- यह एक कविता है जिसके रचयिता प्रसिद्ध कवि गिरिजा कुमार माथुर (1919–1994) हैं।
- कविता का मूल विषय है — मनुष्य का अनुपात, अर्थात विराट ब्रह्मांड की तुलना में आदमी कितना छोटा (लघु) है।
- कमरे से लेकर ब्रह्मांड तक का क्रमिक विस्तार दिखाकर कवि बताते हैं कि पृथ्वी भी करोड़ों में एक छोटा-सा कण है।
- इतना सूक्ष्म होकर भी आदमी ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा, अविश्वास में डूबा रहता है और दीवारें खड़ी करता है — यही कविता का तीखा व्यंग्य है।
- परीक्षा महत्त्व: लगभग 5 अंक — भावार्थ, मूल भाव, शब्दार्थ तथा MCQ के रूप में प्रश्न पूछे जाते हैं।
1. कवि परिचय — गिरिजा कुमार माथुर
गिरिजा कुमार माथुर का जन्म मध्य प्रदेश के अशोक नगर जनपद में हुआ था। उनका जीवनकाल 1919 से 1994 तक रहा। उनके पिता देवीचरण माथुर भी कविताएँ लिखते थे, इसलिए कविता का संस्कार उन्हें घर से ही मिला।
गिरिजा कुमार माथुर आकाशवाणी में कई महत्त्वपूर्ण पदों पर रहे। कविताओं के अतिरिक्त उन्होंने नाटक, गीत, कहानी और निबंध भी लिखे। उनकी अनेक कृतियाँ प्रकाशित हैं, जिनमें मंजीर, नाश और निर्माण, धूप के धान, शिलापंख चमकीले तथा मैं वक्त के हूँ सामने प्रमुख हैं। उन्होंने प्रसिद्ध भावांतर गीत 'होंगे कामयाब' ('हम होंगे कामयाब') की भी रचना की थी, जो आज भी प्रेरणा-गीत के रूप में गाया जाता है।
उनकी कविताएँ सरल भाषा में गहरे विचार प्रकट करती हैं। 'आदमी का अनुपात' भी इसी विशेषता का सुंदर उदाहरण है।
2. कविता का मूल पाठ
कविता बहुत छोटी-छोटी पंक्तियों में लिखी गई है और इसका मूल पाठ इस प्रकार है —
दो व्यक्ति कमरे में
कमरे से छोटे —
कमरा है घर में
घर है मुहल्ले में
मुहल्ला नगर में
नगर है प्रदेश में
प्रदेश कई देश में
देश कई पृथ्वी पर
अनगिन नक्षत्रों में
पृथ्वी एक छोटी
करोड़ों में एक ही
सबको समेटे है
परिधि नभ गंगा की
लाखों ब्रह्मांडों में
अपना एक ब्रह्मांड
हर ब्रह्मांड में
कितनी ही पृथ्वियाँ
कितनी ही भूमियाँ
कितनी ही सृष्टियाँ
यह है अनुपात
आदमी का विराट से
इस पर भी आदमी
ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा, अविश्वास लीन
संख्यातीत शंख सी दीवारें उठाता है
अपने को दूजे का स्वामी बताता है
देशों की कौन कहे
एक कमरे में
दो दुनिया रचाता है
3. कविता का सारांश (भावार्थ)
कविता का आरंभ एक छोटे-से दृश्य से होता है — एक कमरे में दो व्यक्ति बैठे हैं, और वे कमरे से भी छोटे हैं। यहीं से कवि एक श्रृंखला बनाते हैं जो लगातार बड़ी होती जाती है।
कमरा घर का एक भाग है, घर मुहल्ले का, मुहल्ला नगर का, नगर प्रदेश का और प्रदेश एक देश का अंश है। ऐसे कई देश मिलकर पूरी पृथ्वी बनाते हैं। फिर भी यह पृथ्वी अनगिनत नक्षत्रों के बीच बहुत छोटी है — करोड़ों ग्रहों-तारों में बस एक। यह सब आकाशगंगा (नभ गंगा) की परिधि में समाया है, और ऐसे लाखों ब्रह्मांड हैं। हर ब्रह्मांड में कितनी ही पृथ्वियाँ, कितनी ही भूमियाँ और कितनी ही सृष्टियाँ हैं।
इस विशाल विवरण के बाद कवि निष्कर्ष देते हैं — "यह है अनुपात आदमी का विराट से।" अर्थात इस अनंत ब्रह्मांड के सामने आदमी कितना सूक्ष्म, कितना नगण्य है। पर आश्चर्य यह है कि इतना छोटा होकर भी आदमी ईर्ष्या, अहंकार, स्वार्थ, घृणा और अविश्वास जैसी भावनाओं में डूबा रहता है। वह अनगिनत (शंख जैसी असंख्य) दीवारें खड़ी करता है, स्वयं को दूसरों का स्वामी बताता है। देशों की बात तो दूर, वह एक ही कमरे में दो अलग-अलग दुनियाएँ रच डालता है — यानी अपने पास बैठे व्यक्ति से भी मन की दीवार बना लेता है।
4. कविता का मुख्य भाव / केंद्रीय संदेश
कविता का केंद्रीय भाव है — मनुष्य की लघुता (छोटापन) और ब्रह्मांड की विशालता का अनुपात। कवि दो विरोधी सत्य एक साथ रखते हैं:
- विराटता: ब्रह्मांड असीम है — लाखों ब्रह्मांड, अनगिनत नक्षत्र, कितनी ही सृष्टियाँ।
- लघुता: इस विराट के सामने आदमी और उसकी पृथ्वी अत्यंत छोटे हैं।
संदेश यह है कि जब आदमी इतना सूक्ष्म है, तो उसे अहंकार, ईर्ष्या और भेदभाव छोड़कर विनम्र, सहिष्णु और प्रेमपूर्ण बनना चाहिए। दीवारें (भेद) खड़ी करने के बजाय हमें सहअस्तित्व, सौहार्द और एकता को अपनाना चाहिए। यही 'विराट दृष्टिकोण' अपनाना कविता का प्रेरक संदेश है।
5. महत्त्वपूर्ण पंक्तियों की व्याख्या
आशय — अनगिनत तारों-ग्रहों के बीच हमारी पृथ्वी बहुत छोटी है; करोड़ों खगोलीय पिंडों में वह केवल एक है। यह पंक्ति पृथ्वी की अल्पता और अनोखेपन की ओर संकेत करती है।
आशय — आदमी असंख्य (गिनती से परे) दीवारें खड़ी करता है, यानी मनुष्य द्वारा खींची गई कृत्रिम सीमाएँ और भेदभाव। साथ ही वह दूसरों पर अपना अधिकार/शासन जमाना चाहता है। यह पंक्ति मनुष्य के अहंकार पर तीखा व्यंग्य है।
आशय — देशों के बीच के झगड़े तो बड़ी बात है, आदमी तो एक ही कमरे में बैठकर भी दो अलग दुनिया (मन की दूरी, अलगाव) बना लेता है। यह सीमित स्थान में भी भेद और अलगाव की प्रवृत्ति को दर्शाता है।
6. काव्य-सौंदर्य एवं शैली
- विधा: यह एक नई कविता (अतुकांत, छंदमुक्त) है — इसमें निश्चित तुक या छंद नहीं है।
- क्रमिक विस्तार: कमरा → घर → मुहल्ला → नगर → प्रदेश → देश → पृथ्वी → नक्षत्र → ब्रह्मांड — छोटे से बड़े की ओर शब्दों का दोहराव करके विस्तार दिखाया गया है।
- निदेशक चिह्न (—): "कमरे से छोटे —" में डैश का प्रयोग पाठक को ठहरकर सोचने और आगे आने वाले महत्त्वपूर्ण विचार पर ध्यान देने के लिए किया गया है।
- व्यंग्य: मनुष्य के अहंकार पर तीखा व्यंग्य है, पर कवि ने कहीं क्रोध नहीं दिखाया — स्वर में करुणा और चिंता है।
- अधिकांश पंक्तियों का अंतिम शब्द 'में' है और पंक्तियाँ बहुत छोटी-छोटी हैं — यह कविता की विशेष शैली है।
- प्रतीक: 'शंख सी दीवारें' (असंख्य कृत्रिम भेद), 'दो दुनिया' (मन का अलगाव) सशक्त प्रतीक हैं।
- नवीन शब्द-निर्माण: 'नभ गंगा' (नभ + गंगा = आकाशगंगा) जैसे दो शब्दों को मिलाकर बना शब्द प्रयोग किया गया है।
7. शब्दार्थ (कठिन शब्दों के अर्थ)
- अनुपात — दो वस्तुओं के बीच का सापेक्ष मान / तुलना।
- मुहल्ला — नगर का एक छोटा भाग, पड़ोस का क्षेत्र।
- अनगिन / अनगिनत — जिनकी गिनती न हो सके, असंख्य।
- नक्षत्र — तारे, आकाश के ज्योतिपिंड।
- परिधि — किसी गोल वस्तु की बाहरी सीमा-रेखा।
- नभ — आकाश।
- नभ गंगा / आकाशगंगा — तारों का विशाल समूह (Galaxy)।
- ब्रह्मांड — समस्त सृष्टि, सम्पूर्ण विश्व (Universe)।
- सृष्टि — रचना, संसार।
- भूमि — धरती, ज़मीन।
- विराट — अत्यंत विशाल, असीम।
- लीन — डूबा हुआ, मग्न।
- ईर्ष्या — दूसरों की उन्नति देखकर जलन।
- अहं / अहंकार — घमंड, स्वयं को बड़ा समझना।
- स्वार्थ — केवल अपना हित देखना।
- घृणा — नफ़रत।
- अविश्वास — विश्वास का अभाव, संदेह।
- संख्यातीत — संख्या से परे, असंख्य।
- स्वामी — मालिक, अधिकारी।
- दूजे — दूसरे का।
8. NCERT 'मेरी समझ से' — सही उत्तर
- (1) कविता के अनुसार ब्रह्मांड में मानव का स्थान कैसा है? → ब्रह्मांड की तुलना में अत्यंत सूक्ष्म।
- (2) कविता में मुख्य रूप से किन दो वस्तुओं का अनुपात दिखाया गया है? → मानव और ब्रह्मांड।
- (3) कविता के अनुसार मानव किन भावों और कार्यों में लिप्त रहता है? → ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा में।
- (4) कविता के अनुसार मानव का सबसे बड़ा दोष क्या है? → वह अपने छोटेपन को भूल अहंकारी हो जाता है।
9. NCERT 'मिलकर करें मिलान' — सही मिलान
- संख्यातीत शंख सी दीवारें → मनुष्य द्वारा खींची गई कृत्रिम सीमाएँ।
- पृथ्वी एक छोटी, करोड़ों में एक → पृथ्वी की अल्पता और अनोखेपन की ओर संकेत।
- ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा → मनुष्य की नकारात्मक भावनाएँ।
- दो व्यक्ति कमरे में / कमरे से छोटे → आदमी के संकुचित होने का प्रतीक।
- परिधि नभ गंगा की → ब्रह्मांड की विशालता का प्रतीक।
- एक कमरे में दो दुनिया रचाता → सीमित स्थान में भी भेद और अलगाव की प्रवृत्ति।
10. प्रश्नोत्तर (अभ्यास हेतु)
प्र.1 — कविता में आदमी और ब्रह्मांड का अनुपात किस प्रकार दिखाया गया है?
उत्तर — कवि कमरे से आरंभ करके घर, मुहल्ला, नगर, प्रदेश, देश, पृथ्वी, नक्षत्र होते हुए लाखों ब्रह्मांडों तक का क्रमिक विस्तार दिखाते हैं। इस विशाल क्रम में पृथ्वी और उस पर रहने वाला आदमी अत्यंत छोटे सिद्ध होते हैं — यही आदमी का विराट से अनुपात है।
प्र.2 — "संख्यातीत शंख सी दीवारें उठाता है" से कवि का क्या आशय है?
उत्तर — कवि कहना चाहते हैं कि मनुष्य जाति, धर्म, ऊँच-नीच, देश आदि के नाम पर असंख्य कृत्रिम दीवारें (भेदभाव) खड़ी करता है, जिससे लोग आपस में बँट जाते हैं। यह मनुष्य के संकुचित मन और अहंकार पर व्यंग्य है।
प्र.3 — "एक कमरे में दो दुनिया रचाता है" — इस पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर — एक ही कमरे में बैठे दो व्यक्ति भी मन से एक-दूसरे से दूर रहते हैं और अलग-अलग 'दुनिया' बना लेते हैं। इससे पता चलता है कि आदमी छोटे-से स्थान में भी भेद और अलगाव पैदा कर देता है — मेल-मिलाप की भावना खो देता है।
प्र.4 — इस कविता का भाव आपको कैसा लगा — व्यंग्य, करुणा या चिंता? कवि ने मानव की कमियाँ बताईं पर क्रोध नहीं दिखाया, क्यों?
उत्तर — कविता में व्यंग्य के साथ-साथ करुणा और चिंता का भाव है। कवि क्रोधित नहीं होते क्योंकि वे आदमी को सुधारना चाहते हैं, उसकी निंदा करना नहीं। शांत स्वर में दिया गया संदेश पाठक को सोचने और स्वयं बदलने के लिए प्रेरित करता है।
प्र.5 — मनुष्य को ब्रह्मांड जैसा विस्तार पाने के लिए किन गुणों की आवश्यकता है?
उत्तर — सहअस्तित्व, सहनशीलता, सौहार्द, प्रेम, विनम्रता, समावेशिता और संतुलन — इन सकारात्मक गुणों को अपनाकर ही मनुष्य अपने मन को विराट और उदार बना सकता है, क्योंकि ये गुण ईर्ष्या, अहं और घृणा से कहीं अधिक प्रभावी होते हैं।
11. ध्यान देने योग्य व्याकरण बिंदु (विशेषण–विशेष्य)
कविता की पंक्तियों में विशेषण और विशेष्य पहचानना परीक्षा में पूछा जा सकता है —
- दो व्यक्ति → विशेषण: दो, विशेष्य: व्यक्ति।
- अनगिन नक्षत्र → विशेषण: अनगिन, विशेष्य: नक्षत्र।
- लाखों ब्रह्मांड → विशेषण: लाखों, विशेष्य: ब्रह्मांड।
- पृथ्वी एक छोटी → विशेषण: छोटी, विशेष्य: पृथ्वी।
12. त्वरित पुनरावृत्ति (Quick Revision)
- कवि: गिरिजा कुमार माथुर (1919–1994), मध्य प्रदेश।
- विधा: नई कविता (अतुकांत, छंदमुक्त)।
- मूल भाव: ब्रह्मांड के सामने आदमी की लघुता; अहंकार छोड़कर विनम्र व सहिष्णु बनो।
- क्रम: कमरा → घर → मुहल्ला → नगर → प्रदेश → देश → पृथ्वी → नक्षत्र → ब्रह्मांड।
- नकारात्मक भाव: ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा, अविश्वास।
- प्रतीक: 'शंख सी दीवारें' = कृत्रिम भेद; 'दो दुनिया' = मन का अलगाव।
- सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
- गिरिजा कुमार माथुर
- हरिवंश राय बच्चन
- रामधारी सिंह दिनकर
- पृथ्वी और सूर्य
- घर और कमरा
- मानव और ब्रह्मांड
- देश और नगर
- कमरा → घर → मुहल्ला → नगर
- नगर → कमरा → घर → मुहल्ला
- घर → कमरा → नगर → मुहल्ला
- मुहल्ला → कमरा → घर → नगर
- आदमी
- कमरा
- पृथ्वी
- नगर
- आकाशगंगा (Galaxy)
- आकाश में बहती नदी
- वर्षा
- बादल
- त्याग, ज्ञान, प्रेम
- ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा
- सेवा और परोपकार
- उदारता और न्याय
- मजबूत किले
- मनुष्य द्वारा खींची गई कृत्रिम सीमाएँ
- घर की दीवारें
- समुद्र के शंख
- घर में दो कमरे बनाना
- सीमित स्थान में भी भेद और अलगाव
- दो देशों का युद्ध
- दो लोगों की मित्रता
- केवल हास्य
- मनुष्य के अहंकार पर व्यंग्य के साथ करुणा व चिंता
- केवल क्रोध
- केवल प्रशंसा
- विरोध
- दो वस्तुओं की तुलना / सापेक्ष मान
- अनुमान
- अनुवाद
- 'जन गण मन'
- 'होंगे कामयाब'
- 'सारे जहाँ से अच्छा'
- 'वंदे मातरम्'
- अधिक धन कमाओ
- अहंकार छोड़कर विनम्र, सहिष्णु और प्रेमपूर्ण बनो
- देशों पर शासन करो
- अकेले रहो
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