B) "जैसा संग वैसा रंग"।
11. कबीर की रचनाएँ मुख्यतः किस ग्रंथ में संगृहीत हैं?
  1. रामचरितमानस
  2. कबीर ग्रंथावली
  3. सूरसागर
  4. बीजक-कथा
Answer: (B) कबीर ग्रंथावली।
12. इस पाठ की सभी रचनाएँ किस छंद में हैं?
  1. चौपाई
  2. सोरठा
  3. दोहा
  4. सवैया
Answer: (C) दोहा।
13. "सार सार" में कौन-सा अलंकार है?
  1. उपमा
  2. रूपक
  3. पुनरुक्ति प्रकाश
  4. श्लेष
Answer: (C) पुनरुक्ति प्रकाश — एक शब्द की पुनरावृत्ति।
14. कबीर अपने पेशे से क्या काम करते थे?
  1. खेती
  2. करघे पर कपड़ा बुनना
  3. व्यापार
  4. लोहार का काम
Answer: (B) करघे पर कपड़ा बुनते थे।
कथन–कारण (Assertion–Reason)
कथन (A): कबीर निंदक को अपने पास रखने की सलाह देते हैं।   कारण (R): आलोचक हमारी गलतियाँ बताकर हमें सुधरने का अवसर देता है।
Answer: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है — निंदक बिना पानी-साबुन के स्वभाव निर्मल करता है।
कथन (A): कबीर गुरु को गोविंद से ऊँचा स्थान देते हैं।   कारण (R): गुरु ने ही ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग बताया।
Answer: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
परीक्षोपयोगी प्रश्न
प्र.1 — "बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर" — इस दोहे का भावार्थ अपने शब्दों में लिखिए। (3 अंक)
संकेत: केवल बड़ा/संपन्न होना पर्याप्त नहीं; जैसे ऊँचा खजूर न छाया देता है न सुलभ फल, वैसे ही जो दूसरों के काम न आए, उसका बड़प्पन व्यर्थ है। सच्चा बड़प्पन परोपकार में है।
प्र.2 — कबीर की भाषा-शैली की दो विशेषताएँ उदाहरण सहित लिखिए। (3 अंक)
संकेत: (i) सधुक्कड़ी सरल भाषा (हिरदे, सीतल, नियरे)। (ii) दृष्टांत-शैली व अलंकार — उपमा ("जैसा सूप"), अनुप्रास ("सार सार"), रूपक ("मन पंछी भया")।
प्र.3 — "ऐसी बानी बोलिए…" दोहे के आधार पर मधुर वाणी का महत्व समझाइए। (4 अंक)
संकेत: अहंकाररहित मधुर वाणी दूसरों को शांति देती है और स्वयं को भी शीतलता (मन की शांति) देती है। शब्दों का प्रभाव सुनने वाले और बोलने वाले — दोनों पर पड़ता है; अतः सदा मीठा बोलना चाहिए।
प्र.4 — "जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय" — संगति का जीवन पर प्रभाव उदाहरण सहित समझाइए। (4 अंक)
संकेत: मनुष्य का स्वभाव व व्यवहार संगति से बनता है। अच्छी संगति अच्छे गुण, बुरी संगति बुरी आदतें देती है (उदा. — गलत संगति से पढ़ाई बिगड़ना)। इसीलिए "जैसा संग वैसा रंग" कहावत प्रसिद्ध है। अतः सदा सत्संगति करनी चाहिए।
Want personal coaching in Dwarka?
Book a free demo class
More Class 8 Hindi chapters
Chat with us