- रचनाकार: महादेवी वर्मा (1907–1987) — छायावाद की प्रमुख स्तंभ, ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित, 'आधुनिक युग की मीरा' कही जाने वाली कवयित्री।
- विधा: कविता (गीत)। कुल सात स्तबक — पहली और अंतिम पंक्तियाँ एक जैसी हैं, जिससे टेक (refrain) बनकर भाव गूँजता रहता है।
- मूल भाव: सपनों की स्वतंत्रता बनी रहनी चाहिए। सपनों के पंख मत काटो, उनकी गति मत बाँधो — उन्हें ऊपर उठने (आरोहण) और लौटकर साकार होने (अवरोहण) की पूरी छूट दो।
- प्रतीक: सौरभ (खुशबू), बीज, अग्नि, धूम (धुआँ) — इन उदाहरणों से कवयित्री बताती है कि सपनों की गति में आरोहण और अवरोहण दोनों छिपे हैं।
- केंद्रीय संदेश: स्वतंत्र विचार और कल्पना ही समाज को सुंदर, समृद्ध और शांतिपूर्ण 'स्वर्ग' बना सकते हैं — इसलिए किसी की कल्पना को बाँधना नहीं चाहिए।
- परीक्षा महत्त्व: ~5 अंक — प्रायः भावार्थ/व्याख्या, मुख्य भाव, अलंकार-पहचान और 1–2 अंक के शब्दार्थ/MCQ के रूप में पूछा जाता है।
हिंदी की सुप्रसिद्ध कवयित्री महादेवी वर्मा का जन्म सन् 1907 में फर्रुखाबाद (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। उन्होंने बहुत छोटी उम्र में ही कविता लिखना आरंभ कर दिया था। बच्चों के लिए उन्होंने 'बारहमासा', 'आज खरीदेंगे हम ज्वाला', 'अब यह चिड़िया कहाँ रहेगी' जैसी अनेक कविताएँ लिखीं।
कविता के साथ-साथ उन्होंने भावपूर्ण गद्य भी रचा — मेरा परिवार, अतीत के चलचित्र, स्मृति की रेखाएँ तथा पथ के साथी उनकी प्रसिद्ध गद्य रचनाएँ हैं। उनके लिखे रेखाचित्र पाठकों को बहुत देर तक याद रह जाते हैं।
उनके चर्चित कविता-संग्रह हैं — नीहार, रश्मि, नीरजा, सांध्य गीत और दीपशिखा। उन्हें भारत के सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। बहुमुखी प्रतिभा की धनी महादेवी वर्मा एक अच्छी चित्रकार भी थीं। उनका निधन सन् 1987 में हुआ।
स्तबक 1 — टेक (मूल पुकार)
इन सपनों की गति मत बाँधो!
भावार्थ: कवयित्री विनती करती है कि हमारे सपनों के पंख मत काटो। जैसे किसी पक्षी के पंख कट जाने पर वह उड़ नहीं पाता, वैसे ही सपनों के पंख काट देने पर मनुष्य की कल्पना और संभावनाएँ समाप्त हो जाती हैं। इसलिए सपनों की गति को मत रोको, उन्हें खुलकर ऊँचाइयों तक उड़ने दो। यही पंक्तियाँ अंत में फिर आती हैं — इसी से सपनों की स्वतंत्रता का भाव कविता भर गूँजता रहता है।
स्तबक 2 — सौरभ और बीज का उदाहरण
फिर वह लौट कहाँ आता है?
बीज धूलि में गिर जाता जो
वह नभ में कब उड़ पाता है?
भावार्थ: कवयित्री दो उदाहरण देती है। फूल की सुगंध (सौरभ) एक बार आकाश में उड़ जाए तो वह लौटकर वापस नहीं आती — यानी वह केवल ऊपर उठती है, नीचे नहीं लौटती। दूसरी ओर, बीज यदि धूल में गिर पड़े तो वह कभी आकाश में नहीं उड़ पाता — यानी वह केवल नीचे रहता है, ऊपर नहीं उठता। इन दोनों में केवल एक ही गति है — किसी में आरोहण (ऊपर उठना), किसी में अवरोहण (नीचे आना)। प्रश्न-शैली से कवयित्री हमें सोचने पर विवश करती है।
स्तबक 3 — अग्नि-धूम और दोनों गतियाँ
धूम गगन में मँडराता है!
सपनों में दोनों ही गति हैं
उड़ कर आँखों में आता है!
भावार्थ: अग्नि सदा धरती पर ही जलती है (नीचे की गति), जबकि उससे उठा धुआँ (धूम) आकाश में मँडराता रहता है (ऊपर की गति)। इस तरह सौरभ, बीज, अग्नि और धूम के उदाहरणों में अलग-अलग दिशा की गति है। पर सपनों में ये दोनों ही गतियाँ एक साथ होती हैं — सपना ऊपर भी उठता है और लौटकर हमारी आँखों में भी आता है, अर्थात विचार बनकर जन्म लेता है और फिर व्यवहार/वास्तविकता बनकर साकार होता है। तभी सपना कल्पना से निकलकर सच्चाई बनता है।
स्तबक 4 — आरोहण-अवरोहण न रोको
इसका अवरोहण मत बाँधो!
भावार्थ: कवयित्री कहती है कि सपनों के आरोहण (ऊपर उठने, ऊँचे लक्ष्य तक जाने) को मत रोको और उनके अवरोहण (नीचे लौटकर व्यवहार में उतरने, साकार होने) को मत बाँधो। दोनों ही गतियाँ ज़रूरी हैं — क्योंकि स्वतंत्रता ही सपनों को साकार करने की कुंजी है। यदि किसी एक गति को रोक दें तो सपना अधूरा रह जाएगा।
स्तबक 5 — मुक्त गगन में विचरण
तारों में फिर मिल जायेगा,
मेघों से रंग औ' किरणों से
दीप्ति लिए भू पर आयेगा।
भावार्थ: यदि सपने को स्वतंत्र आकाश में घूमने दिया जाए तो वह तारों तक जा पहुँचेगा, उनसे जा मिलेगा। फिर वह बादलों से रंग और किरणों से चमक (दीप्ति) लेकर धरती पर लौट आएगा। आशय यह है कि स्वतंत्र छोड़ा गया सपना ऊँचाइयों से नई सुंदरता, नई प्रेरणा और नया प्रकाश बटोरकर लौटता है और हमारे जीवन को समृद्ध बनाता है।
स्तबक 6 — स्वर्ग गढ़ने की कला
भूमि को सिखलायेगा!
नभ तक जाने से मत रोको
धरती से इसको मत बाँधो!
भावार्थ: ऊँचाइयों से लौटा हुआ सपना पृथ्वी को स्वर्ग बनाने का कोई शिल्प (कला/हुनर) सिखाएगा। यहाँ 'स्वर्ग' से आशय वह स्थान है जहाँ परस्पर सहयोग और सद्भाव हो, जहाँ सभी प्राणी एक-दूसरे के प्रति संवेदनशील हों। इसलिए कवयित्री फिर दोहराती है — सपने को आकाश तक जाने से मत रोको, इसे केवल धरती से बाँधकर मत रखो। रचनात्मक और स्वतंत्र विचार ही समाज को सुंदर और शांतिपूर्ण बना सकते हैं।
स्तबक 7 — टेक की पुनरावृत्ति
इन सपनों की गति मत बाँधो!
भावार्थ: कविता उसी पुकार पर लौट आती है जिससे आरंभ हुई थी। यह दोहराव (टेक) पाठक के मन में मूल संदेश को गहराई से बैठा देता है — सपनों की स्वतंत्रता को कभी मत छीनो, उनके पंख मत काटो, उनकी गति मत बाँधो।
'मत बाँधो' कविता का केंद्रीय भाव है — सपनों और कल्पना की स्वतंत्रता बनी रहनी चाहिए। महादेवी वर्मा सपने को एक स्वतंत्र पक्षी के समान मानती हैं, जिसके पंख काटना या जिसकी गति बाँधना उचित नहीं। सौरभ, बीज, अग्नि और धूम के सजीव उदाहरणों से वे दिखाती हैं कि इन सबमें केवल एक-एक गति है, परंतु सपने में आरोहण और अवरोहण दोनों होते हैं — वह ऊपर उठकर ऊँचे लक्ष्य छूता है और फिर लौटकर वास्तविकता में साकार होता है। स्वतंत्र सपना ही धरती को 'स्वर्ग' बनाने की कला सिखा सकता है। संदेश स्पष्ट है — व्यक्ति को बाँधा जा सकता है, उसकी कल्पना और विचारों को नहीं; इसलिए सपनों की उड़ान को कभी मत रोको।
- मानवीकरण (मानवीय गुणारोपण): सपने को मनुष्य/पक्षी की तरह चित्रित किया गया है — उसके 'पंख' हैं, वह 'उड़ता' है, 'विचरण' करता है, 'लौटकर आता' है। यह छायावाद की प्रमुख विशेषता है।
- विरोधाभासी/विपरीतार्थक शब्द: 'आरोहण × अवरोहण' जैसे विपरीत अर्थ वाले शब्दों का सुंदर प्रयोग।
- समानार्थी शब्द (पुनरुक्ति-वैचित्र्य): 'नभ' और 'गगन' एक ही अर्थ ('आकाश') के शब्द — लय बनाए रखने के लिए प्रयोग।
- शब्द-पुनरावृत्ति: 'मत बाँधो', 'मत रोको', 'सपनों' शब्द बार-बार आते हैं — इससे आग्रह और संगीतात्मकता दोनों बढ़ते हैं।
- टेक (refrain): पहली व अंतिम पंक्तियाँ समान — गीत-शैली का प्रमुख गुण, जो भाव को गुँजायमान करता है।
- प्रश्न-शैली: "फिर वह लौट कहाँ आता है?", "वह नभ में कब उड़ पाता है?" — पाठक को सोचने पर विवश करने वाली प्रश्नात्मक रचना।
- प्रतीक एवं बिंब: सौरभ, बीज, अग्नि, धूम, तारे, मेघ, किरणें — प्रकृति से लिए सजीव शब्द-चित्र (बिंब) जो भाव को मूर्त बनाते हैं।
- संबोधन शैली: पूरी कविता किसी अनाम श्रोता से कही गई पुकार/प्रार्थना के रूप में है ("मत काटो", "मत बाँधो")।
- भाषा: सरल, प्रवाहमयी खड़ी बोली; तत्सम शब्दों (सौरभ, गगन, दीप्ति, आरोहण) का मधुर प्रयोग।
- सपने — स्वप्न, कल्पनाएँ, आकांक्षाएँ
- पंख — पर, उड़ने का साधन
- गति — चाल, गतिशीलता, आगे बढ़ने की शक्ति
- बाँधो — रोको, सीमित करो, गाँठ लगाओ
- सौरभ — सुगंध, खुशबू
- नभ / गगन — आकाश, आसमान
- लौट — वापस आना
- धूलि — धूल, मिट्टी
- अग्नि — आग
- धूम — धुआँ
- मँडराता — चारों ओर घूमता/छाया रहता
- आरोहण — नीचे से ऊपर की ओर चढ़ना
- अवरोहण — ऊपर से नीचे की ओर उतरना
- मुक्त — स्वतंत्र, बंधनरहित
- विचरण — घूमना, भ्रमण करना
- मेघ — बादल
- दीप्ति — चमक, प्रकाश, कांति
- भू — धरती, भूमि
- शिल्प — कला, हुनर, कारीगरी; कोई चीज़ बनाने का काम
प्र.1 — इस कविता का मुख्य भाव क्या है?
उत्तर: इस कविता का मुख्य भाव है कि सपनों की स्वतंत्रता बनी रहनी चाहिए। सपनों के पंख नहीं काटने चाहिए और न ही उनकी गति बाँधनी चाहिए, क्योंकि स्वतंत्र सपने ही जीवन में नई संभावनाएँ और सुंदरता लाते हैं।
प्र.2 — 'मत बाँधो' कविता किसकी स्वतंत्रता की बात करती है?
उत्तर: यह कविता सपनों की (कल्पना और विचारों की) स्वतंत्रता की बात करती है।
प्र.3 — "इन सपनों के पंख न काटो" — सपनों के 'पंख' होने की कल्पना क्यों की गई है?
उत्तर: क्योंकि सपने पंखों की तरह ऊँचाइयों तक उड़ान भरते हैं और जीवन में कुछ नया करने की प्रेरणा देते हैं। जैसे पक्षी के पंख कट जाने पर वह उड़ नहीं सकता, वैसे ही सपनों के पंख काट देने पर मनुष्य की कल्पनाशीलता और संभावनाएँ समाप्त हो जाती हैं।
प्र.4 — "स्वर्ग बनाने का फिर कोई शिल्प" — यहाँ 'स्वर्ग' से क्या आशय है?
उत्तर: 'स्वर्ग' से आशय वह सुखद स्थान है जहाँ परस्पर सहयोग एवं सद्भाव हो, जहाँ सुख-शांति, समृद्धि और आनंद की अनुभूति हो तथा सभी प्राणी एक-दूसरे के प्रति संवेदनशील हों।
प्र.5 — यदि बीज धूल में गिर जाए तो क्या हो सकता है?
उत्तर: तब उसकी उड़ान रुक सकती है (वह आकाश में नहीं उड़ पाता)। साथ ही, उचित परिस्थिति मिले तो वही बीज बढ़कर पौधा भी बन सकता है।
प्र.6 — "सौरभ उड़ जाता है नभ में / फिर वह लौट कहाँ आता है?" पंक्तियों का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: फूल की सुगंध एक बार आकाश में उड़ जाए तो लौटकर वापस नहीं आती — उसमें केवल ऊपर उठने की (आरोहण की) एक ही गति है। इसके विपरीत धूल में गिरा बीज कभी ऊपर नहीं उड़ पाता — उसमें केवल नीचे रहने की गति है। दोनों में अलग-अलग एक ही दिशा की गति है।
प्र.7 — कविता में 'मत बाँधो', 'पंख न काटो' आदि संबोधन किसके लिए किए गए होंगे?
उत्तर: ये संबोधन उन सभी लोगों के लिए हैं जो दूसरों के सपनों, कल्पना और स्वतंत्र विचारों पर रोक या नियंत्रण लगाते हैं — जैसे रूढ़िवादी सोच रखने वाले लोग, या वे जो किसी की उड़ान को सीमित करना चाहते हैं।
प्र.8 — "मुक्त गगन में विचरण कर यह तारों में फिर मिल जायेगा" — इन पंक्तियों का भाव लिखिए।
उत्तर: स्वतंत्र आकाश में घूमने पर सपना तारों तक जा पहुँचेगा, बादलों से रंग और किरणों से चमक लेकर धरती पर लौटेगा — अर्थात स्वतंत्र छोड़ा गया सपना ऊँचाइयों से नई सुंदरता और प्रेरणा बटोरकर हमारे जीवन को समृद्ध बनाता है।
प्र.9 — "इन सपनों के पंख न काटो / इन सपनों की गति मत बाँधो!" — यह सुझाव है, आदेश है या प्रार्थना? यह बात किससे कही जा रही है?
उत्तर: यह एक भावपूर्ण प्रार्थना/आग्रह है, जिसमें सुझाव का भी भाव है। यह उन सब लोगों से कही जा रही है जो किसी के सपनों और स्वतंत्र विचारों को बाँधने या रोकने का प्रयास करते हैं।
- सुमित्रानंदन पंत
- महादेवी वर्मा
- सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
- जयशंकर प्रसाद
- पद्मश्री
- साहित्य अकादमी
- भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार
- व्यास सम्मान
- प्रेम की
- शिक्षा की
- सपनों की
- अधिकारों की
- आकाश
- सुगंध
- धुआँ
- चमक
- विचरण
- अवरोहण
- मँडराना
- दीप्ति
- नदी के
- उड़ने वाले पक्षी के
- पर्वत के
- दीपक के
- आगे और पीछे
- नीचे (अग्नि) और ऊपर (धूम)
- दायाँ और बायाँ
- तेज़ और धीमा
- विपरीतार्थक
- समानार्थी (दोनों का अर्थ 'आकाश')
- तुकांत मात्र
- श्रुतिसम भिन्नार्थक
- धन-संपत्ति
- कला/हुनर
- युद्ध
- विश्राम
- अनुप्रास
- टेक (पुनरावृत्ति/refrain)
- उपमा
- यमक
- संबोधन
- प्रश्न पूछा गया है (प्रश्न-शैली)
- समानार्थी प्रयोग
- विरोधाभास
- अंधकार
- चमक/प्रकाश
- धुआँ
- गति
प्र.1 (दीर्घ उत्तरीय — 5 अंक): 'मत बाँधो' कविता का मुख्य भाव अपने शब्दों में लिखिए और बताइए कि कवयित्री सपनों की स्वतंत्रता क्यों चाहती है। [संकेत: सपने = पक्षी, पंख न काटना, आरोहण-अवरोहण, स्वर्ग गढ़ने वाला शिल्प]
प्र.2 (व्याख्या — 3 अंक): निम्नलिखित पंक्तियों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए—
"सपनों में दोनों ही गति हैं / उड़ कर आँखों में आता है!"
प्र.3 (काव्य-सौंदर्य — 3 अंक): इस कविता में प्रयुक्त किन्हीं तीन काव्य-विशेषताओं (मानवीकरण, विपरीतार्थक शब्द, टेक, प्रश्न-शैली आदि) को उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
प्र.4 (लघु उत्तरीय — 2 अंक): 'आरोहण' और 'अवरोहण' का अर्थ लिखिए तथा बताइए कि सपनों के लिए दोनों गतियाँ क्यों आवश्यक हैं?
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